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किसानों के लिए जीरो बजट खेती के मायने

Centre finding wider method to measure farmers income to get it doubled by 2022

 

‘जीरो बजट खेती’ जिसका नामकरण अब सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती हुआ है, आज पूरे देश में चर्चा का विषय बनी है. खेती के लिए यह एक अच्छा संकेत है. समाज में खुला विचार मंथन एक जरुरी प्रक्रिया है. खासकर जब खेती और किसानी की समस्या का समाधान करने में कॉरपोरेट परस्त सरकारें असफल हुई हैं और उनकी लूट करने के लिए उन्हें कॉरपोरेट घरानों के हवाले कर रही हैं, तब अपने बचाव के लिए किसान को खुद ही निर्णय करने पड़ेंगे, अन्यथा आनेवाले दिन उनके लिए और कठिन हो जाएंगे. खेती पद्धति में हो रहे परिवर्तन के संदर्भ में केवल किसान ही नहीं पूरे समाज को सोचना होगा और निष्पक्षता से पड़ताल करनी होगी कि देश और किसान के हित में क्या है?

देश की खाद्य सुरक्षा के लिए पारंपरिक खेती में सुधार पर विचार किए बिना हरित क्रांति के द्वारा रासायनिक खेती को बढ़ावा देना देश और किसान दोनों के विरुद्ध साबित हुआ है. यह उन नीतियों का परिणाम है जिनके द्वारा उत्पादन वृद्धि के लिए किसानों को प्राकृतिक खेती से रासायनिक खेती अपनाने के लिए बाध्य किया गया.

एक तो रासायनिक खेती के कारण किसान की आदान लागत में काफी बढ़ोतरी हुई. लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद उत्पादन वृद्धि के कारण फसलों के दाम गिरने से उसका फायदा किसानों को नहीं मिला. उलटा बहु-फसली खेती एक फसली खेती में रूपांतरित होने से जैव विविधता खतरे में पड़ी, जिससे परिवार का पोषण करने वालीं विविधतापूर्ण फसलें मिलना बंद हो गईं. दूसरा खेती में आदान और पोषक आहार के लिए किसान बाजार पर निर्भर हुआ, जो उसकी लूट बढ़ाने का कारण बना और तीसरा रासायनिक खेती ने भोजन की थाली और पीने के पानी में जहर पहुंचा दिया. जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है. रासायनिक खेती के कारण सिंचाई के लिए पानी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर बढ़ा है.

जैसे-जैसे पूरी दुनिया में जहर मुक्त अन्न की मांग उभरने लगी, रासायनिक खेती के विकल्प ढूंढना जरूरी हो गया. वैकल्पिक खेती के लिए जैविक खेती सामने आई. देश भर की एनजीओ ने इसके लिए मेहनत की. जीरो बजट खेती ने भी किसानों का ध्यान आकर्षित किया. यह सभी रासायनिक खेती का विकल्प देने का काम कर रहे है. अमीरों की विषमुक्त भोजन की चाहत ने भी इस काम को और गति दी है. आज पूरे समाज में रासायनिक खेती को हद्दपार करने के लिए सैद्धांतिक सहमति है और सरकार के समर्थन के बिना किसान स्वयंस्फूर्ति से उसपर अमल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

आज पारंपरिक प्राकृतिक खेती की जगह ऐसी खेती पद्धति अपनाने की जरुरत है, जो पारंपरिक प्राकृतिक खेती में सुधार के साथ देश के खाद्य सुरक्षा और उत्पादन बढ़ाने की रासायनिक खेती की चुनौती को स्वीकार करने में सक्षम हो. साथ ही खेती में आदान लागत में लूट करने वाले बाजारावलंबन से उसे मुक्ति मिले. किसान परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन के लिए खेती में उचित श्रम मूल्य मिले और पूरे समाज को जहर मुक्त थाली मिल सके, जिसे हम ‘नई प्राकृतिक खेती’ कह सकते हैं.

प्राकृतिक खेती का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि वह समाज को जहर मुक्त आहार का भरोसा देती है. जो लोगों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. प्राकृतिक खेती में रासायनिक खेती के लिए जरूरी खाद और कीटनाशकों का उपयोग समाप्त होने से वह आदान लागत में बाजार द्वारा होने वाली किसानों की लूट को कम करती है. साथ ही सिंचाई के लिए पानी की अनावश्यक खपत को भी रोकती है.

लेकिन किसानों को यह समझना होगा कि अगर प्राकृतिक खेती यह दावा करती है कि वैकल्पिक खेती पद्धति अपनाने से रासायनिक खेती से ज्यादा उत्पादन होगा और उससे किसान की आय बढ़ेगी, तो वह सही नहीं है. जहर मुक्त बाजार में प्राकृतिक खेती की उपज को अधिक दाम मिलने से किसानों को आज थोड़ा आर्थिक लाभ हो रहा है. लेकिन अगर देश के सभी किसान प्राकृतिक खेती अपनाते हैं तब अधिक मिलने वाले दाम नहीं मिल पाएंगे और फिर यह मंत्र सभी फसलों के लिए लागू भी नहीं होता.

यह भी समझना होगा कि जब तक जहर मुक्त फसलों की ज्यादा कीमत पाना ही किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने का मंत्र है, तब तक जहर मुक्त खेती और जहर मुक्त थाली गरीबों के लिए उपलब्ध नहीं हो सकती. वह यह मान सकते हैं कि जिनको दो वक्त का खाना नसीब नहीं है और जो मृत्यु आने तक दिन गिन-गिनकर जीते हैं, उनके लिए खाने में जहर मायने नहीं रखता. फिर उन्हें अमीरों के लिए काम करने का आरोप सहना पड़ेगा.

प्राकृतिक खेती को किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकारी बताना जहर मुक्त आहार की अपरिहार्यता के कारण किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ प्रेरित करने के लिए की गई चालाकी है. अगर सचमुच अमीरों को जहर मुक्त अन्न खाकर बीमारियों से बचना है तो उन्हें यह समझना होगा कि इस प्रकार की चालाकी से ज्यादा दिन काम नहीं चलने वाला है. किसान अपने परिवार की बलि चढ़ाकर आज तक जो करता आया है, अब वह नहीं करेगा. इसलिए अमीरों को किसान को सम्मानपूर्वक जीवन प्राप्त करने के लिए किए जा रहे संघर्ष में शामिल होना होगा, तभी उन्हें जहर मुक्त भोजन मिल पाएगा.

जिस तरह के ईमानदार लोग जैविक खेती के काम में लगे हैं, यह कहना अन्यायपूर्ण होगा कि जैविक खेती को रासायनिक खेती के विकल्प में खड़ा करने की कॉरपोरेटी योजना में उनकी हिस्सेदारी थी. लेकिन जैविक खेती में कॉरपोरेट ने अपना बड़ा इनपुट बाजार खड़ा कर लिया है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. इससे जैविक खेती से आगत लागत घटने का दावा खारिज हो जाता है.

जैविक खेती द्वारा जहर मुक्त थाली को भी जीरो बजट खेती चुनौती दे रही है कि जैविक खेती रासायनिक खेती से अधिक विषैली है. इसकी जांच होनी चाहिए. जैविक खेती विषैली नहीं है, यह उन्हें ही सिद्ध करना होगा जो इसका दावा कर रहे हैं. अगर वह यह सिद्ध नहीं कर पाए तब जैविक खेती का जहर मुक्त थाली का दूसरा दावा भी खारिज हो जाता है.

केवल नाम के कारण जीरो बजट खेती का विरोध करने वालों का कहना है कि खेती जीरो बजट में नहीं हो सकती और यह सच्चाई है कि जीरो बजट खेती में आगत लागत जीरो नहीं हो सकती. लेकिन अपने निकट की चीजों का इस्तेमाल करके आगत के लिए बाजार की चीजों का इस्तेमाल रोककर आदान लागत को कम करके और फसलों द्वारा आदान लागत की भरपाई करके उसे जीरो तक पहुंचाने का काम जीरो बजट खेती करती है. वह किसानों को कॉरपोरेटी बाजार पर निर्भर रहने से बचाती है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि परमाणु बम एक क्रूर संहारक अस्त्र है. लेकिन ग्रीन हाउस इफेक्ट उससे अधिक भयंकर इस अर्थ में है कि उससे पैदा जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ साथ पृथ्वी को भी नष्ट करने की क्षमता रखते है. मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों का पृथ्वी पर संतुलन रखने के लिए प्रकृति सक्षम है. लेकिन मनुष्य के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण पैदा ग्रीन हाउस इफेक्ट मनुष्य के विनाश का कारण बना है. उसके लिए मुख्यत: औद्योगीकरण जिम्मेदार है. खेती में भी मानवी हस्तक्षेप के कारण होने वाले ग्रीन हाउस इफेक्ट को रोकना जरूरी है.

प्राकृतिक खेती के संपूर्ण समर्थन के बावजूद हमें यह स्वीकार करना होगा कि केवल खेती की पद्धति में बदलाव से किसान की आर्थिक स्थिति में सुधार संभव नहीं है. किसानों की दुर्दशा का प्रमुख कारण खेती में किसानों के श्रम का शोषण और बाजार द्वारा किसानों की लूट है. यह पूर्ण रूप से आर्थिक नीतियों में सुधार का मसला है. आर्थिक नीतियों में सुधार लाकर ही किसानों को सम्मान पूर्वक जीवन प्राप्त हो सकता है. इसलिए किसानों को ‘नई प्राकृतिक खेती’ अपनाने के साथ साथ शोषणकारी नीतियों को बदलने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा.

गलत दावों के कारण सरकार को जिम्मेदारी से भागने और चालाकी करने का मौका मिल जाता है. जनता ने भी उन्हें विश्वास दिलाया है कि झूठ बोलकर भी सत्ता प्राप्त की जा सकती है. इसलिए उन्हें प्राकृतिक खेती से किसान की आय दोगुनी करने का झूठा दावा करते समय ड़र नहीं लगा. खाद्य सुरक्षा के लिए उत्पादन वृद्धि की जरूरत का सरकारी दावा भी प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि कृषि भूमि को गैर-कृषि कार्य के लिए हर दिन किसानों से जमीन छीनने और निर्यात प्रधान कृषि उत्पादन के लिए नीतियां बनाने से खाद्यान सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा, इसकी उन्हें चिंता नहीं है. बीटी तकनीक का स्वास्थ पर बुरा परिणाम संभव है, यह जानकर भी वह छुपे रास्ते से बीटी को प्रवेश देकर जहर मुक्त अन्न देने का दावा करती है.

प्राकृतिक खेती के लिए सरकार ने जीरो बजट रखा है. उसे प्रोत्साहित करने के लिए सब्सिडी का कोई प्रावधान नहीं किया है. लेकिन बजट में 80 हजार करोड़ रुपयों की रासायनिक सब्सिडी दी गई है. जिसमें 53 हजार करोड़ रुपये यूरिया सब्सिडी है. साथ ही मेडिकल काउंसिल की रिपोर्ट को आधार बनाकर कृषिमंत्री द्वारा लोकसभा में यह सिद्ध करने का प्रयास कि पंजाब में कैंसर के लिए रासायनिक खेती जिम्मेदार नहीं है, रासायनिक उद्योग के दबाव में साजिश का हिस्सा लगता है. जब कैंसर का निश्चित कारण विज्ञान के पास नहीं है, तब मेडिकल काउंसिल क्यों साबित करना चाहती है कि पंजाब में बढ़ते कैंसर का कारण थाली और पानी के द्वारा शरीर में जहर पहुंचना नहीं है.

सरकार की नीयत साफ नहीं है. पिछले पांच वर्ष में सरकार ने खेती और किसानों के लिए जो घोषणाएं की थीं, उसका पालन नहीं किया और दोबारा चुनकर आने के बाद पहले बजट भाषण में उसपर अमल करने के लिए दिशा या योजना प्रस्तुत नहीं की. उन्होंने किसान को फसलों के दाम में हो रहे नुकसान के लिए अंतर राशि देने या न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर खरीद को रोकने के लिए कानून बनाने का अपना वचन नहीं निभाया.

खेती में तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिये की नहीं यह एक महत्वपूर्ण सवाल है. भले ही जो लोग तकनीक का उपयोग कर मोबाइल पर रात दिन टिक-टिक करते रहते हैं, उन्हें किसानों को तकनीक का उपयोग नहीं करना चाहिये यह कहने का नैतिक अधिकार ना हो. लेकिन तकनीक जब किसानों के शोषण के लिए इस्तेमाल हो रही हो और उसके माध्यम से कॉरपोरेट खेती का जाल बिछाने के खेल का हिस्सा बन गई हो तब अपने बचाव के लिए किसान को उसका विरोध और बहिष्कार करना आवश्यक हो जाता है. इसीलिए बीटी और दूसरी ऐसी तकनीक का विरोध किसानों के लिए जरूरी है.

लोगों के लिए केवल उसी तकनीक का उपयोग उचित है जो उनकी पहुंच में है. जो तकनीक उपयोगकर्ता की पहुंच से दूर है वह हमेशा लूट का कारण बनी रहेगी. इसलिए जो शोषणकारी व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं, उनके लिए स्थानीय तकनीक के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है.

आजादी के आंदोलन में चरखा केवल धागा बनाने का यंत्र नहीं था. वह देश की गरीब जनता को रोजगार देकर उनकी आमदनी बढ़ाने, उन्हें पेटभर रोटी खिलाने और वस्त्र देने की योजना के साथ-साथ जिसके आधार पर अंग्रेजी साम्राज्य खड़ा था, उन मैनचेस्टर मिलों के द्वारा होने वाली लूट को रोककर अंग्रेजी साम्राज्य को दी गई चुनौती थी. इसलिए चरखा राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गया.

ठीक उसी तरह ‘नई प्राकृतिक खेती’ अपनाकर मोंसैंटो एंड़ बेअर जैसी कॉरपोरेट कंपनियों के द्वारा किसानों की हो रही लूट रोकना, कॉरपोरेट खेती को रोकना और उसके माध्यम से कॉरपोरेटी साम्राज्यवाद को चुनौती देना संभव है. जीरो बजट खेती उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह समझना आवश्यक है कि जो लोग कॉरपोरेटी लूट के लिए देश के दरवाजे खोलकर खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं, उनका राष्ट्रवाद एक पाखंड़ है. वैसे भी उन्हे गांधी को समझना मुश्किल है, जिन्होंने स्वदेशी को तिलांजलि देकर गांधी से मतलब केवल सफाई में देखा है.