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लोकसभा से पास बिल से पूरी नहीं होतीं ट्रांसजेंडर्स की उम्मीदें

 

लोकसभा में भारी हंगामे के बीच ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़ा विधेयक आसानी से पास कर दिया गया है. स्टैंडिंग कमिटी ने 55 संशोधनों की अनुसंशा की थी, लेकिन इस विधेयक में कुल 27 परिवर्तन किए गए. बाकी मांगो को खारिज कर दिया गया.

“ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण विधेयक) 2018” में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को परिभाषित करने, उनके खिलाफ होने वाले लिंग भेद रोकने, उन्हें स्वेच्छा से लिंग पहचान का अधिकार देने, पहचान पत्र प्रदान करने के साथ ही नियोजन, भर्ती, पदोन्नति संबंधी मामलों में उनके साथ भेदभाव ना हो इसके लिए प्रावधान किए गए हैं.

इसके अलावा इस बिल में शिकायत निवारण नेटवर्क बनाने नेशनल ट्रांसजेंडर काउंसिल स्थापित करने का प्रावधान भी है. इस कानून का उल्लंघन करने पर इसमें सजा का प्रावधान भी किया गया है.

लेकिन क्या इस विधेयक में ट्रांसजेंडर समुदाय की मांगो का ध्यान रखा गया है? सबसे पहले अगस्त 2016 में इस मुद्दे से संबंधित विधेयक लाया गया था, जिसे ट्रांसजेंडर की परिभाषा को लेकर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.

इसमें ट्रांसजेंडर की परिभाषा के लिए लिखा गया था, ‘ना पूरी तरह से पुरुष ना पूरी तरह से महिला’. इसमें लिंग की पहचान के लिए चिकित्सकीय परीक्षण भी थोप दिया गया था.
विरोध के बाद इसे स्टैंडिंग कमिटी के पास भेज दिया गया था.

जिसने इसमें कुल 55 संशोधनों की अनुसंशा की थी. इस नए विधेयक से भी ट्रांसजेंडर समुदाय खुश नहीं है. इन सुधारों में ट्रांसजेंडर समुदाय की चिंताओं को ध्यान में नहीं रखा गया है.

नई परिभाषा के मुताबिक वह व्यक्ति ट्रांसजेडर कहलायेगा जिसका लिंग उसके जन्म के समय दिए गए लिंग से मेल नहीं खाता. इसमें परिवर्तित लिंग वाले व्यक्ति भी शामिल हैं (लिंग परिवर्तन के तरीके से कोई इस पर कोई असर नहीं होगा).
इसमें सामजिक-सांस्कृतिक आधार पर प्रचलित पहचानो को भी शामिल किया गया है.

इस विधेयक में परिवार की नई परिभाषा के तहत रहन-सहन के तरीके को शामिल नहीं किया गया है. इस तरह यह ट्रांसजेंडर समुदाय के रहने के तरीकों को वैधता नहीं प्रदान करता.

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ इंटरसेक्स व्यक्ति का संबंध अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाया है. हालांकि ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को पहले से काफी बेहतर बताया गया है.

इस विधेयक में कहा गया कि यदि कोई ट्रांसजेंडर अपना लिंग परिवर्तन कराकर स्त्री या पुरुष के रूप में पहचान पाना चाहता है. इसके लिए उसे सबसे पहले जिलाधिकारी से ट्रांसजेंडर का प्रमाणपत्र लेना होगा.

इसके बाद लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरने के बाद उसका प्रमाण-पत्र देना होगा. इस प्रक्रिया को काफी बोझिल बताया जा रहा है.

यह विधेयक आरक्षण के सवाल पर पूरी तरह से शांत है. जबकि सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र और राज्य सरकारों से कह चुका है कि आरक्षण में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी शामिल किया जाए.
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत प्राइवेट स्कूलों में ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए सीटों के आरक्षण को भी नजर अंदाज किया गया है.

इस विधेयक को कितनी गंभीरता से लिया गया है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इस बहस में सिर्फ चार सदस्यों ने हिस्सा लिया. इस पर चर्चा के लिए दो घंटे से भी कम दिया गया. ऐसा लगा जैसे हड़बड़ी में इस विधेयक को पास कर दिया गया हो.

अब जबकि यह विधेयक राज्यसभा के पटल पर रखा जायेगा, तब देखना यह होगा कि राज्य सभा अपने सीमित अधिकारों के बावजूद इस पर क्या रुख अपनाती है.