सुर्ख़ियां


हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह: मौलिक अधिकारों से टकराता एक और धार्मिक संस्थान

pil related to entry in nizamuddin dargah

  फोटो साभार-विकीपीडिया

10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्युमन राइट्स की घोषणा की थी. इसमें पूरे विश्व से सभी तरह का भेदभाव (धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग, उम्र आदि) का उन्मूलन करने के साथ-साथ विश्व के सभी नागरिकों को उनके मूलभूत अधिकार दिए जाने की घोषणा की गई थी.

10 दिसंबर 2018 को यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स की 70 वी वर्षगांठ पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए दिल्ली की हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति के लिए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और दरगाह ट्रस्ट को नोटिस जारी किया है.

दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और न्यायाधीश वीके राव की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है. पीठ ने 11 अप्रैल 2019 को इस मामले की अगली सुनवाई तय की है.

विवाद क्या है?

कुछ दिन पहले पुणे से कुछ कानून की छात्राएं दिल्ली आई थीं और वो सभी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गई. वहां जाकर उन्हें पता लगा कि दरगाह के खास हिस्से में महिलाओं को जाने कि अनुमति नहीं है, जो कि वहां पर हिंदी और अंग्रेजी भाषा में निर्देशित हैं. जिसके कारण महिलाएं बाहर से ही दरगाह को देख कर प्रार्थना कर सकती हैं.

इसको लेकर इन कानून की छात्राओं ने पुलिस से भी शिकायत की मगर उनको न्याय नहीं मिला. तब उन छात्राओं ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा जनहित याचिका के जरिए खटखटया और मांग की कि दरगाह में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह अंदर जाने की अनुमति मिलनी चाहिए. उन्होंने इसे मूलभूत अधिकारों का हनन बताया.

यह जनहित याचिका इस रोक को असंवैधानिक करार देने की अपील करती है. छात्राओं की ओर से अधिवक्ता कमलेश मिश्रा ने यह जनहित याचिका दायर की है.

जनहित याचिका में 28 सितंबर 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सबरीमला फैसले को मुख्य आधार बनाया गया है. केरल के सबरीमला मंदिर मे 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं थी. इसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था.

सबरीमला विवाद में महिलाओं को रोकने के पीछे कारण महिलाओं का मासिक धर्म था. इसी आदेश को आधार मानते हुए याचिका मांग करती है कि दरगाह में भी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति ना देना असंवैधानिक है. यह सीधे तौर पर महिलाओं से लिंग के आधार पर भेदभाव है.

संविधानिक प्रावधान

दरगाह में महिलाओं की रोक भारतीय संविधान के भाग 3 (मूलभूत अधिकार) के अनुच्छेद 14, 15, 21 ओर 25 का उलंघन करती है. अनुच्छेद 14 के मुताबिक कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं. अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव के खिलाफ सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है. अनुच्छेद 21 सभी लोगों को सम्मान से जीने का अधिकार प्रदान करता है. और अनुच्छेद 25 सभी लोगों को अपनी पसंद का धर्म चुनने और पालन करने का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है.

भारतीय न्यायपालिका और धर्म संबंधी मामले

भारतीय संविधान के भाग 3 में व्यक्तिगत और समूहिक अधिकारों को विशेष दर्जा दिया गया है. किसी भी समाज में आमतौर पर व्यक्तिगत और समूह के अधिकारों के मध्य विवाद उत्पन होता रहता है. धर्म के मामलों में इस तरह के विवाद और भी ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं.

ऐसे मामलों को सुलझाने के लिए क्या किया जाए यह एक गंभीर और महत्वपूर्ण सवाल है. भारतीय न्यायपालिका ने इस तरह के मामलों को सुलझाने के लिए दो महत्वपूर्ण नियम निर्धारित किए हैं-

1) न्यायपालिका इस विषय पर गौर करेगी कि किसी धर्म की कोई खास परंपरा क्या उस धर्म का अभिन्न अंग है? अगर नहीं है तो उसे न्यायपालिका निरस्त कर देगी.

2) जब भी व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों में विवाद होता है, तो न्यायपालिका हमेशा उस धर्म की विवादित परंपरा को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के साथ जोड़कर देखती है. अगर वो विवादित परंपरा इन अधिकारों से मेल नहीं खाती तो न्यायपालिका उस परंपरा को निरस्त कर देती है.

भारतीय लोकतंत्र में इस तरह के विवादों के दौरान न्यायपालिका ने हमेशा व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा को महत्व दिया है. शाहबानो (1986) का मशहूर मामला इस की मिसाल है. 2017 में तीन तलाक का मामला इसका दूसरा उदाहरण है. और 2018 में सबरीमला का ताजा मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है.

21 वीं शताब्दी में हम अधिकारों के समय में जी रहे हैं. अधिकार मनुष्य के लिए बहुत महवपूर्ण होते हैं जो किसी भी तरह के भेदभाव और अन्याय से लड़ने के लिए जरूरी होते हैं.

हालांकि अधिकारों का वर्गीकरण भी हुआ है, लेकिन सभी तरह के अधिकारों मे मूलभूत अधिकार सर्वोच्च अधिकार होते हैं. जिनको ना राज्य और ना कोई मनुष्य छीन सकता है. मूलभूत अधिकार मनुष्य को केवल जन्म लेने से ही प्राप्त हो जाते हैं, उसके लिए कोई खास उम्र या लिंग का होना जरूरी नहीं है.

दरगाह ट्रस्ट को महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक स्वयं हटा लेनी चाहिए. कोर्ट में संवैधानिक प्रावधानों से टकराने पर इसका अंजाम भी सबरीमला जैसा होना तय है.

दीपक कुमार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में लॉ के शोधार्थी हैं.