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कश्मीर: गायब बच्चों के इंतजार में माताएं

Story of Yavar Ahmed Bhat of Kashmir

 

20 सितंबर को कश्मीर के कैदखाने में तब्दील होने के 45 दिन बीत चुके थे. जब पुलवामा के चन्दगाम के रहनेवाले यावर अहमद भट ने श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में दम तोड़ दिया. वह 15 साल के थे. आरोप है कि उनकी मौत चूहा मारने वाली जहर खाने से हुई.

17 सितम्बर को यावर अहमद भट ने अपनी बहन से कहा कि नजदीक के सेना कैम्प में उसे गिरफ्तार करके ले जाया गया. जहां उसे पीटा गया और यातनाएं दी गईं. उनलोगों(सेना) ने उनका पहचान-पत्र ले लिया और यावर से अगले दिन फिर से हाजिर होने के लिए कहा.

यावर के पिता अब्दुल हमीद ने कहा कि उनका लड़का रात को बहुत परेशान दिख रहा था. अब्दुल ने बताया कि ‘वो अमूमन मेरे कमरे में ही सोता था, लेकिन उस रात यावर उनके कमरे में नहीं सोया. मेरी पत्नी ने देखा कि वो खिड़की के पास उल्टी कर रहा था.’

यावर अहमद भट के परिवार वालों ने जिला अस्पताल में उन्हें भर्ती करवाया फिर वहां से किसी तरह उन्हें श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया. जहां उनकी जान बचाई नहीं जा सकी. इस तरह से यावर अब्दुल हमीद के जीवन का अंत हो गया.

यावर अहमद भट सेना से मिली यातना से डरे हुए थे. वह जानते थे उनके साथ इस तरह की घटनाएं फिर होंगी चाहे वो घर में रहें या कैम्प में जाएं.

हालांकि सेना ने इस घटना में किसी भी तरह से शामिल होने से इनकार किया है. एसएसपी चन्दन कोहली ने घटना की जांच पड़ताल शुरू कर दी है. जब मीडिया ने इस घटना के बारे में सवाल किया तो पुलवामा के डीसी सयेद आबिद ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

मैं उन पांच महिलाओं में से एक हूं, जिसने 17 सितम्बर से 21 सितम्बर के बीच कश्मीर का दौरा किया था. तबतक कश्मीर में नाकेबंदी के 43 दिन पूरे हो चुके थे. हमने 24 सितंबर को अपनी रिपोर्ट ‘वुमेन्स वॉयस’ में इस क्षेत्र की महिलाओं और बच्चों की दयनीय स्थिति के बारे विस्तार से बताया था.

यावर अहमद भट की मौत हमारे कश्मीर छोड़ने के अगले दिन हुई. लेकिन इसके अलावा भी बहुत सारे यावर हैं जिनकी यातना की कहानी हमने सुनी और दर्ज की है. इस घटना के बारे में लिखते समय मुझे ऐसा लगा जैसे इसका मेरे निजी जीवन से समानता है. जिसका मैंने पहले कभी जिक्र नहीं किया है. लेकिन ऐसा महसूस हो रहा है कि मुझे अपनी बात बतानी चाहिए. पुलवामा में हुई इस मौत से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अपने परिवार में ही मौत हुई है.

मेरे बेटे का नाम भी यावर है और मेरे दिवंगत पति का नाम भी अब्दुल हमीद था. पुलवामा का यावर भी मेरा बेटा ही है. सिर्फ अंग्रेजी में स्पेलिंग का फर्क है. बाकी सबकुछ समान है.  जब मेरा बेटा करीब पांच साल का था वह विदेश में भीड़-भाड़ वाले एक मॉल में अचानक हमसे अलग हो गया. उस समय मैं बिल्कुल पागल-सी हो गई. मैं चारों तरफ चीख-चीखकर उसका नाम पुकार रही थी. इस दिल के थम जाने वाले पल में मैं सोच रही थी कि शायद अब मैं कभी उसे दोबारा नहीं देख पाउंगी. आज 40 साल बाद भी मेरे जेहन में वो पल कैद है. अचानक मैंने देखा कि एक छोटा बच्चा जिसके चेहरे पर आंसुओं की लकीरें हैं. वह स्क्लेटर से नीचे आ रहा है. ये मेरे जीवन का सबसे खूबसूरत लम्हा था.

कश्मीर की उन मांओं के बारे में क्या कहा जाए? जो अपने बच्चों के घर से बाहर जाने पर उनकी मौत या यातना की आशंका से बार-बार मरती होंगी.

हम लोगों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि युवा; यहां तक कि बहुत ही कम आयु के बच्चे को भी देखकर ‘मास्टरमाइंड’ उत्तेजना और गुस्से से भर जाते हैं. उनके लिए कश्मीर के एक-एक बच्चे के माथे पर पत्थरबाज लिखा हुआ है. लोगों से मोबाइल छीन लेना, पहचान-पत्र मांगना, गोपनीय जगहों पर उन्हें कैद करना आज कश्मीर के लिए सामान्य बात है.

हम सभी उस घृणित यातना गृह से परिचित हैं जो 1990 और 2000 के दशक में ‘पापा वन’ और ‘पापा टू’ के नाम से कुख्यात था. लेकिन आज के यातना गृह के पता ठिकाने नामालूम हैं. अभिभावकों तक सूचना के साधनों तक पहुंच नहीं है. घूस देने के लिए पैसे नहीं हैं. सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं हैं. कदम-कदम पर दर्द के साथ जीने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

कश्मीर में नाकेबंदी के बाद गायब हुए बच्चों से संबंधित एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. कश्मीर में युवाओं का लापता होना आम है. लेकिन अचानक से इसमें काफी वृद्धि दर्ज की गई है. दो मशहूर बाल अधिकार कर्यकर्ता शांता सिन्हा और ईनाक्षी गांगुली ने चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच में याचिका दायर की है. चीफ जस्टिस ने अली मोहम्मद की अध्यक्षता वाली जम्मू-कश्मीर जूवेनाईल जस्टिस से रिपोर्ट मांगी है.

चीफ जस्टिस के अयोध्या मामले की सुनवाई में व्यस्त होने के कारण केस दूसरे जज को स्थानांतरित कर दिया गया है. कमिटी की रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को दिया जा चुका है. राज्य की विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कमिटी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि याचिका में जो प्रमाण पेश किए गए हैं वो तथ्यहीन और पक्षपाती मीडिया रिपोर्ट के आधार पर बनाए गए हैं.
याचिका पर अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को होने वाली है.

गुप्त जगहों पर रखे गए बच्चों का भविष्य क्या होगा ये बड़ा सवाल है. कश्मीर में मां-बाप और उनके बिछुड़े बच्चों के हिस्से केवल अंतहीन इंतजार बचा हुआ है. उन्हें मिलाने का कोई जरिया नहीं है.

जरा सोचिये…. अगर इस भयानक मंजर में कहीं आपका बच्चा घिरा हुआ हो.

(डॉक्टर सैय्यदा हमीद, समृद्ध भारत फाउंडेशन की ट्रस्टी हैं और रेयाज़ अहमद, मुस्लिम वेमेंस फोरम के फेलो हैं.)