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ऐसे लिखी गई कांग्रेस की जीत की पटकथा

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इन दिनों राजनीतिक बहसों में यह सवाल चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है कि क्या मध्य प्रदेश सहित पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव, असल में एक तरह से अप्रैल 2019 में होने वाले आम चुनाव का एक्ज़िट पोल ही हैं? इसके तर्क में इन्हीं राज्यों में हुए 2013 के विधानसभा चुनावों के परिणामों को रेखांकित किया जा रहा है. तब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारों को बेहतर प्रदर्शन के साथ अपने को दोहराने का मौका मिला था.

राजस्थान में कांग्रेस सरकार को पछाड़ कर भाजपा ने अपनी सरकार बनाई थी. मिजोरम में कांग्रेस सरकार बनी थी और तेलंगाना राज्य तब अस्त्तित्व में नहीं था, वह आंध्रप्रदेश का हिस्सा था, जहां पर कांग्रेस सरकार थी. पांच राज्यों से आए नतीजों में हिंदी पट्टी के तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भाजपा को मिली करारी मात ने भाजपा की अपराजेयता के मिथक को ध्वस्त कर दिया है. इस तरह यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए खतरे की घंटी भी है. 31 प्रतिशत मत हासिल कर सत्ता में आई सरकार के लिए यह कोई अप्रत्याशित बात भी नहीं है.

चुनावों के इतिहास को देखें तो उससे भी यही पता चलता है कि मतदाता के रुख में चार-पांच महीनों के अंतराल में कोई बड़ा अंतर नहीं आता. वह विधान सभा में जिसे वोट करता है, उसे ही लोकसभा चुनाव में भी वोट करता है. जीत के असर से विजेता दल को कुछ और प्रतिशत मतों का अतिरिक्त लाभ भी होता रहा है.

मध्यप्रदेश विधान सभा में 230 सीटें हैं. कांग्रेस को 114, भाजपा को 109, निर्दलीयों को 04, बसपा को 02 और सपा को 01 स्थान मिला है. इस तरह कांग्रेस बहुमत से केवल 02 स्थान पीछे है, पर उसे सपा, बसपा और निर्दलों का समर्थन हासिल हो जाने की सूचनाएं हैं. निर्दलों में अधिकांश कांग्रेस के ही बागी हैं. 2013 में कांग्रेस ने 146 ग्रामीण सीटों में से केवल 46 यानी 31 प्रतिशत सीटें ही जीती थी. पर इस बार उसे 81 सीटें मिलीं हैं यानी लगभग दोगुनी.

चुनावी नतीजों की अंचलवार स्थिति

मध्यप्रदेश राज्य छह अंचलों मध्य क्षेत्र, मालवा-निमाड़, ग्वालियर-चंबल, महाकोशल, विंध्य और बुदेलखंड से मिलकर बना है. इन अंचलों की अपनी लोक संस्कृति है, तो राजनीतिक रुझान भी अपने ही किस्म का है.

मध्य क्षेत्र में विधानसभा की कुल 36 सीटें आती हैं. 2013 में यहां से भाजपा के पास 29 और कांग्रेस के पास मात्र 06 सीटें थीं, 01 सीट अन्य के पास थी. इस बार भाजपा के पास 23 और कांग्रेस के पास 13 सीटें हैं. यानी भाजपा को 06 सीटों का नुकसान हुआ है और कांग्रेस को 07 सीटों का फायदा हुआ है.

मालवा निमाड़ इलाके की 66 सीटों में से 2013 में भाजपा को 56 और कांग्रेस को 09 सीटें हासिल हुई थीं. इस बार भाजपा आधी सीटें गवांकर 28 पर आ गई है और कांग्रेस लगभग चार गुना से भी ज्यादा बढ़कर 35 सीटों पर पहुंच गई है. यहां पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का खासा असर माना जाता है.

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की 34 सीटों में से 2013 में भाजपा को 20 और कांग्रेस को मात्र 12 सीटें ही हासिल हुई थीं. इस बार भाजपा 07 पर सिमट गई है और कांग्रेस ने दो गुना से ज्यादा तरक्की करते हुए 26 सीटें पाई हैं. यह कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाला क्षेत्र है.

महाकोशल क्षेत्र की 38 सीटों में से 2013 में भाजपा को 24 और कांग्रेस को 13 सीटें हासिल हुई थीं. इस बार भाजपा की सीटें घट कर आधी हो गयी हैं. उसे 12 सीटें ही मिली हैं. कांग्रेस ने 24 सीटें लेकर अपनी बढ़त को दो गुना कर लिया है. यहां कांग्रेस नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का राजनीतिक असर है. प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सांसद राकेश सिंह भी यहीं से हैं. चुनाव परिणामों के कारण उनकी साख को बट्टा लग गया है.

विंध्य क्षेत्र में 30 सीटें हैं. 2013 में यहां से भाजपा को 17 और कांग्रेस को 11 सीटें मिली थीं. इस बार भाजपा को यहां से पहले की तुलना में बढ़त मिली है. उसने 24 सीटें पाई हैं, जबकि कांग्रेस ने 5 सीटें गंवाकर अपने को 06 पर पहुंचा दिया है. यहां पर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र और नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह का खासा असर माना जाता था, परंतु इस बार वे स्वयं अपना चुनाव हार गए हैं.

बुंदेलखंड में 26 सीटें हैं. 2013 में भाजपा को 20 और कांग्रेस को 06 सीटें ही मिली थीं. इस बार भाजपा को यहां से 4 सीटें कम होकर 16 सीटें मिली हैं, जबकि कांग्रेस ने 2 सीटों की बढ़त से अपने को 08 पर पहुंचा दिया है. इस क्षेत्र में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का प्रभाव माना जाता है.

कांग्रेस की रणनीति

इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने न केवल उत्साहपूर्वक चुनाव लड़ा, बल्कि उसने रणनीतिक स्तर पर भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा गंभीरता दिखाई. सर्वप्रथम चुनाव से सवा साल पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ज़मीन पर उतरे. उन्होंने मध्यप्रदेश की राजनीति से अपने को पिछले पंद्रह सालों से अलग-थलग सा कर रखा था.

वे 1993 से 2003 तक दस सालों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. 2003 में कांग्रेस के पराजित हो जाने पर उन्होंने आगे के दस सालों तक सत्ता का कोई पद न लेने का संकल्प लिया था और उसका पूरी तरह से निर्वाह भी किया. दूसरी तरफ प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस लगातार पिछड़ती चली गई और उसके प्रांतीय कर्णधारों के कद बौने साबित होने लगे.

तब दिग्विजय सिंह, कांग्रेस के सबसे विपरीत समय में, उसकी राजनैतिक असफलताओं के घने कुहासे को मिटाने स्वस्फूर्त तरीके से मैदान में निकल पड़े थे.

खुद को आंकने और प्रदेश की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होने की खातिर, उन्होंने 3100 किलोमीटर लंबाई वाली और लगातार छह महीनों तक चलने वाली नर्मदा परिक्रमा को पदयात्रा के माध्यम से संपन्न किया. सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 तक चली इस यात्रा में लाखों लोगों ने उनसे आकर मुलाकातें कीं.

कांग्रेस की काया में प्राणों का संचार हुआ. जब कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं ने दिल्ली-भोपाल में ही अटके रहने की जीवन शैली इख्तियार कर रखी थी और ज़िला मुख्यालयों तक में एक रात बिताने से भी परहेज़ कर रखा था, तब कांग्रेस के इस क़द्दावर नेता ने 200 से ज्यादा रातें, गांवों में आम लोगों के बीच बितायीं. उनके दुख-दर्द सुने. अपनी लोकप्रियता के अनंत ग्राफ को जाना.

अर्द्ध-मूर्च्छा में चली गई कांग्रेस को जगाया. उनकी एक छवि यह भी है कि वे भाजपा की सांप्रदायिक सोच तथा देश की समरसता को तोड़ने वाली उसकी नीतियों पर सार्वजनिक मुखरता को बनाये रखने वाले राजनेता हैं.
इसी दौरान कांग्रेस आलाकमान के द्वारा पूर्व केंद्रीय मंत्री और छिंदवाड़ा से लगातार सांसद चुने जाने वाले नेता कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया गया. जहां कमलनाथ की छवि एक गंभीर और विश्वसनीय नेता के तौर पर है, वहीं सिंधिया युवाओं में अपने विशेष आकर्षण के लिये जाने जाते हैं.

इस तरह मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय-सिंधिया की सबसे दमदार तिकड़ी ने यह संदेश देने में कामयाबी हासिल की, कि कांग्रेस जीतने के लिये और भाजपा के अनैतिक बोझ से प्रदेश को मुक्ति दिलाने के लिये कमर कस कर मैदान में पहुंच गई है.

नर्मदा यात्रा को संपन्न करने के तुरंत बाद ही दिग्विजय सिंह ने ‘पंगत में संगत’ नाम से कांग्रेस समन्वय अभियान शुरु कर दिया था. उन्होंने चुनाव न लड़ने का संकल्प लेने वाले और केवल संगठन के लिये ही काम करने वाले नेताओं की एक प्रभावशाली टीम बनाई. पूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा जैसी कांग्रेस विचारधारा के प्रति अपना जीवन ही समर्पित कर देने वाली शख़्सियत ने नर्मदा परिक्रमा के बाद इस अभियान में भी उनके कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया. इस अभियान के तहत वे प्रदेश के सभी ज़िलों में गए.

कांग्रेस के वर्तमान-पूर्व सांसदों, विधायकों, महापौरों, अध्यक्षों से सीधी बातचीत की. कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं के साथ टाट-पट्टी पर बैठकर खाना खाया. उन्हें अन्न-जल की शपथ दिलायी, कि वे कांग्रेस को जिताने के लिये प्राण-पण से काम करेंगे.

इस तरह कमलनाथ ने संगठन के स्तर पर, दिग्विजय सिंह ने जमीनी स्तर पर और सिंधिया ने युवाओं को जोड़ने के लिये विश्वविद्यालय स्तर पर अभूतपूर्व क्षमताओं का प्रदर्शन किया. यही तिकड़ी आर्थिक, राजनीतिक और नौकरशाही के पुरजोर समर्थन से जारी शिवराजसिंह की लूट-खसोट वाली सरकार के लिये सबसे कारगर चुनौती बनी.

भाजपा की पराजय के कारण

भाजपा सरकार के पंद्रह साल कार्यकाल के दौरान मध्य प्रदेश लूट-खसोट का अभयारण्य बन चुका था. युवाओं को रोजगार मुहैया कराने की बजाय, उनके भविष्य के साथ क्रूरतम मजाक करने के लिये किया गया, व्यापमं घोटाला वैश्विक कुख्याति अर्जित कर चुका था. व्यापमं घोटाले के महत्वपूर्ण सूत्र कहे जाने वाले 50 लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों ने उसकी भयावहता का एक नया इतिहास ही रचा है.

नर्मदा नदी सहित प्रदेश की तमाम नदियों से रेत के अवैध उत्खनन ने, नदियों के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया है. शिवराज अपने को किसान-पुत्र कहते नहीं थकते और मंदसौर में किसानों पर उन्हीं की सरकार ने गोलियां चलवायीं. प्रदेश के हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ में दब कर आत्महत्याएं कीं. बुंदेलखंड पैकेज घोटाले जैसे असंख्य घोटाले हुए.

अनुसूचित जाति, जन जाति अत्याचार निवारण कानून में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किये गये संशोधन को संसद में उलटने और अनुसूचित जाति और जन जाति को मिलने वाले आरक्षण को समाप्त करने के भाजपाई इरादों ने भाजपा शासन विरोध की आग में घी का काम किया. गले में पीला गमछा डालकर सड़कों पर गुंडागर्दी करने वालों ने नागरिकों का चैन छीन लिया था.

अवैध खनिज उत्खनन करने वाले अपराधियों ने ईमानदार प्रशासनिक अफसरों को डंपर से कुचला. प्रदेश में पिछले पंद्रह सालों के दौरान कोई डेढ़ सौ सरकारी अधिकारी-कर्मचारी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हुए कुरबान कर दिये गये. पुलिस का रोज ही अपमान हो रहा था. भाजपा ने उन्हें अपना जर-खरीद गुलाम समझ रखा था. पूरी की पूरी नौकरशाही अपमान और हताशा के गर्त में पहुंचा दी गयी थी.

इस बार भाजपा के पास अपने पक्ष में बताने के लिये सकारात्मक मुद्दों और उपलब्धियों के तौर पर कुछ भी नहीं था. अपनी इज्जत बचाने की खातिर भाजपा ने पांच मंत्रियों सहित 53 विधायकों के टिकट काट दिये थे. मुख्यमंत्री की ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ में सरकारी संसाधनों से जुटायी गयी भीड़ तो दिखती रही, परंतु उसने भाजपा के पक्ष में कोई योगदान नहीं किया.

जहां मुख्यमंत्री पंद्रह साल पहले की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल को ही कोसते रहने की अपनी एकरसता से मतदाताओं में ऊब पैदा करते रहे, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘विधवाओं की पेंशन को कांग्रेस की एक विधवा खा गयी’ और ‘मेरी मां को गालियां दे रहे हैं’ जैसे अनर्गल और थोथे जुमलों के जरिये जनता को एक बार फिर से फुसला ले जाने में कामयाब साबित नहीं हुए.

उनके भाषणों का विपरीत असर हुआ. मध्यप्रदेश गरियाने वालों को नहीं, विनयशील राजनेताओं को तरजीह देने वाली संस्कृति का प्रदेश रहा है.

मोदी के प्रति ‘आंख मूंदकर’ किए जाने वाले विश्वास के कच्चे घड़े में, इस बार तीखी दरारें दिखाई दीं और उनकी आक्रामक अंदाज वाली मंचीय कला का जादू भी बिखरता हुआ नज़र आया. लोग उनकी भाषा शैली की स्तरहीनता को नकारने लगे हैं.

दोनों तरफ के दिग्गज हारे

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के 13 मंत्री चुनाव हार गये हैं. इनमें जयंत मलैया, उमाशंकर गुप्ता, जयभान सिंह पवैया, अर्चना चिटनिस और रुस्तम सिंह प्रमुख हैं. कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं रही. उसके दिग्गजों में विपक्ष के नेता और अर्जुनसिंह के पुत्र अजयसिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव और विधान सभा के स्पीकर राजेंद्र सिंह चुनाव में खेत रहे.

राहुल गांधी समग्र प्रतिपक्ष के केंद्र में आए

राहुल गांधी ने हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पार्टी की विजय का झंडा फहराकर अपने को महागठबंधन की भावी राजनीति के केंद्र में पहुंचा दिया है. उनके प्रति भाजपा के द्वारा गढ़ी गयी कृत्रिम छवि भी धराशायी हुई है. वे राफेल वाला मामला उठाकर भाजपा और मोदी को बैकफुट पर लाने में कामयाब रहे.

कांग्रेस का कर्ज माफी वाला मुद्दा किसानों में लोकप्रिय बना और वे कांग्रेस के साथ आ खड़े हुए. कांग्रेस ने इस बार साफ्ट हिंदुत्व भी अपनाया, क्योंकि भाजपा ने जनता के बीच में उसकी एक मुस्लिम-पार्टी वाली छवि बनाने का कुचक्र चला रखा था. कांग्रेस ने यह जताने की कोशिश में सफलता पायी है कि वह धर्म को निजी जीवन का अकाट्य हिस्सा मानती है, पर उसका पाखंड नहीं रचती.

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल गांधी द्वारा जिस अंदाज में पत्रकार-वार्ता को संबोधित किया गया, उसने भी यह संदेश दिया कि वे गंभीर, सदाशयी, विनम्र और परिपक्व राजनेता हैं. पत्रकारों और जनता के मन में सहज रूप से यह भाव पैदा हुआ कि वे अक्खड़, अहंकारी और मुंहफट नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से कहीं भिन्न मानसिकता वाले व्यक्ति हैं.

यह कह कर तो राहुल गांधी ने भाजपा को भी हतप्रभ कर दिया, कि ‘जहां भाजपा हारी है उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जनता के लिये अपनी क्षमतानुसार काम किया है. इसके लिये उन्हें बधाई.’

राहुल गांधी ने विनम्रता के बावजूद इस संकल्प को भी पूरे आत्मविश्वास के साथ व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और प्रदेशों की सरकारों ने जनता से किेए वादे पूरे नहीं किए, इसलिए वे जनता से पराजित हो गए. तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस देश में बदलाव लाने के लिये काम करेगी. 2019 में भाजपा को परास्त किया जायेगा. पर हम नहीं चाहते कि देश भाजपा मुक्त हो. हम विपक्ष के अस्तिव के खिलाफ नहीं हैं.

चुनाव की मोदी शैली पराजित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी व्यक्तिवादी सोच और अहंकार के शिखर पर विराजमान रहने के चलते, देश के ही नहीं प्रदेशों के चुनावों को भी अपना निजी चुनाव बनाने की मानसिकता से ग्रस्त रहते हैं. इस बार इसी का खामियाजा पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को भुगतना पड़ा है. मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की छवि एक विनम्र नेता की है, पर मोदी-अमित शाह की अहंकारी छवि ने उन्हें पार्श्व में पहुंचाने का काम किया. ‘अबकी बार, 200 पार’ का नारा उसी अहंकार का पुत्र बनकर मारा गया. इन चुनावों के कारण इस जोड़ी के अजातशत्रु होने का भ्रम भी टूट गया.

2019 के लिये संकेत

इन पांच राज्यों में मतदाता ने जैसा रुख दिखाया है, यदि उसका 2019 में यही रुख बरकरार रहा, तो भाजपा को देश के 16 राज्यों यानी मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मिजोरम, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, प. बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, झारखंड, असम, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल में 120 सीटों का घाटा उठाना पड़ेगा.

जहां पर उसका सीधा मुकाबला कांग्रेस के साथ है, वहां पर भाजपा के खाते वाली सीटें निकलकर कांग्रेस की झोली में जाने का अनुमान है. 2014 में उसे इन राज्यों से 266 और कांग्रेस को 24 सीटें मिली थीं. भाजपा ने यदि 120 सीटें गंवाई तो उसके पास केवल 146 सीटें ही बचेंगी. इतनी सीटों की भरपायी उत्तर-पूर्व से हो पाना असंभव ही होगा.