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चिट्ठी न लिखिओ कोइ!

satire on modi government regarding demonetisation  and lynching

 

जो मैं इतना जानती, चिट्ठी लिखे एफआइआर होए।
जगत ढिंढोरा पीटती, चिट्ठी न लिखिओ कोइ॥

इस साल की सबसे हिट फिल्म, मोदी-2 उर्फ लगे रहो नागपुरिया भाई के टाइटल गीत का यह मुखड़ा अपने आप में इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है कि हिंदुस्थान अब ताबड़तोड़ तरक्की कर रहा है.

पता नहीं क्यों इसके बाद भी कुछ लोगों को देश की तरक्की दिखाई ही नहीं दे रही है और कभी आर्थिक सुस्ती तो, कभी मंदी का शोर मचा रहे हैं? मन की हम नहीं कहते, पर वचन और कर्म से तो ये लोग एंटीनेशनल ही माने जाएंगे. वर्ना मंदी का शोर मचाकर देश की शान को बट्टा नहीं लगाते.

क्या हुआ कि कारें-वारें कम बन रही हैं. क्या हुआ कि बिस्कुट-विस्कुट से लेकर अंडरवियर तक, कम बिक रहे हैं. क्या हुआ कि काम करने वाले तेजी से घट रहे हैं और बेकार उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं. इस सब के बाद भी दुनिया में तो देश का नाम हो रहा है. नाम भी ऐसा-वैसा नहीं, ऐसा हो रहा है जैसा सत्तर साल में कभी नहीं हुआ था. भारत के सॉफ्टवेयर की दीवानगी की कहानी तो पुरानी पड़ गई, अब तो दुनिया भारत के चुनाव प्रचार तक की दीवानी है.

ऐरे-गैरों की छोडि़ए, अब तो खुद अमरीका का राष्ट्रपति, अपने चुनाव प्रचार के लिए, हमारे पीएम का मुंह ताक रहा है. पहले कभी अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में आई थी, किसी भारतीय स्टार प्रचारक की ऐसी डिमांड! सुस्ती-मंदी-वंदी का शोर मचाने वालों को लिंचिंग-विंचिंग की तरक्की दिखाई नहीं देती है, न सही. उन्हेें हाथ-पांव बांधकर कश्मीर को गले लगाने में, कश्मीर और भारत के रिश्ते की मजबूती दिखाई नहीं देती है, न सही. पर क्या उन्हें ट्रम्प जी सर्टिफाइड तरक्की भी दिखाई नहीं दे रही है कि भारत के स्टार चुनाव प्रचारक की अब दुनिया भर में डिमांड है. विश्व गुरु बनने में अब और क्या बाकी है!

खैर! हम मोदी-2 के टाइटिल गीत के मुखड़े में समाई तरक्की की कहानी पर लौटें. जरा इसकी तुलना 1952 की फिल्म बैजू बावरा के गीत के बोल से करें-जो मैं इतना जानती, प्रीति करे दु:ख होए, नगर ढिंढोरा पीटती, प्रीति न करियो कोइ. देश तब नया-नया आजाद हुआ था. उसके ऊपर से नेहरू का राज. देश इतना पिछड़ा हुआ था कि लोगों को अगर बचाव के लिए आगाह करने की जरूरत होती थी, जो सिर्फ प्रेम-प्रीति के चक्कर में पड़ने खिलाफ आगाह करने की. वह भी इसलिए कि उसमें दु:ख होने का खतरा था.

लिचिंग-विंचिंग का तो तब तक किसी ने नाम भी नहीं सुना था. और आज? देश की तरक्की का ये आलम है कि प्रेम-व्रेम की बात तो छोडि़ए, उसमें तो लव जेहाद से लेकर एंटी-मजनू अभियान तक में सीधे लिंचिंग तक का खतरा है, गीतकार को चिट्ठी लिखने के खिलाफ आगाह करना पड़ रहा है. और कैसे खतरे से आगाह करना पड़ रहा है? निजी दु:ख-वु:ख टाइप के खतरे से नहीं बल्कि एफआइआर, जेल वगैरह के खतरे से. अब चिट्ठी लिखने भर में देशद्रोह हो जाता है और बंदा जेल की लंबी सजा तक पहुंचे नहीं पहुंचे, पर पुलिस और अदालतों के चक्कर लगा-लगाकर अधमरा जरूर हो जाता है. सिर्फ चिट्ठी लिखने के लिए एक कम पचास जानी-मानी हस्तियों के खिलाफ देशद्रोह से लेकर शांति भंग और उपद्रव तक के लिए, एफआइआर के बाद भी क्या ताबड़तोड़ तरक्की के लिए किसी और सबूूत की जरूरत है?

कुछ लोग यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि एफआइआर, पीएम को चिट्ठी लिखने के लिए हुई है, सिर्फ चिट्ठी लिखने के लिए नहीं. कुछ और यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पीएम को चिट्ठी लिखने तक तो ठीक था, चिट्ठी को प्राइवेट से पब्लिक करने के लिए एफआइआर हुई है. कुछ और का कहना है कि चिट्ठी पब्लिक करने के लिए भी नहीं, एफआइआर हुई है लिंचिंग रोकने की मांग करने के लिए. ये सब सच भी हो तब भी, एफआइआर हुई तो चिट्ठी लिखने के लिए ही है. न चिट्ठी रहेगी और न एफआइआर होगी. जैसे नोटबंदी, कैश-मुक्ति की तरक्की के लिए जरूरी थी, वैसे ही चिट्ठी बंदी, डिजिटलाइजेशन के रास्ते पर देश को आगे धकेलने के लिए जरूरी है.

हां! यह जरूर है कि चिट्ठी की तरह फेसबुक या ट्विटर पर लिंचिंग रोकने की मांंग करने के लिए भी एफआइआर हो सकती है. वैसे कागज पर हो तो और डिजिटल में हो तो, कुछ भी लिखना ही क्यों? पर लिंचिंग रोकने की मुंह जुबानी मांग पर भी तो एफआइआर हो सकती है. पर लिंचिंग-विंचिंग के खिलाफ बल्कि किसी के भी खिलाफ, बोलना ही क्यों? वैसे देखना या सुनना भी क्यों, जो बोलने के लिए उकसाए. दाल-रोटी खाओ, नये प्रभू के गुण गाओ। और बापू का बाकी सब भूलो, डेढ़ सौवीं सालगिरह पर बस बापू के बंदर बन जाओ–न कुछ बुरा देखो, न बुरा सुनो और न बुरा बोलो! पर हां राज करने वालों के इशारे पर वोटिंग मशीन का बटन जरूर दबाते जाओ!