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अमेरिकी राजनीति का नया चेहरा

names of candidate who qualified for the september democratic presidential primary debate

  The Spokesman-Review

अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी प्रयोग के एक नए दौर से गुजर रही है. राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी की उम्मीदवारी का दावा करने वाले नेताओं के बीच हुई पहली बहस से ये बात और भी स्पष्ट हो गई. ये जाहिर हुआ कि 2016 के प्राइमरी और कॉकस (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) के दौरान बर्नी सैंडर्स ने जो मुद्दे उठाए थे, अब वो डेमोक्रेटिक पार्टी की मुख्यधारा बन गए हैं. मयामी शहर में हुई उम्मीदवारों की बहस में 20 नेताओं ने हिस्सा लिया. उनके बीच होड़ खुद को कॉरपोरेट सेक्टर से अलग दिखाने की रही. इसके लिए उन्होंने छोटे-छोटे चंदे से चुनाव लड़ने की तैयारी करने का दावा किया. गौरतलब है कि खुद को डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट बताने वाले बर्नी सैंडर्स ने चार साल पहले व्यक्तिगत स्रोतों से चंदा उगाही की कामयाब रणनीति बनाई थी.

इसके अलावा सबके लिए स्वास्थ्य देखभाल, जलवायु परिवर्तन रोकने के उपायों के प्रति निष्ठा, फ्री कॉलेज शिक्षा और गैर-बराबरी खत्म करने की नीतियां अपनाने की बातें भी उम्मीदवारों ने बढ़-चढ़ कर कहीं. ये सारा नया एजेंडा है. पिछले राष्ट्रपति चुनाव के समय बर्नी सैंडर्स ने इन सबको उठाकर खासकर युवा और कामगार तबकों को गोलबंद करने में सफलता पाई थी. पार्टी में सुपर डेलीगेट (अनिर्वाचित पार्टी पदाधिकारियों के वोट अधिकार) के सिस्टम के कारण वे प्रत्याशी नहीं बन सके, लेकिन तब उम्मीदवार बनीं हिलेरी क्लिंटन को अपना एजेंडा अपनाने पर उन्होंने मजबूर जरूर कर दिया था. सैंडर्स समर्थकों का वोट पाने की कोशिश में हिलेरी क्लिंटन ने ये एजेंडा अपनाया. फिर भी उनमें से बहुत से लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया जो उन्हें ऐस्टैबलिशमेंट का हिस्सा मानते थे.

गुजरे चार वर्षों में अमेरिकी- खासकर डेमोक्रेटिक पार्टी की राजनीति इतनी बदल गई है कि अब सैंडर्स का एजेंडा पार्टी का एजेंडा बन गया है. इसके पहले डेमोक्रेटिक पार्टी नस्लीय भेदभाव, गर्भपात जैसे महिला अधिकारों, बंदूक रखने के चलन पर नियंत्रण और मृत्यु दंड के विरोध जैसे प्रगतिशील मुद्दों पर चुनाव लड़ती थी. आर्थिक क्षेत्र में माना जाता था कि बुनियादी मुद्दों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ उसकी सहमति है. कॉरपोरेट और वित्तीय बाजार समर्थक नीतियों के मामले में दोनों पार्टियों के बीच फर्क तलाश पाना तब कठिन काम था. सैंडर्स का योगदान यह है कि डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट एजेंडे को वे जनता के बीच ले गए. उसे इतना समर्थन मिला कि उसके कुछ हिस्सों को अपनाए बिना अब किसी उम्मीदवार को अपना भविष्य नजर नहीं आता.

मगर बाकी उम्मीदवारों में प्रामाणिकता की कमी है. वे अपनी आस्था के कारण नहीं, बल्कि रणनीतिक कारणों से उन मुद्दों को अपनाते दिखते हैं. असल में डेमोक्रेटिक पार्टी के एस्टैबलिशमेंट की कोशिश सैंडर्स को उम्मीदवार बनने से रोकने की लगती है. संभवतः इसीलिए पूर्व उप राष्ट्रपति जो बाइडेन को मैदान में उतारा गया है, जो पार्टी के अंदरूनी जनमत सर्वेक्षणों में सबसे आगे बताए जाते हैं. लेकिन मयामी में हुई बहस के दौरान प्रतिद्वंदियों के हमले से बाइडेन बुरी तरह चोटिल हुए. नस्लभेद, उनके पिछले रिकॉर्ड को लेकर कठिन प्रश्न पूछे गए, जिन पर वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. उम्मीदवारी की होड़ में उतरीं सीनेटर कमला हैरिस के तीखे प्रश्नों ने उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया.

अमेरिका में प्राइमरी और कॉकस की यही खासियत है कि उस प्रक्रिया में उम्मीदवारों का अतीत और वर्तमान पूरी तरह खुलकर जनता के सामने आ जाता है. मसलन, खुद कमला हैरिस का यह अतीत अब चर्चित हुआ है कि जिन मुद्दों के आधार पर वे अपनी प्रगतिशील पहचान बनाना चाहती हैं, उन पर कैसे उनका दोहरा रूप रहा है. दरअसल, ऐसे सवाल ज्यादातर उम्मीदवारों पर उठे हैं. इनके बीच बेदाग सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जिनका रिकॉर्ड अपनी आस्था के अनुरूप राजनीति करने का रहा है.

इसके बावजूद यह तय नहीं है कि सैंडर्स राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी बन जाएंगे. मजबूत लॉबियां उन्हें रोकने में पूरा जोर लगाएंगी. मगर यह तय है कि उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी का एजेंडा तय कर दिया है. जो भी उम्मीदवार बनेगा, उसे इस एजेंडे को अपनाना होगा. वह इसके साथ अपनी विश्वसनीयता बना पाएगा या नहीं, यह दीगर बात है. हिलेरी क्लिंटन ऐसा नहीं कर पाईं तो चुनाव हार गईं. एक बार फिर वो कहानी दोहराई जा सकती है.