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दलाल स्ट्रीट में सत्ता परिवर्तन की अटकलें

d street should prepare itself for power change

  KNUS

17वीं लोकसभा के लिए चुनाव प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में है. अब सबसे बड़ा सवाल है कि कौन कितनी सीटें पाएगा या क्या कोई स्पष्ट बहुमत पाने जा रहा है? इन बातों पर कयासों का बाजार गर्म है. शेयर बाजार में भी उथल-पुथल मची है. निवेशक इसको लेकर ऊहापोह में हैं. इसी विषय पर धनंजय सिन्हा का विश्लेषण अंग्रेजी दैनिक इकॉनॉमिक टाइम्स में छपा है.

अगर बाजार के नजरिये से देखें तो एनडीए की वापसी महत्वपूर्ण है. ज्यादातर लोग एनडीए को 272 के जादुई आंकड़े के पार जाते हुए देख रहे हैं. बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाकर वित्तीय बाजारों में सकारात्मकता लाने का प्रयास किया जा रहा है.

लेकिन ऐसे में एक सवाल लाजिमी है कि क्या कोई हैरान करने वाला परिणाम आ सकता है? इसका जवाब है, हां. एक बात तो निश्चित है कि इस बार 2014 के जैसा परिणाम आने की कोई संभावना नहीं है. सीटों का बंटवारा बड़े पैमाने पर होगा ना कि एकतरफा.

धनंजय सिन्हा कहते हैं कि जैसा माहौल है उससे यही लग रहा है कि इस बार क्षेत्रीय दलों का एक बार फिर से उदय होने जा रहा है. ये पार्टियां इस लोकसभा चुनाव में 223-225 सीटें पा सकती हैं. इसमें ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां जो एनडीए की घटक हैं, उनके वोट फीसदी में कमी आ सकती है. ये पिछली बार की 54 से गिरकर 25-30 सीटों पर आ सकती हैं.

कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां बाकी कि 320 सीटें आपस में बांटने के लिए लड़ेंगी. इसमें बीजेपी 170-180 सीटों तक सीमित हो सकती है. जबकि पिछली बार उसने अकेले दम पर 282 सीटें जीती थीं.

दूसरी ओर कांग्रेस पिछली बार की 44 सीटों में काफी सुधार करने जा रही है. धनंजय लिखते हैं कि उनके अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस को इस बार 140-150 सीटें मिल सकती हैं.

इतनी सीटों के साथ कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आ सकती है. ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साल 2004 में कांग्रेस को 154 सीटें मिली थीं और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने केंद्र में सरकार का गठन किया था. उस समय बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने स्लोगन ‘इंडिया शाइनिंग’ को काफी प्रचारित किया था.

स्विंग फैक्टर

ऐसे राज्य जहां 2014 में बीजेपी को बड़ा बहुमत मिला था, वहां इस बार सामान्यीकरण होने की संभावना ज्यादा है. पिछली बार आठ राज्य(मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्य) बड़े पैमाने पर मोदी लहर के गवाह बने थे. ये राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात थे. लेकिन इस बार वो लहर थमती सी नजर आ रही है.

ग्राउंड रिपोर्ट्स साफ तौर पर ये इशारा कर रही हैं कि इन राज्यों में मोदी लहर ठंडी हो चुकी है. यहां पिछली बार बीजेपी को 221 सीटें मिली जो अब घटकर 97 तक पहुंच जाने की संभावना है.

विपक्ष का उदय

अगर हाल में हुए विधानसभा चुनावों पर गौर करें तो जो तस्वीर दिख रही है उसके मुताबिक विपक्ष का उदय हुआ है. इन राज्यों के चुनावों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की चमक फीकी पड़ी है.

हिंदी पट्टी के राज्य जिनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं बीजेपी से कांग्रेस के खाते में चले आए हैं. चुनाव से पहले इन राज्यों में जो कयास लगाए जा रहे थे उनके मुताबिक यहां इन दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर होने वाली थी. लेकिन इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही.

इन राज्यों के विधानसभा चुनावों की तुलना अगर 2013 के विधानसभा चुनावों से करें तो बीजेपी ने 182 सीटें गवाई हैं. जबकि कांग्रेस को 282 सीटें मिली हैं, जो पिछले चुनावों से दोगुनी हैं. गोवा और गुजरात के विधानसभा चुनाव भी बीजेपी की लोकप्रियता में गिरावट की ओर इशारा कर रहे हैं.

उप चुनावों का इशारा

पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए उपचुनाव भी इशारा कर रहे हैं कि बीजेपी के आधार कमजोर हुआ है. बीते कुछ समय में कुल नौ लोकसभा सीटों के लिए उप चुनाव हुए हैं, जिसमें से बीजेपी केवल दो सीटों पर अपना प्रभुत्व बचा पाई है. इस दौरान विधान सभा के लिए आठ सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, जहां बीजेपी और उसके सहयोगी दल सिर्फ दो सीटें जीत सके हैं.

एसपी-बीएसपी गठबंधन का प्रभाव

केंद्र सरकार के गठन में उत्तर प्रदेश की बड़ी भूमिका होती है. 80 लोकसभा सीटों के साथ ये सबसे बड़ा खिलाड़ी है. इस बार के लोकसभा चुनावों में यूपी में जो सबसे महत्वपूर्ण घटना हुई है वो है दो बड़े क्षेत्रीय दलों का गठबंधन. यहां एसपी और बीएसपी दोनों अलग-अलग भी बड़े दल हैं. दोनों के साथ आ जाने से ये बड़े पैमाने पर चुनावों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. इसकी एक झलक गोरखपुर और पश्चिमी यूपी के उप चुनावों में देखने को मिल चुकी है.

मध्य प्रदेश के हालात

विधानसभा चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस का उदय हुआ है वही पैटर्न बहुत हद तक लोकसभा चुनावों में जारी रहने की संभावना है. यहां बीजेपी का शहरी वोट छितराया है. उसका ग्रामीण वोट भी खिसकता हुआ नजर आया है. एससी-एसटी और अल्पसंख्यक वोट भी 2013 की अपेक्षा कांग्रेस की ओर ज्यादा झुकता नजर आया है.

छत्तीसगढ़

पिछले विधानसभा चुनाव में जो छत्तीसगढ़ में हुआ वो चौंकाने वाला था. यहां कांग्रेस ने आश्चर्यजनक रूप से वापसी की. कांग्रेस ने यहां 90 में से 68 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए 15 सालों से शासन कर रही बीजेपी का सूपड़ा ही साफ कर दिया. इस दौरान देखने में आया कि कांग्रेस ने यहां अपने परंपरागत वोटरों को फिर से अपने पाले में कर लिया है.

इंडिया शाइनिंग की असफलता

बाजपेयी सरकार में जब अर्थव्यवस्था आठ फीसदी की दर से विकास कर रही थी. उस दौर में हुए आम चुनाव में बीजेपी ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, जो पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुआ था. इस बार तो विकास दर भी उससे काफी कम है.

इसके अलावा दूसरी तरह की समस्याएं जैसे कृषि की खस्ता हालत, घटता औद्योगिक उत्पादन, बेरोजगारी, निर्माण क्षेत्र के बिगड़े हालात आदि तमाम ऐसी समस्याएं हैं जो बीजेपी के विरोध में वोट डालने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

इसके अलावा नोटबंदी और जीएसटी की असफलता जैसे कई फैक्टर हैं जो बीजेपी की कड़ी परीक्षा लेने जा रहे हैं. हालांकि प्रधानमंत्री ने पीएम किसान योजना के जरिए कृषि क्षेत्र के संकट को दूर करने का प्रयास करते नजर आने की कोशिश की है. लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके लिए काफी देर हो चुकी है.