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मप्र डायरी: दिग्विजय सिंह की सलाह मानते मंत्री तो न होती बदनामी

the ideology of killer of mahatma gandhi has won says digvijay singh

 

मध्य प्रदेश के बहुचर्चित हनी ट्रैप मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है वैसे ही चौंकाने वाले खुलासे भी हो रहे हैं. चार्जशीट में खाद्य मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर के निजी सचिव हरीश खरे और खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल के विशेष सहायक अरुण निगम के वीडियो बनने का खुलासा हुआ है.

इस मामले में गिरफ्तार महिला मोनिका ने बयान में बताया है कि दोनों ने उससे जबरदस्ती की कोशिश की. दोनों अफसर बीजेपी सरकार के समय भी मंत्रियों की निजी स्थापना में पदस्थ रह चुके हैं.

सीएमओ की नाराजगी के बाद खरे को पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के स्टाफ से हटाया गया था, जबकि निगम की कार्यशैली तत्कालीन मंत्री रंजना बघेल के विशेष सहायक रहते काफी विवादों में रही है. कांग्रेस सरकार बनने के बाद दोनों अफसर अपने संपर्कों का उपयोग कर नई सरकार में मंत्री स्‍टाफ में जगह बनाने में कामयाब हो गए. जबकि सरकार गठन के समय पूर्व मुख्‍यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से मंत्रियों को चेताया था कि वे अपना स्‍टाफ चुनने में सावधानी बरतें.

यह सुझाव भी अहम था क्‍योंकि कांग्रेस बदलाव का नारा दे कर सत्‍ता में आई थी और य‍दि तंत्र वैसा ही काम करता रहता जैसा बीजेपी के समय होता था तो परिवर्तन महसूस नहीं किया जा सकता है. इस सुझाव पर अधिकांश मंत्रियों ने अमल नहीं किया. मंत्री भर बदले लेकिन उनका स्‍टाफ वही है जो बीजेपी के शासन में सक्रिय था. स्‍टॉफ की कार्यप्रणाली में भी कोई परिर्वतन नहीं हुआ. बल्कि सवाल तो उनकी निष्‍ठाओं का भी है.

अब महसूस किया जा रहा है कि यदि पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह की अनुभवजन्‍य सलाह को मान लिया जाता तो हनी ट्रेप जैसे प्रकरण में कांग्रेस सरकार के मंत्री के स्‍टाफ का नाम नहीं आता और सरकार की बदनामी नहीं होती.

माफिया पर नकेल मामले में फिसड्डी ब्‍यूरोक्रेसी

प्रशासनिक गलियारों में यह कहन आम है कि सरकारी काम गैर-सरकारी तरीके से हो ही नहीं सकता है. तंत्र पर सटीक यह व्‍यंग्‍य मुख्‍यमंत्री कमलनाथ की मंशा लागू न होने पर भी लागू हो रहा है.

मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश में जिला और पुलिस प्रशासन को फ्री हैंड दिया है कि वे अपने क्षेत्र में तमाम तरह के माफिया राज को खत्‍म करें. अभियान के शुरू में इंदौर में जीतू सोनी के माफिया-राज को ध्वस्त किया गया. मगर उसके बाद वैसी कार्रवाई किसी भी शहर में नहीं हो पाई है.

मुख्‍यमंत्री ने हर तरह के माफिया को खत्‍म करने की बात कही है मगर प्रशासन का काम अतिक्रमण हटाने तक सिमट गया है. सामान्‍य रूप से नगर निगम अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करता है, जिला प्रशासन से उम्‍मीद थी कि वह गिरोह के रूप में काम कर रहे संगठित अपराधियों पर नकेल कस सकता है.

यही कारण है कि अभियान के लिए आयोजित पहली बैठक में ही मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने मैदानी अफसर की इस सुझाव को खारिज कर दिया था कि माफिया खत्‍म करने के लिए स्‍थानीय नेताओं को विश्‍वास में लिया जाए.

साफ था कि मुख्‍यमंत्री किसी तरह के समझौते के मानस में नहीं है. मगर अफसर तो सरकारी ढर्रे पर काम करने के आदी है. मुख्‍यमंत्री कमलनाथ इस स्थिति से नाराज बताए जाते हैं. अभियान की नए सिरे से समीक्षा कर इसे पटरी पर लाने की तैयारी है. इसके बाद मुहिम को भटकाने वाले अफसरों पर भी कार्रवाई हो सकती है.

नए अध्‍यक्ष के लिए तैयार नहीं बीजेपी

बीजेपी के प्रदेश अध्‍यक्ष का चुनाव होना है. नए अध्यक्ष के नाम पर पार्टी के अंदर घमासान जारी है. एक तरफ वर्तमान अध्यक्ष राकेश सिंह को दोबारा अध्यक्ष बनाए जाने की कोशिश है, दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान अपने गुट के किसी नेता को अध्यक्ष बनाने का प्रयास कर रहे हैं.

प्रदेश के अध्यक्ष के लिए रायशुमारी का फैसला और उसकी बागडोर राम माधव को दी गई हैं. इससे लगता है कि नए अध्‍यक्ष के चयन में संघ की भूमिका अधिक होगी. बीजेपी के साथ संघ का बड़ा धड़ा चाहता है कि प्रदेश में पूर्व मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका न्‍यून ही रहे. इसी कारण वर्तमान अध्‍यक्ष राकेश सिंह को दोबारा मौका दिए जाने की पैरवी की जा रही है.

तर्क दिया जा रहा है कि उन्‍हें पूरा कार्यकाल नहीं मिला है इसलिए पुन: मौका दिया जाना चाहिए. लेकिन कार्यकाल में कोई खास उपलब्धि नहीं होना राकेश सिंह का नकारात्‍मक पक्ष है. शेष दावेदारों में पुराने दिग्‍गजों के नाम शामिल हैं. फिलहाल संगठन नए अध्‍यक्ष का चुनाव की जगह ऊपर से मिले नाम पर सहमति बनाने की तैयारी में है.