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दूध बाजार पर वैश्विक डेयरी उत्पादकों की नजर, तबाह हो सकते हैं देशी पशुपालक

mother dairy also increased milk price

 

भारत में दूध किसानों का सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद है. किसानों के लिए यह नगदी का प्रमुख स्रोत है. दूध की बिक्री से रोजाना आमदनी होती है. धान और गेहूं की तुलना में दूध का सबसे अधिक उत्पादन होता है. यह एक अनुमान के मुताबिक साल 2018-19 में 1877.5 लाख मिट्रिक टन दूध का उत्पादन हुआ. जबकि इसी समय अवधि में धान का उत्पादन 1746.3 मिट्रिक टन और गेहूं का 1021.9 मिट्रिक टन उत्पादन हुआ.

भारत में दूध या दुग्ध उत्पाद का मामूली रूप से आयात और निर्यात होता है. लेकिन प्रस्तावित रिजनल कॉम्प्रीहेन्सिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप(आरसीईपी) की वजह से छोटे दूध उत्पादकों पर खतरा मंडराने लगा है. फिलहाल दूध या उसके उत्पादों पर 30 से 60 फीसदी आयात कर लगाकर आयात को नियंत्रित किया जाता है.

भारत ने अबतक मुख्य डेयरी उत्पादक देशों और उनके समूहों जैसे कि न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय यूनियन देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) नहीं किए हैं. लेकिन इसके लिए भारत पर अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का जबरदस्त दबाव बना हुआ है.

आरसीईपी जैसे मुक्त व्यापार समझौते 15 करोड़ छोटे किसानों और कारोबारियों को तबाह कर सकता है. यूरोपीय दूध और उसके उत्पाद भारतीय दूध के मुकाबले काफी सस्ते होते हैं. ऐसे में मुक्त व्यापार से भारतीय किसानों और को-ऑपरेटिव डेयरी कंपनियों का विदेशी कंपनियों से प्रतियोगिता करना मुश्किल हो जाएगा.

दूध किसानों के साथ-साथ इसके उपभोक्ताओं के लिए भी अपनी पोषकता के लिए महत्वपूर्ण है. भारत के शाकाहारी लोगों के लिए यह प्रोटीन और विटामिन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. दूध समृद्धि का प्रतीक है. आय बढ़ने के साथ ही दूध की खपत में वृद्धि होती है. वहीं, परिवार की आय बढ़ने पर लोग वनस्पति तेल की तुलना में देशी घी खाना ज्यादा पसंद करते हैं.

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इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक 80 के दशक तक भारत 50 से 60 हजार टन दूध पाउडर और 10 से 15 हजार टन बटर का आयात करता था. यह खरीद नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के द्वारा होती थी. पिछले दो दशकों में हुई उत्पादन में वृद्धि के बाद भारत दूध के क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर हो गया है बल्कि यहां खपत से थोड़ा ज्यादा उत्पादन भी हो रहा है. भारत में दुग्ध उत्पाद का आयात की तुलना में निर्यात अधिक होता है. इसकी बड़ी वजह आयात पर लगने वाला उच्च शुल्क है. भारत में दूध पाउडर पर 60 फीसदी और चर्बी युक्त दुग्ध उत्पादों पर 40 फीसदी शुल्क लगता है.

वैश्विक स्तर पर दूध के साथ-साथ दुग्ध उत्पादों जैसे कि दूध पाउडर, बटर आदि का कारोबार होता है.

अगर आरसीईपी डील के अंतर्गत दुग्ध उत्पादों को भी शामिल किया जाता है तो भारत को अपने बाजार तक पहुंच देने के लिए विदेशी कंपनियों को ढील देनी होगी या फिर कम टैरिफ रेट लगाना होगा. फिलहाल प्रति वर्ष 10,000 टन दूध पाउडर के आयात पर 15 फीसदी टैरिफ की छूट मिली हुई है. इससे अधिक आयात पर 60 फीसदी की दर से आयात शुल्क लगता है.

साल 2008 में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया ने कुल 19,37,000 टन दूध पाउडर(वैश्विक निर्यात का 44.5%), 5,18,000 टन बटर/फैट(58.3%) और 4,94,000 टन चीज (24.8%) का निर्यात किया. इसके उलट न्यूजीलैंड के घरेलू बाजार में दूध की कोई खास खपत नहीं है. साल 2018 में न्यूजीलैंड ने 93.4 फीसदी दूध पाउडर, 94.5 फीसदी बटर और 83.6 फीसदी चीज उत्पाद को दूसरे देशों में निर्यात किया.

इसके उलट भारत में साल 2013 में 130,000 टन दूध पाउडर और घी का निर्यात हुआ. जबकि यह अबतक का सबसे अधिक निर्यात रहा है.

भारत में विदेश से आम तौर पर चीज का आयात होता है लेकिन यहां के बाजार में इसकी कम मांग( 1500 करोड़ रुपये) है. भारत में विदेशी योगर्ट और आइसक्रीम की भी कोई खास मांग नहीं है.