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विभिन्न आर्थिक सूचकों का औपचारिक क्षेत्र में मंदी की ओर इशारा

number of indicator signals to spreading slowdown in economy

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ मिल कर अर्थव्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की. दोनों के बीच यह समीक्षा बैठक ऐसे समय हुई है जब सरकार को अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से फैल रही नरमी का सामना करना पड़ रहा है. इससे निवेशकों की सम्पत्ति का क्षरण हो रहा है और बेरोजगारी का संकट बढ़ रहा है.

इस साल जून तिमाही में सरकार द्वारा पूंजीगत निवेश में 30 फिसदी तक की कमी इस बात की सूचक है कि घटते निवेश के साथ उपभोग मांग में भी लगातार सुस्ती आई है. वहीं इस दौरान भारत में औपचारिक क्षेत्र की कंपनियों की ओर से नई परियोजनाओं की घोषणाएं घटकर लगभग आधी रह गई.

द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक विभिन्न आर्थिक सूचक औपचारिक क्षेत्र में नरमी की ओर संकेत कर रहे हैं.

गौरतलब है कि 2018-19 में आर्थिक वृद्धि घट कर 6.8 प्रतिशत पर आ गई थी. यह 2014-15 के बाद की न्यूनतम दर है. इस समय उपभोक्ताओं के विश्वास का स्तर गिर रहा है और विदेशी निवेश भी एक ऊंचाई पर पहुंच कर ठहर गया है.

भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि अनुमान को 7.0 प्रतिशत से घटा कर 6.9 प्रतिशत कर दिया है. लेकिन मुद्रास्फीति नरम बनी हुई है. केंद्रीय बैंक ने नीतिगत ब्याज दर में इस साल 1.10 प्रतिशत की कटौती कर चुका है ताकि आर्थिक वृद्धि को तेज करने प्रयासों में मदद मिले.

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के मुताबिक एक मई 2019 तक पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मोड में चल रही 65 परियोजनाओं में से 37 में देरी से चल रही हैं. परियोजनाओं में देरी का सीधा प्रभाव भुगतान की प्रक्रिया पर होता है जिसके चलते परियोजनाओं पर जोखिम बढ़ता है.

वहीं इस बीच बीएचईएल ने परियोजनाओं को समय पूर्व खत्म करने और हितधारकों के साथ बकाया मुद्दे को सुलझाने के लिए ‘Project Closure Synergy Group’ की शुरुआत की है.

सीएमआईई के अनुमान के मुताबिक भारतीय औपचारिक क्षेत्र की कंपनियों की ओर से नई घोषणाओं के लिहाज से जून तिमाही निराशाजनक रही. इस दौरान केवल 71,300 करोड़ रुपये की नई घोषणएं हुईं जबकि बीते 2018-19 वित्त वर्ष में सभी तिमाहिओं का औसत 2.7 लाख करोड़ रुपये रहा था.

सीएमआईई के पूंजीगत व्यय डाटाबेस के अनुसार 2014-15 में 21 लाख करोड़ रुपये की क्षमता विस्तार परियोजनाओं की घोषणा की गई थी, जो 2018-19 में घटकर (10.7 लाख करोड़ रुपये) लगभग आधी हो गई.

आरबीआई के औद्योगिक आउटलुक सर्वेक्षण से पता चला है कि 57.3 प्रतिशत इकाइयों को जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए ऑर्डर बुक में किसी भी बदलाव की उम्मीद नहीं है (2000-01 के बाद से उच्चतम).

हैवेल्स इंडिया के सीएमडी अनिल राय गुप्ता ने कहा कि कंपनी के स्विचगियर व्यापार में आई सुस्ती, निर्माण क्षेत्र में मंदी की सूचक है.

वहीं माल परिवहन क्षेत्र भी आर्थिक मंदी की ओर इशारा कर रहा है. 2019-20 की पहली तिमाही में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुल माल परिवहन बीते साल की तुलना में 5 फीसदी घटकर 8.42 लाख टन रहा. पिछले वित्त वर्ष में हवाई माल परिवहन में 6.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी.

सीएआरई रेटिंग एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक बीते वित्त वर्ष की तुलना में इस साल पहली तिमाही में देश के प्रमुख बंदरगाहों पर माल ढुलाई में 1.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इसमें 4 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.

आंकड़ों के मुताबिक बीते वर्ष की पहली तिमाही की तुलना में इस साल उर्वरकों के आयतन में 14.4 फीसदी की गिरावट रही, अन्य माल की ढुलाई में 10.4 फीसदी की गिरावट और तापीय कोयला के आयतन में 4.7 फीसदी की गिरावट रही.

एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक माल के आयतन और विभिन्न परिवहन सेवाओं में यात्रियों की कमी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों में नरमी के संकेतक हैं.