सुर्ख़ियां


धर्मांधता के इस दौर में प्रासंगिक हैं पेरियार के ये विचार

death anniversary of periyar

 

आज जब देश की सत्ता में दलित-उत्पीड़न, सांप्रदायिकता, और महिलाओं को एक सीमा में कैद कर दिए जाने की व्यवस्था चरम पर है ऐसे माहौल में इरोड वेंकट नायकर रामासामी (पेरियार) के विचार वंचितों के लिए तनी हुई मुठ्ठी है.

दक्षिणपंथी बयार के खिलाफ खड़े द्रविड़ चेतना के नायक पेरियार, अंधराष्ट्रवादियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. यही वजह रही है कि हाल ही में उनकी मूर्ति को तोड़ा गया. उनके विचार को खत्म करने की लगातार कोशिश हो रही है लेकिन शोषितों के नायक पेरियार इसी दौर में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और समझे जा रहे हैं.

17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु में जन्मे पेरियार जीवन भर दलित, वंचितों की लड़ाई लड़ते रहे. अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत में वे कांग्रेस की विचारधारा से प्रभावित थे. काफी लम्बे समय तक कांग्रेस के साथ जुड़े रहने के दौरान मद्रास राज्य कमेटी के अध्यक्ष भी रहे.

1924 में जब केरल के दलित अपने हक के लिए राजा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे उस वक्त उन्होनें पार्टी से मतभेद के कारण पद से इस्तीफा दे दिया. बाद में उनका झुकाव मार्क्सवाद की तरफ भी हुआ. कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का तमिल अनुवाद प्रकाशित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. उन्होंने द्रविड़ों के अधिकार की लड़ाई के लिए द्रविड़ कजगम नाम से एक पार्टी भी बनाई थी जिसे जस्टिस पार्टी के नाम से भी जाना जाता है.

24 दिसंबर 1973 को पेरियार ने अंतिम सांस ली लेकिन अपनी विरासत देश के हर प्रगतिशील आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए छोड़ गए. दलित, वंचितों और समाज में स्त्री की स्थिति को लेकर उनके विचार आज भी इतने तेज हैं कि उनके विचारों को लेकर चलना उन सब के खिलाफ एक मुहिम में शामिल होना है जो पितृसत्तात्मक है, साम्प्रदायिक है, दलित-अल्पसंख्यक विरोधी है.

आइए डालते हैं एक नज़र पेरियार के उन विचारों पर जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके वक्त में थे :-

– संसार भर में भारत जितने धर्म और और उनके मानने वालों के बीच अंतर कहीं भी नहीं है. बल्कि इतने धर्मांतरण भी कहीं नहीं हुए. इसका मूल कारण भारतीयों का निरक्षर और गुलाम प्रवृति है जिससे उनका धार्मिक शोषण करना आसान होता है.

– ब्राह्मण आपको भगवान के नाम पर मूर्ख बनाकर अंधविश्वास में निष्ठा रखने को तैयार करता है. वह खुद आरामदायक जीवन जी रहा है और तुम्हें अछूत कह कर निंदा करता है. देवता की प्रार्थना करने के लिए दलाली करता है. मैं इस दलाली की निंदा करता हूँ, आपको सावधान करता हूँ ऐसे ब्राह्मणों का विश्वास मत करो.

– अगर देवता ही निम्न जाति बनाने का मूल कारण है तो ऐसे देवता को नष्ट कर दो. यह कोई धर्म है तो इसे मत मानो. मनुस्मृति, गीता या अन्य कोई पुराण है तो जलाकर राख कर दो. अगर ये मंदिर, तालाब या त्योहार है तो इनका बहिष्कार कर दो. अंत में हमारी राजनीति ऐसा करती है तो खुले रूप में पर्दाफाश करो.

– ब्राह्मणों ने हमें शास्त्रों और पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है. अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर और देवी-देवताओं की रचना की. सभी मनुष्य समान रूप से पैदा हुए तो फिर अकेले ब्राह्मण को ऊंचा और दूसरों को नीच कैसे ठहराया जा सकता है.

– हमारे देश को आजादी तभी मिल गई समझना चाहिए जब लोग देवता, धर्म, जाति और अंधविश्वास से छुटकारा पा जाएंगे.

– नास्तिकता मनुष्य के लिए कोई सरल स्थिति नहीं है. कोई भी मूर्ख अपने को आस्तिक कह सकता है. ईश्वर की सत्ता स्वीकारने में किसी बुद्धिमता की आवश्यकता नहीं पड़ती लेकिन नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ विश्वास की जरूरत पड़ती है. यह स्थिति उन्हीं लोगों के लिए संभव है जिनके पास तर्क और बुद्धि की शक्ति हो.