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आईटी एक्ट में बदलाव पर सरकार और ऑनलाइन कंपनियां हो सकती हैं आमने-सामने

plans of change it act widen the gap between govt and social media company

 

हाल में यह खबर आई थी कि सरकार सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट, 2000 की धारा 79 में संशोधन कर विभिन्न ऑनलाइन मंचों को ‘गैर-कानूनी’ सूचना या सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने संबंधी तकनीक लगाने के लिए बाध्य करने पर विचार कर रही है. यह आशंका थी कि इस प्रस्ताव से सरकार और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स कंपनियों के बीच खींचतान बढ़ेगी.

अब इसके संकेत भी दिखाई देने लगे हैं. सरकार द्वारा आईटी एक्ट की धारा 79 में संशोधन करने संबंधित सुझाव सार्वजनिक तौर पर मांगना इसी का नतीजा हो सकता है. वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स कंपनियां इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में निश्चित ही चुनौती देंगी.

सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट, 2000 की धारा 79 में इन संशोधनों को लागू करने के लिए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडिएट्स के लिए दिशा-निर्देश संशोधन), 2018 मसौदा तैयार किया है.

‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में छपी खबर के मुताबिक, बॉम्बे हाई कोर्ट में वकील और साइबर लॉ एक्पर्ट प्रशांत माली मानते हैं कि कानून में संशोधन सोशल मीडिया कंपनियों के लिए दोधारी तलवार बन सकता है. संशोधन लागू होने पर अगर कंपनी अपने ग्राहकों के मैसेज से छेड़छाड़ करती है तो संभव है कि ग्राहक कानूनी सहारा लें और अगर वो ऐसा नहीं करती है तो सरकार उन पर कानूनी कार्रवाई करेगी.”

उन्होंने कहा कि “व्हॉट्सएप टेक्नोलॉजी का हवाला देते हुए कह सकता है कि कुछ केस में एंड टू एंड एन्क्रिप्शन खत्म करना संभव नहीं. ऐसी स्थिति में वह सरकार के साथ दीर्घकालिक टकराव की स्थिति में आ जाएगा. दूसरी तरफ, अगर सरकार कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करती है तो कंपनियों को सरकार को सूचना मुहैया कराने के दूसरे रास्ते खोजने ही पड़ेंगे.”

हालांकि सरकार यह कहते हुए अपने फैसले का बचाव कर रही है कि चूंकि व्हॉट्सएप जैसे सोशल प्लेटफॉर्म ने सरकार से साम्प्रदायिक हिंसा और तनाव फैलाने के लिए जिम्मेदार संदेशों का सोर्स साझा करने से कई बार मना कर दिया है, इसलिए उसके लिए आईटी एक्ट में संशोधन करना अनिवार्य हो गया है. सरकार का कहना है कि फेक न्यूज और अफवाहों से निपटने के लिए भी कानून में संशोधन करना जरूरी है.

क्या-क्या बदलाव किए जा सकते हैं?

सरकार कानून में संशोधन कर ऑनलाइन मंचों के लिए अब ‘गैर-कानूनी’ सूचनाओं का रिकार्ड रखना अनिवार्य होगा और उसके लिए उन्हें विशेष तकनीक और प्रक्रिया अपनानी होगी. सरकार 72 घंटों यानि तीन दिनों के भीतर ऑनलाइन मंचों से ये रिकार्ड मांग सकेगी.

एक्ट की धारा 3(9) के अनुसार, ऑनलाइन मंचों को ‘गैर-कानूनी’ सूचना या सामग्री की पहचान करने, उन्हें हटाने या उनकी एक्सेस अवरुद्ध करने के लिए उचित तकनीक और प्रक्रिया अपनानी होगी.

मसौदे के नए नियम 3(4) के अनुसार, ऑनलाइन मंचों को अपने यूजर्स को ‘गैर-कानूनी’ सूचनाओं से अवगत कराने के लिए महीनावार चेतावनी देनी होगी.

खत्म हो सकती है लोगों की निजता

वहीं, नियम 3(5) के लागू होने के बाद एंड टू एंड एन्क्रिप्शन भी खत्म हो जाएगा. इस एन्क्रिप्शन के जरिए सिर्फ सेंडर और रिसीवर ही मैसेज पढ़ सकते हैं और इसे कोई टेलीकॉम कंपनी ट्रेस नहीं कर सकती. लेकिन नियम 3(5) के बाद, ऑनलाइन मंचों को न सिर्फ एंड टू एंड एन्क्रिप्शन खत्म करना होगा, बल्कि प्रत्येक भेजे गए मैसेज से जुड़ी जानकारी का अलग से रिकार्ड रखना होगा.

जाहिर है कि इससे व्हाट्सएप समेत बहुत से सोशल मीडिया मंचों पर भेजे जाने वाले संदेशों की ‘निजता’ खत्म हो जाएगी. ये सोशल मीडिया मंच एंड टू एंड एन्क्रिप्शन को ही यूजर्स की सुरक्षा और निजता का आधार मानते हैं. अगर ये नए संशोधन कानून का हिस्सा बनते हैं तो 50 लाख से अधिक यूजर्स वाले सोशल मीडिया मंचों को 72 घंटों के भीतर सरकार से मांगी गई सूचनाएं साझा करनी होंगी.

इससे पहले केंद्रीय सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद के मानसून सत्र में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट, 2000 की धारा 79 में संशोधन करने की बात कही थी. लेकिन आम चुनाव से कुछ महीने पहले यह बात सामने आने से फिर विवाद खड़ा होने की संभावना बन गई है.