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क्या नीतीश के नैतिकता के मापदंड बदल गए हैं?

political morality of nitish kumar has changed

 

“मौजूदा माहौल में मेरे लिए नेतृत्व करना मुश्किल हो गया है. अंतरात्मा की आवाज़ पर कोई रास्ता नहीं निकलता देखकर ख़ुद ही नमस्कार कह दिया. अपने आप को अलग किया.”

करीब डेढ़ साल पहले नीतीश कुमार ने महागठबंधन के मुख्यमंत्री के रूप में इस्तीफ़ा देते हुए यह बातें कही थीं. तब राजद नेता और बिहार के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद बदले घटनाक्रम में उन्होंने यह कदम उठाया था.

और अब वही तेजस्वी यादव नीतीश कुमार से यह पूछ रहे हैं कि आपकी अंतरात्मा क्यों सोई हुई है? दरअसल चर्चित मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन उत्पीड़न कांड की जांच पर बिहार सरकार द्वारा की कार्रवाइयों पर सुप्रीम कोर्ट ने बीते हफ्ते फिर से नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी. इस मसले और बिहार में बढ़ते अपहरण, लूट, हत्या, रंगदारी और बिगड़ती क़ानून व्यवस्था का आरोप लगाते हुए तेजस्वी यादव की अगुवाई में विपक्ष ने 29 नवम्बर को राजभवन मार्च किया था. इस दौरान तेजस्वी ने ट्वीट कर पूछा था, “बिहार में जनादेश लुटेरों की निर्लज सरकार को रोज़ सुप्रीम कोर्ट की फटकार सुनने को मिल रही है. लेकिन मुख्यमंत्री जी चुप हैं. सुप्रीम कोर्ट की लताड़ सुनने पर भी नीतीश चाचा की अंतरात्मा सोई हुई है?”

‘दोषियों को बचाने में लगी है बिहार सरकार’

बिहार की पूर्व समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने आर्म्स एक्ट के एक मामले में जब 20 नवंबर को सरेंडर किया था तो बिहार सरकार ने राहत की सांस ली थी. वजह यह थी कि मंजू वर्मा को लम्बे समय तक गिरफ्तार करने में नाकाम रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को फटकार लगते हुए आदेश दे रखा था कि यदि मंजू वर्मा 27 नवंबर से पहले गिरफ्तार नहीं होती हैं तो बिहार के डीजीपी खुद कोर्ट में पेश होकर इसकी सफाई दें.

मगर बिहार सरकार की इस राहत की उम्र बहुत कम साबित हुई. मुजफ्फरपुर यौन उत्पीड़न कांड पर देश की सर्वोच्च अदालत ने जब 27 नवंबर को अगली सुनवाई की तो उसने फिर से फटकार लगाते हुए बिहार सरकार पर बहुत ही गंभीर टिप्पणी की.

खबरों के मुताबिक बच्चों से यौन शोषण के ज्यादातर मामलों को सरकार ने मामूली मारपीट का बनाकर कोर्ट के समक्ष पेश कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगाई. जस्टिस मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि यह शर्मनाक है कि बिहार सरकार दोषियों को बचाने में लगी है. खंडपीठ के दूसरे जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि वह जब भी इस मामले की फाइल देखते हैं तो बच्चों के साथ हुए बर्ताव को पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

बिहार सरकार का विरोध

27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को 24 घंटे की मोहलत देते हुए कहा कि इस अवधि में वह आरोपियों पर कुकर्म और पाक्सो एक्ट इत्यादि सही धाराओं में केस दर्ज करे. इस दिन कोर्ट ने बिहार पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए संकेत दिए थे कि शेल्टर होम से जुड़े सभी मामले की जांच वह सीबीआई को सौंप सकती है.

अगले दिन जब सुनवाई हुई तो अदालत ने बिहार के 16 और शेल्टर होम्स की जांच सीबीआई को सौंप दी. अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले में बिहार सरकार को काफी समय दिया गया, मगर अफसोस कि उसने कुछ नहीं किया. अदालत के इस फैसले का बिहार सरकार के वकील गोपाल सिंह ने यह कहते हुए विरोध किया कि हर मामला सीबीआई के पास जाएगा तो यह सही नहीं है और इससे राज्य के प्रति लोगों में गलत संदेश जाएगा.

नीतीश सहूलियत के मुताबिक अंतरात्मा जगाते हैं?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन उत्पीड़न कांड पर सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों से पहले भी बिहार सरकार की मुस्तैदी और इस पूरे मामले पर उसका रवैया आलोचनाओं के घेरे में रहा है. मामला सामने आने के बाद नीतीश सरकार पर पहला आरोप यह लगा कि उसने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट मिलने के बाद कार्रवाई करने में देर क्यों की? फिर इन मामलों में एफआईआर और गिरफ्तारियों के बाद भी कई दिनों तक राजनीतिक नेतृत्व की ओर से कोई बयान नहीं आया जो यह बता रहा था कि इस पूरे मामले पर सरकार कितनी गंभीर है.

इसके बाद जून के अंत में जब यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया तो इसके बाद भी नीतीश कुमार ने निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने के लिए विभागीय मंत्री मंजू वर्मा को पद से नहीं हटाया. हालाँकि इस बार वो 2017 के तेजस्वी के मामले की तरह राजनीतिक तौर से मजबूर नहीं थे.

दरअसल साल 2017 के जुलाई में नीतीश कुमार ने इस्तीफ़ा देते हुए कहा था कि तेजस्वी यादव पर सीबीआई की तरफ एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद उन्होंने तेजस्वी से इस्तीफ़ा नहीं मांगा था, लेकिन चीज़ों पर उस पक्ष की ओर से सफ़ाई भी नहीं दी गई. और ऐसा नहीं करने पर पैदा हुए हालत में उन्हें अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर इस्तीफ़ा देना पड़ा.

नीतीश कुमार द्वारा अपेक्षित नैतिकता के आधार पर क्या अब यह नहीं कहा जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट की इन बहुत ही तल्ख़ टिप्पणियों के बाद अब खुद उन्हें सामने आकर जनता को सफाई देनी चाहिए और उसे भरोसे में लेना चाहिए कि आगे फिर मुजफ्फरपुर जैसा कांड नहीं होने दिया जाएगा? इस्तीफ़ा नहीं तो क्या कम-से-कम उन्हें खुद सामने आकर उन गलतियों की जिम्मेदारी नहीं स्वीकार नहीं करनी चाहिए जिसके लिए अदालत बिहार सरकार को बार-बार फटकार लगा रहा है.

अदालत जिस सरकार पर सवाल खड़े कर रही है नीतीश कुमार उस सरकार के मुखिया हैं. लेकिन इन टिप्पणियों के बाद भी नीतीश अब तक चुप हैं. सुप्रीम कोर्ट की बार-बार की फटकार के बाद भी उनकी अंतरात्मा नहीं जग रही है. लगता है कि महिला सशक्तिकरण के चैंपियन माने जाने नीतीश कुमार को भ्रष्टाचार का मुद्दा जितना झकझोरता है उतना परेशान उन्हें बच्चियों का यौन उत्पीड़न नहीं करता है! ऐसे में तेजस्वी के शब्दों में क्या ये नहीं कहा जा सकता कि नीतीश सहूलियत के मुताबिक अंतरात्मा जगाते हैं?