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एक और नाफरमानी?

more is happening in country that is not being showed says satyapal malik

 

पिछले दिनों हुई कई घटनाओं को प्रशासन पर नरेंद्र मोदी सरकार की पकड़ ढीली होने का संकेत माना गया. अखबारों के गॉसिप कॉलम लंबे समय से ऐसी चर्चाओं से भरे रहे हैं. सीबीआई में जब निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना का झगड़ा खुलकर सामने आया, तो उसे इसी बात की पुष्टि माना गया.

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने अब जो कहा है, उससे ये धारणा और गहरी होगी कि विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारी नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ न सिर्फ नाफरमानी कर रहे हैं, बल्कि उसे सार्वजनिक रूप से जता भी रहे हैं. बहरहाल, मलिक के संदर्भ में यह सवाल भी उठेगा कि क्या मोदी सरकार संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से अनुचित काम करवाना चाहती है?

सत्यपाल मलिक ने कहा, “एक बात साफ कर दूं कि दिल्ली की तरफ देखता तो लोन की सरकार मुझको बनानी पड़ती. और मैं इतिहास में एक बेईमान आदमी के तौर पर जाता. लिहाजा मैंने मामले को ही खत्म कर दिया.” उल्लेखनीय है कि पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन को बीजेपी का समर्थन हासिल है. ये चर्चा काफी समय से थी कि बीजेपी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विधायकों को तोड़कर और अपने समर्थन से लोन की सरकार बनवाना चाहती है. पीडीपी के वरिष्ठ नेता मुजफ्फर बेग ने जब बीजेपी की इस कोशिश में सहायक बनने का संकेत दिया, तब लोन की सरकार बनने की संभावना ठोस रूप लेती लगी.

दरअसल, इसी पृष्ठभूमि में अप्रत्याशित रूप से कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने साथ आकर सरकार बनाने का इरादा जताया. तभी पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सरकार बनाने का दावा करते हुए राज्यपाल को वह बहुचर्चित फैक्स भेजा. इस बीच राज्यपाल ने विधान सभा भंग कर दी. पहले महबूबा मुफ्ती ने इसका विरोध किया था, लेकिन राज्यपाल मलिक के ताजा बयान के बाद उन्होंने कहा- ये अच्छी बात है कि गवर्नर साहब ने दिल्ली का फरमान मानने से इनकार कर दिया. जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र के इतिहास के देखते हुए यह अभूतपूर्व घटना हो सकती है. यानी महबूबा ने यह कहना चाहा कि अब तक इस राज्य में राज्यपाल महज केंद्र का मोहरा रहे हैं, लेकिन मलिक ने इस क्रम को तोड़ा है.

इसके बावजूद मलिक के आचरण पर सवाल बने रहेंगे. जब कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी साथ आ गए तो उनके पास 87 सदस्यीय विधान सभा में 56 सदस्यों का समर्थन हो गया. अगर इस समूह की तरफ से सरकार बनाने का दावा किया गया, तो उसे ठुकराने का क्या वैध तर्क राज्यपाल के पास था? पहले बोम्मई फैसले और फिर बिहार में 2005 में लगे राष्ट्रपति शासन के मामले दिए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट व्यवस्था दे चुका है कि बहुमत के परीक्षण का एकमात्र मंच विधान सभा है. ऐसे में तीन दलों के गठबंधन के बहुमत का परीक्षण ना करवाना कैसे उचित था?

अब ये सवाल उठेगा कि क्या राज्यपाल ने न्यायिक व्यवस्था एवं संसदीय कायदों का उल्लंघन करते हुए बीच का रास्ता अपनाया? अगर उनकी बात सच है, तो यह तो जरूर माना जाएगा कि वे केंद्र के दबाव में नहीं आए. उन्होंने बिल्कुल वह नहीं किया, जिससे जन-आक्रोश भड़कता. मगर उन्होंने वह भी नहीं किया, जो संसदीय मर्यादा के तहत उन्हें करना चाहिए था. बहरहाल, उनकी बात सच है तो नरेंद्र मोदी सरकार किस तरह कायदों का अनादर कर रही है, यह जरूर बेनकाब होता है.