भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इन आंदोलनों पर टिका है

माना | January 27, 2020

anti caa protest twenty eight people served notice for compensation

 

सीएए ने देश को मानो दो खेमों में बांट दिया है, एक तरफ वो लोग हैं जो सड़कों पर एक सैद्धांतिक लड़ाई लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर जनभावनाओं से कटी हुई एक बहरी सरकार है जिसने अभी तक इस मुद्दे पर प्रदर्शनकारियों से रिपोर्टरों को दिए गए अनावश्यक बयानों के सिवा कोई राबता नहीं किया है.

इस सरकार ने शायद ही ये सोचा होगा कि जिस कानून के तहत सिर्फ मुस्लिम समाज को अलग-थलग और हाशिए पर डालने की कोशिश की जा रही है उसका इस पैमाने पर विरोध होगा.

नागरिकता कानून के जरिए सरकार जहां पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे तीन पड़ोसी मुस्लिम देशों से गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता के दरवाजे खोल रही है, वहीं देश के भीतर दूसरे कई दरवाजे खुलते नजर आ रहे हैं – नई परिभाषाओं, नए संवाद, नए संपर्क, नई एकजुटता के दरवाजे, जिन्हें यह सरकार बाहुबल के जरिए बंद करने की कोशिशों में जुटी है. सबसे महत्वपूर्ण शायद इसमें वो दरवाजें हैं जिनको महिलाओं ने खोलकर अपने घरों से बाहर कदम रखा है और इस आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली है.

सीएए कानून ने देश भर में न सिर्फ आंदोलनों की एक नई शुरुआत की है साथ ही साथ इसने एक ऐसा सिलसिला शुरू कर दिया है जो रूकने का नाम नहीं ले रही. सीएए आंदोलन एक ऐसे सैलाब की तरह देश भर में फैला है जो थमने का नाम नहीं ले रहा है और वह इतनी दिशाओं में बह रहा है कि दिशाहीन सा भी लगता है.

सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशीकर इस आंदोलन को तीन कारणों की वजह से बेहद महत्वपूर्ण बताते हैं. इसमें विरोध कर रहे लोग खुद की निजी हितों से ऊपर उठकर एक सैद्धांतिक लड़ाई लड़ते हुए दिख रहे हैं. यही नहीं इस आंदोलन का एक सांकेतिक महत्व भी है, यह हमें उस बड़ी तस्वीर को देखने पर मजबूर करता है जो हमारे मौजूदा व्यवस्था की खोखली और जंग लगी इमारतें दिखाती है.

यह हमें आभास दिलाती है कि कई वैसे समुदाय जो पहले सामाजिक-राजनीतिक तौर पर पक्षपातपूर्ण रवैया के कारण बेहतर स्थिति में नजर नहीं आते थे आज वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

साथ ही यह आंदोलन हमें जनता की ताकत का एहसास कराता है और प्रोटेस्ट करने के संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों के महत्वत को और मजबूत करता है.

अल्पसंख्यक समुदायों की ओर से बढ़-चढ़कर इस आदोलन में हिस्सा लेने के बावजूद यह किसी समुदाय विशेष का आंदोलन नहीं है, यह हमारे समाज के हर उस व्यक्ति का आंदोलन है जो संविधान को बचाना चाहता है. यहां मरकज में संविधान है जिसके इर्द गिर्द विभिन्न समुदाय एक नई एकजुटता के साथ उभरते नजर आ रहे हैं और इस देश के प्रति अपने नागरिक होने के दायित्व को पूरी निष्ठा से पूरा कर रहे हैं.

सुहास पलशीकर कहते हैं, ‘इस आंदोलन ने एक नई शब्दावली गढ़ी है जो मूल तौर पर संविधान और राष्ट्रीय गौरव की भावना पर आधारित है. इसने एक और सकारात्मक संभावना खोली है और वो है अंतर-समुदाय संवाद की वापसी.’

भारतीय संविधान की खूबसूरती इसी में है कि वो विभिन्न मतभेदों के बावजूद हर किसी के अस्तित्व को सामान्य रूप से स्वीकृति प्रदान करता है और यही वो सिद्धांत है जिसे हर हाल में बचाया जाना है. यही नहीं, संविधान के अंदर वो सारी संभावनाएं मौजूद हैं जिसके जरिए हर शख्स अपनी पहचान इसके पन्नों में पाएगा और यही एक चीज है जो इस आंदोलन में नजर आई है कि इसने अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक नई संयुक्त पहचान भी दी है जिसके सामने हमने मजहबी, वैचारिक, जातीय अंतरों को बौना होते हुए देखा है.

हाल ही में ‘द टेलीग्राफ’ को दिए गए एक इंटरव्यू में इकॉनॉमिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन कहते हैं कि भारतीय सभ्यता में ‘एक तर्किकता की परंपरा है, सिर्फ सहिष्णुता ही नहीं है.’ इस सब के बावजूद, एक निराशावाद भी है. आंदोलन के सकारात्मक चेहरे के पीछे देश के वो खराब हालात हैं जिससे पैदा हुई आशाहीनता ने इस आंदोलन को जन्म दिया है. बात सिर्फ मौजूदा सरकार की नीतियों और एजेंडों की नहीं है, चिंताजनक है उसके नीचे दबती और कमजोर होती संस्थाए.

सांप्रदायिक राजनीति तो भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही करती आई है पर आज संसद में उनकी ताकत और बहुत से लोगों में उनकी स्वीकृति पर चिंता व्यक्त करते हुए सेन बताते हैं ‘यह एक ऐसे समय में है जब सांप्रदायिक राजनीति की ताकत बहुत सीमित थी, हालांकि तेजी से शक्तिशाली हो रही थी. बाबरी मस्जिद को गिराने की क्षमता बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा का प्रतिबिंब थी. लेकिन, 1990 के दशक की शुरुआत में कट्टर सांप्रदायिकता एक अपेक्षाकृत छोटी ताकत थी.’

कट्टरवादी ताकतें आज की तारीख में देश में एक बड़ी ताकत बन चुकी हैं जिसकी झलक सरकार के अहंकारी रवैये में भी दिखती है. यही वजह है कि सरकार की तरफ से आंदोलनकारियों से किसी भी तरह की बातचीत की पहल नहीं की गई है. सरकार अपने हिन्दुत्व से जुड़े वोट बैंक को लेकर पूरी तरह से निश्चित नजर आ रही है.

हिन्दुत्ववादी आंदोलन में आए बदलावों को लेकर सेन कहते हैं, ‘यह एक सकारात्मक बात है कि हिंदुत्ववादी आंदोलन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ब्राह्मणवादी पकड़ से छिटक रहा है, जिस ब्राह्मणवादी पकड़ का बीजेपी पर भी दबदबा है और जो शिव सेना की हिंदू राजनीति के विपरीत है. महाराष्ट्र में जो सब कुछ हुआ, उसे समझने के संदर्भ में यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है. यह हिंदुत्व की राजनीति की पटकथा लिखने वाले मूल लेखकों के एक हिस्से का एक प्रकार से विद्रोह है और यह दावा है कि इसे ब्राह्मणवादी ही नहीं होना चाहिए.’

हिंदुत्ववादी ताकतों में मतभेद और ब्राह्मणवाद को लेकर वैचारिक अंतर आने वाले समय में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती देकर यह कहीं न कहीं हिंदुत्ववाद की बुनियाद को कमजोर करने का काम करेगा.

यह आंदोलन कहां जा कर ठहरेगा इसका तो कोई अंदाजा नहीं लगा सकता, न ही अभी यह कहा जा सकता है कि ये क्या हासिल करने में कामयाब या नाकामयाब रहेगा. उम्मीद, डर, आशंकाओं से भरे इस माहौल में आशा और निराशा साथ-साथ चल रही हैं. इस सब में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ये आंदोलन यूं ही जगह-जगह जारी रहे जैसा कि सुहास पलशीकर कहते हैं, ‘अगर आज का ये आंदोलन कामयाब हो जाता है, तभी भारतीय राज्य और लोकतंत्र की पनुरावृत्ति होगी.’ आगे क्या होता है, ‘हम देखेंगे’.


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