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संसद में पारित सरोगेसी बिल में ये हैं खामियां

criticism of surrogacy bill passed in parliament

 

संसद के शीतकालिन सत्र में सरोगेसी बिल 2016 लोकसभा में पास कर दिया गया है. बिल के अनुसार अब कोई व्यवसायिक उपयोग के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएगा. सरोगेसी बिल पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि जो भी सरोगेसी के विकल्प को चुनना चाहते हैं उन्हें इनफर्टिलिटी का सर्टिफिकेट 90 दिनों के भीतर देना होगा. उन्होंने कहा कि व्यवसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह पाबंदी लगाने के लिए यह बिल लाया गया है, विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट की राय भी इससे मिलती है.

पैसे के लिए कोख किराए पर देने वाली महिलाओं, खासकर ग्रामीण महिलाओं को किसी भी तरह के शोषण से बचाने के लिए बेशक एक कानून की ज़रूरत थी. मगर यह बिल अपनी कुछ खामियों के कारण लगातार विरोध और चर्चा का विषय बना रहा.

सरोगेसी क्या है?

सरोगेसी एक महिला और एक दंपति के बीच का एक एग्रीमेंट है, जो अपना खुद का बच्चा चाहता है. सामान्य शब्दों में सरोगेसी का मतलब है कि बच्चे के जन्म तक एक महिला की ‘किराए की कोख’.

सरोगेसी (नियमन) बिल की मुख्य बातें:-

1. देश में सिर्फ भारतीय ही ले सकेंगे सरोगेसी की सुविधा

2. कानूनी तौर पर मान्य दंपती को ही मिलेगा फायदा

3. अविवाहित, समलैंगिक, लिव इन, सिंगल पैरेंट्स को इजाज़त नहीं

4. शादी के पांच वर्ष बाद ही दंपति ले सकेंगे सरोगेसी की मदद

5. पहले से एक भी बच्चा है तो नहीं ले सकेंगे सरोगेसी सुविधा

6. कानून का उल्लंघन करने वालों को 10 वर्ष की कैद संभव

7. सरोगेसी के लिए पुरुष की उम्र पुरुष 26 से 55 के बीच हो और महिला 23 से 50 साल के बीच की हो.

8. जो भी सरोगेसी के विकल्प को चुनना चाहते हैं उन्हें इनफर्टिलिटी का सर्टिफिकेट 90 दिनों के भीतर देना होगा.

सरोगेसी बिल की खामियाँ

– इस बिल के अनुसार केवल बच्चा चाहने वाले दंपति केवल नजदीकी रिश्तेदार ही सरोगेट मदर बन सकती है. नजदीकी रिश्तेदार को इसमें परिभाषित नहीं किया गया है. यह जोड़ो के मूल प्रजनन अधिकारों का उल्लंघन करता है. ज़रूरी नहीं कि सरोगेसी चाहने वाले सभी माता-पिताओं की इच्छा परिवार की कोई महिला पूरी कर ही दे.

– बिल में बच्चे की उम्मीद रखने वाले विवाहित माता-पिता को कम से कम पांच साल तक निसंतान रहने के बाद ही सरोगेसी का इस्तेमाल करने की इजाज़त है. अगर किसी भी दूसरी परिस्थिती में जोड़ा पांच साल से पहले बच्चा चाहें तो वहाँ यह नीति बाध्य साबित होती है.

– तलाक़शुदा और विधवा महिलाएं, लिव-इन पार्टनर्स और एलजीबीटीक्यू की परिधि में आने वाले जोड़े इस तकनीक का लाभ उठा कर बच्चा नहीं पैदा कर सकते.

– बिल में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सरोगेसी बोर्ड बनाने की बात है, लेकिन यह असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नॉलजी (एआरटी) क्लिनिक्स के बढ़ते कारोबार को नियमित करने वाली संस्था की ज़रूरत पर अपना रुख बहुत साफ नहीं करता.

– विधेयक सरोगेसी क्लिनिक्स के रजिस्ट्रेशन और मानकों की निगरानी के लिए ‘अप्रोप्रिएट अथॉरिटी’ की बात तो करता है. लेकिन इस अथॉरिटी के बारे में खुल कर ज्यादा कुछ नहीं बताया गया है.

– पुरुष यदि कानून का उल्लंघन करता है तो उसके लिए सज़ा का प्रावधान है, लेकिन यदि सरोगेट मां उल्लंघन करती है तो उसके लिए प्रावधान नहीं है.

– केवल सगे-संबधी और वह भी जो 25 से 35 साल की उम्र के बीच के हैं, को ही सरोगेट माँ बनने की अनुमति दी गई है, लेकिन बाँझपन के मामलों के साथ-साथ आम जोड़ों के लिए माता-पिता बनने की इस प्रक्रिया का उपयोग करना दुष्कर है.

– वर्ष 2002 के बाद से विदेशी भारत में सरोगेसी के माध्यम से बच्चा प्राप्त करने के लिए आते थे, लेकिन अब भारतीय दम्पत्ति के साथ-साथ एकल और समलैंगिक भी देश से बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाएंगे.

– सरोगेसी की बजाए गोद लेने की प्रकिया पर भी असर होगा. आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 तक भारत में अनाथ बच्चों की संख्या 50,000 है, जिन्हें गोद लिया जा सकता है.

– ज्यादातर मामलों में सरोगेट मदर से जन्मे बच्चे को मां का दूध नसीब नहीं होता. पैदा होते ही बच्चे को दंपति ले जाते हैं.

– विदेशी नागरिक अब भारत में सरोगेसी का लाभ नहीं उठा सकेंगे. एनआरआई भी इस सुविधा से वंचित कर दिए गए हैं.