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दिल्ली वालों होश में आओ!

satire on delhi elections post exit polls

 

भाई दिल्ली वालों की भी हद्द है. एग्जिट पोल वालों की मानें तो पट्ठों ने मोदी जी को फिर हरा दिया. और कोई ऐसे-वैसे नहीं, बाकायदा पटखनी देकर, चारो-खाने चित्त कर के हरा दिया. इसका भी ख्याल नहीं किया कि मुश्किल से नौ महीना पहले ही तो लोकसभा के चुनाव में मोदी जी को दोबारा जिताया था और पहले से भी ज्यादा जोरों से जिताया था. उल्टे बेशर्मी देखिए, कहते हैं कि वो चुनाव और था, ये चुनाव और है! अरे चुनाव और होने से क्या हुआ, नेता तो एक ही है. दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के, विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता को हरा दिया और वह भी दूसरी बार!

यूं तो दिल्ली वालों ने पिछली बार हरा भी दिया था, पर वह तो फिर भी समझ में आता था. हड़बड़ी में कभी गलत बटन भी दब जाता है और गलत बंदा चुन जाता है. लेकिन, दिल्ली वालों के एक ही गलती बार-बार करने को, देशभक्त लोग गलती कैसे मान लेंगे? शहीनबाग की तरह, यह भी संयोग नहीं हो सकता. जरूर इसके पीछे कोई षड्यंत्र, कोई प्रयोग है! वर्ना जब देश ने मोदी जी को दोबारा चुन दिया, फिर दिल्ली वाले उन्हें हरा कर देश भर की दी जीत को मानने से इंकार कैसे कर सकते हैं? ये तो संसद, संविधान, पब्लिक, सब का घोर अपमान है. ये दिल्ली वाले पड़ोसी दुश्मन देश को खुश करने वाला फैसला कैसे सुना सकते हैं!

अब कोई यह कहकर दिल्ली वालों के जुर्म को हल्का करने की कोशिश नहीं करे कि एक सौ तीस करोड़ के न सही, पच्चीस करोड़ से कम वोटरों के ही सही, पर देश के वोटरों के जिताने के बाद, मोदी जी को झारखंडियों ने भी तो हराया था. उससे भी पहले मराठियों ने गद्दी की झलक दिखाकर, गद्दी नीचे से खींच ली थी, जबकि हरियाणवियों ने गद्दी खोंसकर भी वापस दिला दी थी. बेशक, गलती उन सब ने भी की थी, पर वह उनकी पहली गलती थी. पर दूसरी गलती? यह गलती नहीं अपराध है!

फिर दिल्ली वालों की दूसरी गलती तो वैसे भी पहली वाली से बहुत गंभीर है. पिछली बार कम से कम कहने को तो बीच में किरन बेदी जी का चेहरा था. दिल्ली वालों ने इस बार तो सीधे-सीधे मोदी जी को ही हरा दिया. बल्कि एक के साथ एक फ्री पर जान देने वाले दिल्ली वालों ने, हराने में भी एक के साथ एक फ्री निपटा दिया; मोदी जी के संग-संग शाह जी को भी हरा दिया. शाह जी ने बटन दबाकर शाहीनबाग को करेंट लगाने के लिए कहा था, दिल्ली वालों ने तो उल्टा करेंट चलवा दिया और शाहीन बाग के सत्याग्रह का झटका, झंडेवालान को लगवा दिया.

और तो और हिंदू-द्रोही दिल्ली वालों ने अपने बिरयानी प्रेम के चक्कर में भगवाधारी योगी की भी नहीं सुनी. न पाकिस्तान से दुश्मनी निभायी, न मुसलमानों से दुश्मनी की लाज रखी. न धारा-370 के खात्मे का जश्न मनाया, न सीएए को गले लगाया. और तो और तिरंगे के तले और हाथ में संविधान लेकर, सत्याग्रह करने वालों से राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरे तक का ख्याल नहीं किया.

मंत्री जी का कहा मानकर गद्दारों को गोली मारना तो दूर, दिल्ली की पब्लिक तो जैसे खुद ही टुकड़े-टुकड़े गैंग में भर्ती हो गयी और आतंकवादियों को दोबारा गद्दी पर बैठा दिया. खैर अभी भी वक्त है. दिल्ली वालों अब तो होश में आओ, चुपचाप ईवीएम का झटका खाओ! वर्ना मोदी जी को जनता को ही भंग करना पड़ेगा और राष्ट्र की खातिर नई जनता को चुनना पड़ेगा. समझे क्या, दिल्ली वालों!