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ट्रांसजेन्डर बिल: विरोध संसद से सड़क तक

 

ट्रांसजेंडर बिल के खिलाफ देश भर में ट्रांसजेंडर समुदाय सड़कों पर हैं. इनका मानना है कि यह बिल मौलिक अधिकारों का हनन करता है. विरोध करने वाले मानते हैं कि बिल ट्रांसजेंडर समुदाय को हाशिए पर धकेलने की साजिश होगी.

मोदी कैबिनेट की तरफ से ट्रांसजेन्डर पर्सन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) नाम से लाया गया यह बिल पहले ही 27 संशोधनों के साथ लोकसभा में पास हो चुका है. राज्यसभा में बिल को विपक्षी दलों की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ सकता है. तृणमूल कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन का मानना है कि यह बिल बगैर किसी विमर्श के काफी जल्दबाजी में लाया गया है.

इस बिल को लेकर यह भी माना जा रहा है कि इसमें ट्रांसजेन्डर शब्द को सही रूप में परिभाषित नहीं किया गया है और इसके लागू होने के बाद साल 2014 का सुप्रीम कोर्ट का नाल्सा जजमेंट अपना अर्थ खो देगा. नाल्सा जजमेंट सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला है जिससे इस समाज को थर्ड जेंडर के रूप में पहचान मिली.

समाज में उपेक्षा का शिकार यह समुदाय शिक्षा और रोजगार में हाशिए पर खड़ा है. सरकार भी अब तक ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति गैरजिम्मेदार रही है. रोजमर्रा की टकराहटों के बीच इसका एक बड़ा हिस्सा पेशागत तौर पर ट्रेन, बस और सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर है. यह बिल समुदाय को मुख्यधारा में लाए बगैर ही भीख मांगने को अपराध की श्रेणी में रखता है. सरकार के इस रुख को खतरनाक बताया जा रहा है.

ट्रांसजेन्डर बिल की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें ट्रांसजेन्डर से अपना लिंग निर्धारण का अधिकार छीनते हुए एक स्क्रीनिंग कमेटी के हवाले कर दिया गया है. जिला स्तर पर प्रस्तावित इस कमेटी के सदस्य यह तय करेंगे कि कौन ट्रांसजेन्डर है और कौन नहीं. ट्रांसजेन्डर समुदाय के मुताबिक यह उनके मौलिक अधिकार का हनन है.

यह बिल ट्रांसजेन्डर समुदाय के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न और हिंसा पर दोहरी नीति अपनाता है. इसके तहत दोषियों के लिए सजा का प्रावधान भेदभाव भरा है.  तेलंगाना हिजड़ा समिति का मानना है कि इस बिल में ट्रांस के साथ होने वाले बलात्कार पर सात साल की जगह सिर्फ दो साल की सजा का प्रावधान जो हमारे प्रति सरकार के रवैये को दिखाती है.

इस बिल के खिलाफ सिविल सोसाइटी और छात्र समुदाय ने भी सड़कों पर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया.

सरकार की तरफ से प्रस्तावित ट्रांसजेन्डर बिल को लेकर ट्रांसजेन्डर राइट्स एक्टिविस्ट और सिविल सोसाइटी का कहना है कि यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार के मानकों का उल्लंघन है.

अप्रैल 2014 के नाल्सा जजमेंट में ट्रांसजेन्डर को आरक्षण का प्रावधान था. इस नए बिल में सरकार उन्हें किसी भी तरह का आरक्षण नहीं दे रही है. ट्रांसजेन्डर समुदाय में इसको लेकर भी काफी गुस्सा है.

ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रिवेन्शन, प्रोटेक्शन और रिहैबिलेशन) बिल 2018 के खिलाफ भी आवाज उठ रही है. यह बिल किसी भी तरह के देह व्यापार को अपराध की श्रेणी में रखता है. यह कहा जा रहा है कि इस बिल में यौन शोषण, ट्रैफिकिंग और इस काम को स्वेच्छा से अपनाने वालों के बीच कोई भेद नहीं किया गया है.