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राफेल डील : कोर्ट से मामला खत्म, संसद का दरवाजा अब भी खुला

review petition filed in ayodhya verdict

 

सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को राफेल डील मामले में बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि डील की प्रक्रिया में कोई कमी नहीं हुई है. कोर्ट ने इससे जुड़ी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है. फैसले में यह भी कहा गया है कि मामला कोर्ट में अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच गया है लेकिन इसे संसद और अन्य राजनीतिक फ्रंट पर उठाया जा सकता है.

कोर्ट ने बीते 14 नवंबर को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.  मामले में अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं थीं. याचिका में कोर्ट की निगरानी में डील की जांच की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सरकार को 126 या 36 विमान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने  कहा कि हमने सावधानी के साथ सभी डॉक्यूमेंट का अध्ययन किया है, रक्षा अधिकारियों से बातचीत के बाद निर्णय की प्रक्रिया से संतुष्ट हैं.  कोर्ट ने फैसले में कहा कि हम डील में हस्तक्षेप की वजह नहीं देख पा रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि राफेल लड़ाकू विमानों की कीमत पर निर्णय लेना अदालत का काम नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि हमने व्यावसायिक फायदे पहुंचाने का कोई सबूत नहीं पाया है.

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि सितंबर 2016 में जब राफेल सौदे को अंतिम रूप दिया गया था, उस वक्त किसी ने खरीदी पर सवाल नहीं उठाया था. राफेल सौदे पर सवाल उस वक्त उठे जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद ने बयान दिया, यह न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भारतीय वायुसेना में राफेल की तरह के चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को शामिल करने की जरूरत है. लड़ाकू विमानों की जरूरत है और देश लड़ाकू विमानों के बगैर नहीं रह सकता है.

वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कोर्ट का फैसला पूरी तरह गलत है. यह अभियान नहीं रुकेगा हम रिव्यू पिटिशन दायर करेंगे.

इससे पहले इस मामले में एमएल शर्मा, विनीत धंदा और आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने याचिकाएं दाखिल की थी. इसके अलावा इसी मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने पीआईएल दाखिल की थी.

तृणमूल कांग्रेस के सौगाता राय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को जो सही लगा वह उसने कहा है लेकिन राजनीतिक दलों ने संयुक्त संसदीय कमेटी(जेपीसी) बनाने की मांग की है.

इस पीआईएल में कहा गया है कि प्राथमिक तौर पर सबूतों से यह साफ होता है कि दसॉल्ट के साथ हुए 36 राफेल विमानों के समझौते में अनियमितताएं बरती गई हैं. इस मामले में उच्च स्तर पर घोटाले की संभावना है, जिसकी विस्तृत जांच की जरूरत है.

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि इस समझौते में प्रधानमंत्री ने नियमों को ताक पर रखकर फैसला लिया. इसमें कहा गया है समझौते की घोषणा के बाद कीमत को लेकर बातचीत शुरू हुई और इसके लिए गठित कमिटी की इजाजत तो घोषणा के लगभग एक साल बाद ली गई.

इस डील में सरकार पर आरोप है कि यूपीए सरकार की डील की अपेक्षा इस डील में जानबूझकर अधिक पैसा लगाया गया. इसके अतिरिक्त अनिल अंबानी के रिलायंस समूह को गलत तरीके से ऑफसेट सहायक के रूप में चुना गया.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा, ” पूरा मामला शुरू से ही साफ था और हम लगातार कहते रहे हैं कि कांग्रेस के आरोपों का कोई आधार नहीं है वह राजनीतिक फायदे के लिए पूरे मामले को उठाती रही है.”

इससे पहले हुई सुनवाई में सरकार की ओर बोलते हुए अटार्नी जरनल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि सरकार राफेल की कीमत नहीं बता सकती. सरकार की ओर से इसे गोपनीय सूचना बताया गया था.

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को राफेल विमान की खरीद से संबंधित दस्तावेज सीलबंद लिफाफे में जमा करने के आदेश दिए थे. 12 नवंबर को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फ्रांस से 36 लड़ाकू राफेल विमानों की खरीद में 2013 की ‘रक्षा खरीद प्रक्रिया’ का पूरी तरह पालन किया गया और ‘बेहतर शर्तों’ पर बातचीत की गयी थी. केन्द्र सरकार ने कहा कि मई 2015 से अप्रैल 2016 के बीच भारतीय वार्ता दल (आईएनटी) की 74 बैठकें हुई. इनमें 26 बैठक फ्रांसीसी पक्ष के साथ हुई.

आईएनटी की अध्यक्षता वायुसेना के उप प्रमुख (डीसीएएस) कर रहे थे और इसमें संयुक्त सचिव और अधिग्रहण प्रबंधक (एयर), संयुक्त सचिव (रक्षा ऑफसेट प्रबंधन शाखा), संयुक्त सचिव और अतिरिक्त वित्तीय सलाहकार, वित्त प्रबंधक (एयर), सलाहकार (लागत) और सहायक वायुसेना प्रमुख (योजना) भारत सरकार की तरफ से सदस्य के तौर पर शामिल थे. वहीं फ्रांसीसी पक्ष का नेतृत्व महानिदेशक आयुध (डीजीए), फ्रांस सरकार का रक्षा मंत्रालय कर रहे थे.

केन्द्र की ओर से 14 पन्नों के हलफनामें में कहा गया है कि सौदे से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने भी मंजूरी दी थी और विमान खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया है. मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने 24 अगस्त 2016 को समझौते की मंजूरी दी थी.

कांग्रेस ने कहा था कि राफेल मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार के जवाब से साबित हो गया कि सौदे को अंतिम रूप देने से पहले सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी नहीं ली गई.