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वैसे भी असल मुद्दा कुछ और है

 

मौका मुतुवेल करुणानिधि की प्रतिमा के अनावरण का था. डीएमके ने इसे विपक्षी एकजुटता को दिखाने का अवसर बनाया. वहां जुटे गैर-बीजेपी नेताओं के बीच डीएमके नेता एम.के. स्टालिन ने अचानक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अगले आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव रख दिया. अलग-अलग गैर-बीजेपी दलों की जो प्राथमिकताएं हैं, उसके बीच इस पर उनके बीच मतभेद उभरना अस्वाभाविक नहीं है. तो ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ने खुलेआम जता दिया कि वे स्टालिन के प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं. कुछ और नेताओं की तरफ से ऐसी प्रतिक्रिया आए, तो उसमें कोई अचरज नहीं होगा.

अभी जबकि गैर-बीजेपी पार्टियों के गठबंधन का स्वरूप तक तय नहीं है और विभिन्न राज्यों में तालमेल के सवाल पर ऊहापोह है, नेता के प्रश्न पर चर्चा करना जल्दबाजी ही माना जाएगा. बहरहाल, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर विवाद करने और इस पर झगड़ते दिखने से बेहतर होगा कि बीजेपी विरोधी पार्टियां यह साफ करने की कोशिश करें कि आखिर वे बीजेपी का विकल्प क्यों देना चाहती हैं? यह तो साफ है कि नरेंद्र मोदी- अमित शाह की राजनीतिक शैली से ये पार्टियां नाराज हैं. बीजेपी की हिंदुत्ववादी नीतियों से भी उन्हें असहमति हो सकती है. ये अपने-आप में विरोध के जायज मुद्दे हो सकते हैं. लेकिन सिर्फ विरोध विकल्प का आधार नहीं हो सकता. अहम सवाल है कि केंद्र या अलग-अलग राज्यों में शासन देने के लिए किस बेहतर नीति और कार्यक्रम को ये पार्टियां तैयार करने में जुटी हैं?

अफसोसनाक है कि इस मोर्चे पर ज्यादातर पार्टियां कोई व्यावहारिक एजेंडा रखने में अब तक कामयाब नहीं हुई हैं. राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी के विरोध का एक सीमित कार्यक्रम आधारित एजेंडा देश के सामने ज़रूर रखा है. सामाजिक-सांस्कृतिक उदारता, राजनीतिक संवाद में शिष्टता और कुछ लोक-लुभावन घोषणाएं इसका हिस्सा हैं. लेकिन प्रगति और विकास का कोई ठोस मॉडल कांग्रेस भी पेश कर पाई है, अभी ऐसा नहीं लगता.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार से समाज के कई तबके ख़फा और परेशान हैं. इस बीच कांग्रेस में दिखे चंद सकारात्मक संकेतों से उन्हें बड़ी राहत महसूस हो रही है. जाहिर है, राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी का विश्वसनीय विकल्प बताया जाने लगा है. कहा गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने पहले साल में राहुल गांधी एक परिपक्व और उम्मीद जताने वाले नेता के रूप में उभरे हैं. यह भी कहा गया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस अपना ख़ास राजनीतिक कार्यक्रम विकसित कर रही है.

ऐसे में बेहतर होता कि तमाम गैर-बीजेपी पार्टियों के नेता ऐसे कार्यक्रमों की प्रतिस्पर्धा में शामिल होतीं. नेता पर सहमति बनना और सत्ता में आना- विकल्प देने की प्रक्रिया का महज एक पक्ष है. इससे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सत्ता में आने के बाद कोई पार्टी या गठबंधन क्या करेगा. प्रगति और आमजन की खुशहाली का दीर्घकालिक एवं व्यावहारिक एजेंडा अगर ना हो, तो कोई सत्ता टिकाऊ नहीं हो सकती. अतीत में भारत की जनता ने कांग्रेस के विकल्प की तलाश करते हुए तमाम मध्यमार्गी गैर-बीजेपी दलों को भी पर्याप्त मौका दिया. चूंकि ऐसा एजेंडा उनके पास नहीं था, इसलिए अपनी सांप्रदायिक-दक्षिणपंथी नीतियों के बावजूद बीजेपी कामयाब होती गई.

अतः मुख्य सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं. अथवा विपक्षी गठबंधन को उन्हें बतौर अपना उम्मीदवार पेश करे या नहीं. असल मुद्दा है कि बीजेपी विरोधी पार्टियां खुद को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश करें. दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब विकल्प की बात आती है, तो विपक्षी खेमे में सारी बात आंकड़ों के गणित, जातीय समीकरण और प्रस्तावित नेता जैसे सवाल पर दांव चलने तक सिमटकर रह जाती है.