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वाकई में नरेंद्र मोदी हैं एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर

not manmohan singh, narendra modi is the accidental prime minister

 

11 जनवरी को रिलीज होने वाली अनुपम खेर की फ़िल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. उम्मीद के मुताबिक इसे लेकर विवाद भी शुरू हो गया है. यह फ़िल्म संजय बारू की इसी नाम से लिखी किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ़ मनमोहन सिंह’ के ऊपर बनी हुई है.

पेंगुइन इंडिया से प्रकाशित जब यह किताब आई थी तब भी इसे लेकर काफी विवाद पैदा हो गया था. संजय बारू 2004 से लेकर 2008 तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे. इस फिल्म में संजय बारू का किरदार अक्षय खन्ना ने निभाया है. जब संजय बारू की यह किताब आई थी तब मनमोहन सिंह की सरकार ने इस पर सख्त आपत्ति दर्ज की थी.

संजय बारू ने किताब में कई ऐसे दावे किए थे जिससे मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेस पार्टी ने इंकार किया था. फिल्म में क्या दिखाया गया है, ये तो फिलहाल दीगर बात है, क्योंकि ये तो 11 जनवरी के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन ट्रेलर देखकर ये तो अनुमान लगता ही है कि संजय बारू की किताब में किया गया यह दावा कि मनमोहन सिंह सरकार में सत्ता के दो केंद्र थे, उसे ही इस फिल्म में प्रमुखता से उठाया गया है. सत्ता के दो केंद्र होने से उनका तात्पर्य था – एक पीएमओ और दूसरी कांग्रेस पार्टी.

अमूमन मनमोहन सिंह को लेकर यह आम धारणा बनी हुई है कि वो वाकई में इत्तेफाक से बने प्रधानमंत्री थे और संजय बारू की किताब भी इसी धारणा की पुष्टि करती है लेकिन वाकई में क्या मनमोहन सिंह एक ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ थे? 2004 में कांग्रेस की जीत के बाद सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया था. इसके बाद कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह का नाम सामने आया था.

इस पृष्ठभूमि में देखे तो ये बात जरूर सही लगती है कि मनमोहन सिंह इत्तेफाक से प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गए थे. लेकिन इस आधार पर अगर मनमोहन सिंह को ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ कहा जाना सही है तो ये फेहरिश्त तो बहुत लंबी है. क्योंकि इस आधार पर तो राजीव गांधी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, आई के गुजराल और देवगौड़ा जैसे तमाम नाम शामिल किए जा सकते हैं. यहां तक कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी उस वक्त अचानक से प्रधानमंत्री पद के लिए उछाला जाना शुरू हुआ जब साल 2005 में मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करने की वजह से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे लालकृष्ण आडवाणी को नागपुर की नापसंदगी झेलनी पड़ी. इसके बाद से ही 2002 के गुजरात दंगों की वजह से भारतीय राजनीति में अछूत बने नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता पार्टी और संघ के मुख्यालय में बढ़ने लगी.

Pic Courtesy- PTI

एक दूसरा दावा जो संजय बारू की किताब करती है, वो यह है कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् सुपर कैबिनेट की तरह काम करती थी. अगर इस दावे के हिसाब से भी देखे तो नरेंद्र मोदी की सरकार में सत्ता का केंद्रीकरण अभूतपूर्व तरीके से हुआ है और इल्जाम लगता रहा है कि पीएमओ ने कैबिनेट की सारी ताकत अपने हाथों में रखा हुआ है और पूरी सरकार का बागडोर सिर्फ मोदी और शाह की जोड़ी के हाथों में है.

रघुराम राजन ने भी हाल ही में यह कहा था कि सत्ता का केंद्रीकरण आज देश की सबसे बड़ी समस्या है. इस लिहाज से देखे तो मौजूदा सरकार में सुपर कैबिनेट या तो संघ का मुख्यालय है या फिर मोदी-शाह की जोड़ी. यहां तक कि ये भी इल्जाम लगते रहे हैं कि सत्ता के केंद्रीकरण की वजह से मनरेगा जैसी जनकल्याण की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं.

नरेंद्र मोदी जिन हालात में देश के प्रधानमंत्री बने हैं, उन हालातों पर भी इस सिलसिले में गौर कर लेना जरूरी है. यूपीए की सरकार के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उन आरोपों के बीच भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल के मुद्दे को लेकर किया गया अन्ना का प्रायोजित आंदोलन उनके प्रधानमंत्री बनने की पटकथा लिखने में अहम भूमिका निभाती है. 16 दिसंबर की गैंग रेप की घटना से पैदा हुआ जन आक्रोश भी उनके सत्ता में आने की कहानी का एक हिस्सा है.

अगर किन्हीं विशेष हालात में किसी का प्रधानमंत्री बनना ‘एक्सीडेंटल’ प्रक्रिया है तो फिर यह नरेंद्र मोदी पर उतना ही लागू होता है जितना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर. और यह इतिहास की मूल प्रस्थापना कि किन्हीं विशेष परिस्थिति में किसी घटनाक्रम और शख्सियत का वजूद अस्तित्व में आता है, उसके अनुरूप है ना कि कोई एक्सीडेंट. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि इतिहास उनके साथ न्याय करेगा. उसी ऐतिहासिकता के परिप्रेक्ष्य में उनका आकलन आने वाली पीढ़ियां करेंगी ना कि किसी मीडिया सलाहकार की किताब और किसी फ़िल्म के मुताबिक.