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अमेरिका के निशाने पर है भारतीय कानून

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अमेरिकी सरकार की पुरानी बंदूक से आज भी भारत पर निशाना साधकर रखा गया है. बावजूद इसके, इसको लेकर ज्यादा हो-हल्ला नहीं हो पाता है क्योंकि मामला तकनीकी-कानूनी है जिसे समझना आसान नहीं है. आईए, हम इसे सरल भाषा में समझने की कोशिश करते हैं.

मामला अमेरिकी सरकार के एक कानून ‘Omnibus Trade and Competitiveness Act of 1988’ के तहत जारी होने वाली ‘स्पेशल 301’ रिपोर्ट का है, जो अप्रैल 2019 में जारी की गई है. इसके तहत भारत को फिर से अमरीकी सरकार ने साल 2019 में ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ में रखने का फैसला किया है. हमने शुरूआत में जिस पुरानी अमेरिकी बंदूक के बारे में कहा था, वह दरअसल अमेरिका द्वारा हर साल जारी की जाने वाली ‘स्पेशल 301’ रिपोर्ट ही है. जिसके तहत दुनिया के उन देशों को सूचीबद्ध करना है, जिनसे अमेरिकी व्यापार को खतरा है. इसी रिपोर्ट के तहत इन देशों के कानून अमेरिका की सुविधानुसार बदले जाने पर भी चर्चा की जाती है. जाहिर है कि अमेरिकी प्रशासन इसके आधार पर काम करता है.

ताजा ‘स्पेशल 301’ रिपोर्ट को अप्रैल 2019 के अंत में जारी किया गया था, लेकिन भारत में चल रहे लोकसभा चुनाव के कारण इसे तव्वजो नहीं दी गई. गौरतलब है कि भारत में 11 अप्रैल से लेकर 19 मई के बीच 17वीं लोकसभा के लिये मतदान हुआ.

इस बार के ‘स्पेशल 301’ रिपोर्ट में भी भारत के पेटेंट कानून को निशाना बनाया गया है और उसमें सुधार करने के लिये कहा गया है.

17वीं, 18वीं और 19वीं शताब्दी के आधे समय में जब भारत पर पुर्तगाल और अंग्रेजों का शासन था, तब वे अपने हिसाब से कानून बनाते थे. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि आज 21वीं सदी में भी स्वतंत्र भारत के कानून को बदलने के लिये अमेरिका दबाव बना रहा है. ‘स्पेशल 301’ की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय पेटेंट कानून के पेटेंट के मापदंड, अनिवार्य लाइसेंसिंग और डाटा एक्सक्लूसिविटी को अमेरिकी व्यापार को सुगम बनाने के लिये बदला जाना चाहिए, जबकि भारत का वर्तमान पेटेंट कानून पूरी तरह से ‘विश्व-व्यापार-संगठन’ के अनुसार बना है और अपने देश में दवाओं को कम दाम में उपलब्ध करवाने के लिए उसमें दिए गए लचीलेपन का पूरा लाभ उठाया गया है.

भारत के दवा बाजार पर अमेरिकी प्रशासन की टेढ़ी नजर होने के दो कारण हैं. पहला, भारत का विशाल दवा बाजार और भारत द्वारा दुनिया के करीब 165 छोटे-बड़े देशों में दवाओं का निर्यात किया जाना. गौरतलब है कि भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग की साल 2017-18 की सलाना रिपोर्ट के अनुसार साल 2016-17 के दौरान भारत का दवा बाजार 2 लाख 19 हजार 755 करोड़ रुपये का रहा है, जिसमें से 1 लाख 7 हजार 618 करोड़ रुपयों का निर्यात किया गया.

उल्लेखनीय है कि भारतीय दवा कंपनियां मोजाम्बिक, रवांडा, दक्षिण अफ्रीका और तंजानिया जैसे कम विकसित देशों को एड्स की दवा कम कीमत पर निर्यात करती हैं. भारतीय दवा कंपनियां अमेरिका जैसे विकसित देशों को भी कम कीमत में उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं की सप्लाई करती हैं. जाहिर है कि इस कारण से अमेरिकी दवा कंपनियों को अपनी दवाओं के दाम कम करने पड़ते हैं. उदाहरण के तौर पर साल 2001 में भारतीय दवा कंपनी सिपला ने अफ्रीकी देशों के एड्स मरीजों को 350 डॉलर के मूल्य पर एक मरीज के लिए एक साल की दवा सप्लाई की और कई सरकारों को 600 डॉलर में एड्स की दवा की सप्लाई की थी. फलस्वरूप, इसी दवा की खुराक को 10 से 15 हजार डॉलर में बेचने वाली विदेशी दवा कंपनियों को अपने दवाओं के दाम कम करने पड़े थे.

अब आपको स्पष्ट हो रहा होगा कि आखिर क्यों अमेरिकी प्रशासन के नेतृत्व में दुनियाभर के दवा क्षेत्र के निगम घराने भारत पर दबाव बना रहे हैं. विदेशी दवा कंपनियां चाहती हैं कि भारत की दवा कंपनियां आधुनिक जीवनरक्षक और आवश्यक दवाओं का निर्माण ही ना कर सकें. इसके लिए भारतीय कानून में तीन प्रमुख बदलाव लाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. ये तीनों हैं- भारतीय पेटेंट कानून की दो उपधारा पेटेंट के मापदंड, अनिवार्य लाइसेंसिंग और ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट की उपधारा डाटा एक्सक्लूसिव. अब हम क्रमवार ढंग से इन तीनों पर चर्चा करेंगे.

इसके अलावा भारतीय पेटेंट कानून के पेटेंट निरस्तीकरण की उपधारा को भी विदेशी गैर-जरूरी मानते हैं, जो यह अधिकार देता है कि कोई भी तीसरी पार्टी पेटेंट के खिलाफ आवेदन कर सकती है और उसे निरस्त करा सकती है. इसके लिए कारण दिए गए हैं, जिसके तहत पेटेंट निरस्तीकरण का आवेदन किया जा सकता है. इसमें कहा गया है कि “….that the invention so far as claimed in any claim of the complete specification is not new, having regard to what was publicly known or publicly used in India before the priority date of the claim or to what was published in India or elsewhere in any of the documents…”

पेटेंट के मापदंड

विदेशी चाहते हैं कि ज्यादातर दवाओं पर उनका पेटेंट एकाधिकार रहे और कोई दूसरा इन्हें ना बना सके, ना ही बेच सके. भारतीय पेटेंट कानून में यूपीए-1 सरकार के दौर में साल 2005 में संशोधन किया गया था. उस समय लोकसभा में वामपंथी सांसदों की संख्या 61 थी और यूपीए-1 की सरकार उनके समर्थन पर ही टिकी हुई थी. वामपंथी सांसदों के दबाव के चलते ‘विश्व-व्यापार-संगठन’ के लचीलेपन का फायदा उठाया गया और भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3 (डी) के तहत किसी दवा को पेटेंट कराने के मापदंड को कठोर कर दिया गया.

फलतः भारत में केवल नई दवाओं पर ही पेटेंट मिल सकता है. इसके तहत किसी दवा के साल्ट, ईस्टर, ईथर, पॉलीमार्फ, मेटाबोलिटिस, प्यूरफॉर्म, पार्टिकल साइज, आइसोमर, आइसोमर के मिश्रण, काम्बिनेशन और डेरिवेटिव को पेटेंट के योग्य नहीं माना गया है.

याद कीजिए कि स्विस दवा निगम नोवार्टिस अपने रक्त कैंसर की दवा Glivec (imatinib mesylate) पर पेटेंट एकाधिकार चाहता था, जिसे भारतीय पेटेंट कानून के अनुसार नहीं दिया गया था. नोवार्टिस इस मुद्दे को लेकर भारतीय सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल सकी. इस कारण से रक्त कैंसर की इस दवा को, जिसकी एक माह की खुराक को नोवार्टिस 1 लाख 20 हजार रुपयों में मुहैय्या करवाता था, हैदराबाद की दवा कंपनी नैट्को मात्र 9 हजार रुपयों में देती है.

अनिवार्य लाइसेंसिंग

पेटेंट कानून की उपधारा अनिवार्य लाइसेंसिंग के तहत सरकार किसी भी पेटेंटेड दवा को जनहित में उसके पेटेंटधारी की अनुमति के बगैर ही किसी दूसरी दवा कंपनी को बनाकर बेचने का अधिकार दे सकती है. मूलतः जब दवा का दाम अत्याधिक हो या उसकी उपलब्धता को बढ़ाने के लिये सरकार जनहित में ऐसा निर्णय ले सकती है. यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्य है और विश्व व्यापार संगठन के नियमानुसार इसकी अनुमति भी है.

उल्लेखनीय है कि मार्च 2012 में यूपीए-2 की सरकार ने जर्मन महाकाय दवा कंपनी बायर की किडनी कैंसर की दवा Nexavar (Sorafenib tosylate) पर एक भारतीय दवा कंपनी को अनिवार्य लाइसेंसिंग के तहत बनाने और बेचने की अनुमति दे दी थी. बायर इस दवा की एक माह की खुराक को 2 लाख 80 हजार रुपयों में उपलब्ध कराती थी, जिसे भारतीय दवा कंपनी नैट्को ने 10 हजार रुपयों से कम में ही भारतीय बाजार में उपलब्ध करा दिया था.

डाटा एक्सक्लूसिविटी

भारत के ‘Drugs and Cosmetics Act 1940’ के तहत किसी पेटेंटधारी को मात्र 4 साल के लिए ही उसके द्वारा जमा कराए गए तथ्यों और आंकड़ों पर एकाधिकार मिलता है और 4 साल की गणना उसी दिन से शुरू हो जाती है, जिस दिन से इसके लिए आवेदन किया गया हो. आपकी जानकारी के लिये बता दें कि जब कोई दवा कंपनी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के दफ्तर में दवा को हमारे देश में बेचने और बनाने की अनुमति लेने जाती है, तो उसे उस दवा के बारे में और मनुष्यों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार से जानकारी देनी पड़ती है. विदेशी दवा कंपनियां नहीं चाहती हैं कि उनके द्वारा जमा कराए गये इस डाटा का उपयोग करके कोई दूसरी दवा कंपनी इसी दवा को भारत में बेच सके. हालांकि, भारतीय कानून के अनुसार 4 साल के लिये डाटा एक्सक्लूसिविटी दी जाती है लेकिन विदेशी दवा कंपनियां चाहती हैं कि इसे बढ़ाया जाए, जिससे उन कंपनियों को पेटेंट अधिकार के अलावा भी अपनी दवा पर एकाधिकार कायम करने के लिये एक और कानूनी औजार मिल जाए.

दरअसल, अमेरिका के नेतृत्व में विदेशी दवा कंपनियां ‘स्पेशल 301’ रिपोर्ट के माध्यम से चाहती हैं कि दुनियाभर में दवाओं के दाम कम ना हों और उन पर बहुराष्ट्रीय दवा निगमों का एकाधिकार बना रहे. अमरीका की साल 2018 की ‘स्पेशल 301’ की रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है कि “…….Companies across different sectors remain concerned about narrow patentability standards, the potential threat of compulsory licensing and patent revocations, as well as overly broad criteria for issuing such licenses and revocations under the India Patents Act.”

अब आपको स्पष्ट हो गया होगा कि आखिर क्यों अमेरिकी प्रशासन भारत के कानूनों में मनचाहा बदलाव करना चाहता है. इसी कारण से हमने इस लेख का शीर्षक दिया है ‘अमेरिका के निशाने पर है भारतीय कानून’. लेकिन यदि इसे कार्यरूप में समझा जाए तो ट्रंप प्रशासन मोदी सरकार पर दबाव डाल रहा है कि वह अपने देशज कानूनों को बदले.

हालांकि, अमेरिका काफी समय से भारत पर दबाव डाल रहा है. लेकिन वैश्विक परिस्थिति को देखें तो अमेरिका आज पहले से ज्यादा हमलावर रुख अपनाये हुए है. इस कारण से भारत को सजग रहना पड़ेगा और देशी एवं विदेशी मरीजों के हित में जीवनरक्षक दवायें कम मूल्य पर उपलब्ध होती रहें, अपने इस पुराने रुख पर डटे रहना होगा. तभी तो भारत के विश्व-गुरू बनने का दावा किया जा सकता है.