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जो सच है, सामने आया है

editorial on contradiction of economy

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी को सफल बताने के लिए ‘हारवर्ड’ बनाम ‘हार्ड वर्क’ अर्थव्यवस्था की बहस खड़ी की थी.

कहा कि ‘हारवर्ड’ में पढ़े-लिखे अर्थशास्त्रियों ने नोटबंदी के उनके “ऐतिहासिक” कदम की आलोचना की. लेकिन उन्होंने (मोदी ने) अपने ‘हार्ड वर्क’ (कड़ी मेहनत) से उन अर्थशास्त्रियों की बातों को गलत साबित कर दिया.

दरअसल, शुरुआत में सरकार जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को यह समझाने में सफल रही कि नोटबंदी का फैसला आमजन के हित में है. दावा किया गया कि इससे कुछ शुरुआती दिक्कतें जरूर आई हैं, लेकिन आगे चलकर इसके फायदे सामने आएंगे. अर्थव्यवस्था, खेती-बाड़ी और ग्रामीण जिंदगी को समझने वाले जानकारों में कभी ऐसा आशा नहीं रही.

नोटबंदी के बाद आने वाली तमाम अध्ययन और रिपोर्टें इस कदम के कारण देहाती इलाकों में आई मुसीबत पर रोशनी डालती रहीं. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से भी जाहिर हुआ कि नोटबंदी के बाद कृषि कर्ज ना चुकाए जाने की दर बढ़ी है.

2016 से 2017 के बीच कृषि ऋण के एनपीए में तब्दील होने की दर में 23 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसके बावजूद सरकार अपनी इस कहानी पर अड़ी रही कि नोटबंदी से सबको फायदा हुआ है. मगर अब उसकी इस कहानी खुद उसके कृषि मंत्रालय ने छेद कर दिया है.

वित्त मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उसने माना है कि नोटबंदी का कृषि क्षेत्र पर बहुत बुरा असर हुआ. तब इसकी वजह से लाखों किसान अपनी फसल नहीं बेच पाए. वे बीज और खाद खरीदने में अक्षम हो गए.

कृषि मंत्रालय ने कहा है कि देश के साढ़े 26 करोड़ से ज्यादा किसानों में से ज्यादातर नकदी अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं. वे सभी और खेतिहर मजदूर नोटबंदी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए. (ये खबर छपने के बाद कृषि मंत्रालय ने एक स्पष्टीकरण जारी किया, लेकिन उसने इसका स्पष्ट खंडन नहीं किया. इस “संक्षिप्त टिप्पणी” में मंत्रालय ने वही कथा दोहराई है, जो एनडीए सरकार बुनने के प्रयासों में जुटी रही है.)

कृषि जानकारों की राय है कि ज्यादातर किसान आज भी नोटबंदी के दुष्प्रभावों से उबर नहीं पाए हैं. 2017 में देश के अलग-अलग हिस्सों जिस तरह किसान आंदोलन का उभार हुआ, उसके पीछे एक बड़ी वजह नोटबंदी के कारण आई मुश्किलों को माना जाता है.

आम समझ है कि खेती-किसानी से जुड़े लोगों की माली हालत ऐसी है कि नोटबंदी जैसा झटका उन पर बेहद भारी पड़ा. उसके असर से संभालना आसान साबित नहीं हुआ है. मौजूदा सरकार के लिए बेहतर होता कि वह इस कड़वे सच को स्वीकार करती. उसके लिए ईमानदार रास्ता होता कि वह ये कहती कि नोटबंदी एक दुस्साहसी फैसला था, जो गलत साबित हुआ. मगर उसके किसी ऐसे इरादे का संकेत नहीं है.

अभी इसी हफ्ते प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य प्रदेश की एक सभा में दावा किया कि ये “कड़वी दवा” देश में गहरी जड़ जमाए बैठे भ्रष्टाचार के इलाज के लिए दी गई थी. नोटबंदी के कारण टैक्स की वसूली बढ़ी, सिस्टम पारदर्शी हुआ और उसके फायदे मिलने शुरू हो गए हैं- ऐसे दावे सरकार करती रही है. मगर वो दावे निराधार हैं, इसकी पुष्टि रिजर्व बैंक सहित दूसरी संस्थाओं और एजेंसियों की रिपोर्टें करती रही हैं. अब कृषि मंत्रालय के निष्कर्षों से जाहिर हुआ है कि सबको लाभ पहुंचने की बात भी खोखली थी.