आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शर्तों के साथ लागू करेगी सरकार

Team NewsPlatform | December 6, 2018

Government to implement Supreme Court decision on conditional basis

 

आधार एक्ट में बदलाव संबंधित प्रस्ताव अंतिम चरण में है.  सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है.  प्रस्ताव में लोगों को आधार नंबर के साथ-साथ बायोमेट्रिक की जानकारी डीलिंक (जानकारी नहीं देने) करवाने की छूट की बात है. अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में छपी खबर के मुताबिक प्रस्ताव-पत्र में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कुछ शर्तों के साथ लागू की जाएगी.

सितम्बर में सुप्रीम कोर्ट ने आधार की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपने फैसले में डीलिंक संबंधी छूट दी थी.

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने आधार एक्ट के सेक्शन 57 को खत्म करने के आदेश दिए थे. सेक्शन 57 निजी संस्थाओं को आधार नंबर का इस्तेमाल वेरिफिकेशन के लिए करने की अनुमति देती है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बैंक एकाउंट और सिम-कार्ड से आधार को लिंक कराना असंवैधानिक है.

अखबार यूआईडीएआई से जुड़े एक अधिकारी के हवाले से कहा है, “भारत की विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की ओर से एक प्रस्ताव-पत्र बनाया गया था. जिसमें बच्चे के 18 साल के होने पर उसे छह महीने तक का समय दिए जाने का प्रस्ताव था. इस दरम्यान वह आधार की जानकारी देने का फैसला कर सकता है.”

यह प्रस्ताव  बाद में कानून मंत्रालय को भेजा गया था.  मंत्रालय की ओर से सभी नागरिकों को आधार डीलिंक करने की सुविधा देने का सुझाव आया था.

प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय कैबिनेट को करना है. हालांकि द हिन्दू के मुताबिक सरकार यह छूट  केवल उन लोगों को देने जा रही है जिनके पास पैन कार्ड नहीं है या जिन्हें इसकी जरूरत नहीं है. कोर्ट ने आधार और पैन को जोड़ने की अनिवार्यता खत्म कर दी थी.

12 मार्च 2018 तक 37.50 करोड़ पैन कार्ड जारी किए गए हैं. 36.54 करोड़ पैनकार्ड व्यक्ति के नाम से जारी किए गए हैं. जिनमें 16.84 करोड़ पैन कार्ड आधार से पहले ही जोड़े जा चुके हैं.

प्रस्ताव-पत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में आधार संबंधी जानकारी तक पहुंच की अनुमति के लिए एक अजूडिकैट ऑफिसर( निर्णय अधिकारी) नियुक्त  करने की बात कही गई है.

कोर्ट ने आधार एक्ट के सेक्शन 33(2) पर भी अपना निर्णय दिया था. कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में आधार डेटा का इस्तेमाल करने का निर्णय सह-सचिव स्तर के ऊपर के अधिकारी का होगा. और वह न्यायायिक अधिकारी के साथ विचार-विमर्श के बाद मिलकर ही कोई फैसला ले सकते हैं.


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