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समस्या को झुठलाने की राजनीति

modi politics of confusing the problem

 

अमूमन यह होता आया है कि कोई भी सरकार हो, उसके किए वादों, उसकी घोषित योजनाओं और जमीनी अमल के बीच फर्क रहता है, कहीं ज्यादा कहीं कम. लेकिन कुछ समय से एक बहुत ही चिंताजनक रुझान दिख रहा है और वह है समस्या को झुठलाने का. पहले बीमारी थी क्रियान्वयन में कसर और गड़बड़ी की. नई बीमारी है, समस्या के वजूद से ही इनकार कर देना. जब ऐसा संभव न हो, तो कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि समस्या की गंभीरता को स्वीकार मत करो. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है मंदी. सरकार से लेकर संघ प्रमुख तक किसी को यह गवारा नहीं है कि मंदी पर चर्चा हो.

सरकार ने स्पष्ट रूप से अब भी स्वीकार नहीं किया है कि देश मंदी की गिरफ्त में है. उलटे आए दिन मोदी सरकार के किसी मंत्री या बीजेपी के किसी नेता का ऐसा बयान आ जाता है जिसमें मंदी और नित बढ़ती बेरोजगारी को झुठलाने की कोशिश की गई होती है. कोई कुछ फिल्मों की कमाई के आंकड़े देकर हकीकत पर परदा डालना चाहता है, तो कोई कहता है नौकरियां तो बहुत हैं, योग्य इच्छुकों की कमी है.

यह हालत उस पार्टी की है जिसने रोजगार को लेकर एक बहुत उत्साहजनक वादा किया था, हर साल दो करोड़ नई नौकरियां देने का. लेकिन सत्ता में आते ही उसने न सिर्फ अपने इस वादे को ताक पर रख दिया, बल्कि उसके राज में बड़ी तादाद में नौकरियां चली गईं. फिर भी वह अपने अपूर्व सुशासन की डींग हांकते नहीं थकती!

लाखों लोगों के रोजगार पर कहर टूटना किसी प्राकृतिक आपदा के चलते नहीं हुआ. नोटबंदी ने वे रोजगार छीन लिए और जीएसटी ने बड़े पैमाने पर छोटे-मझले व्यवसाय को अस्त-व्यस्त कर दिया. लेकिन न सरकार इस सच को स्वीकार करने को तैयार है न बीजेपी. वित्तमंत्री कहती हैं कि जीएसटी की आलोचना न करें, क्योंकि अब वह कानून बन चुका है. इस तर्क से तो कोई गलती सुधारी ही नहीं जा सकती. क्या नए यूएपीए की आलोचना इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि वह अब कानून है? संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की दशहरा रैली को संबोधित करते हुए कहा कि मंदी तो आती-जाती रहती है, उस पर ज्यादा चर्चा करने की जरूरत नहीं है. शायद ज्यादा सोचने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि लोग अपनी और देश की आर्थिक हालत पर सोचेंगे तो क्या पता हिंदुत्व को लेकर उदासीन हो जाएं!

लिहाजा, आश्चर्य नहीं कि आर्थिक मुद्दों पर संघ कभी भी गंभीर नहीं रहा. कहने को वह स्वदेशी की वकालत करता रहा और इसके लिए उसने एक संगठन या मंच भी बनाया, पर बीजेपी के राज में भी तमाम क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोलने या उनमें पहले के मुकाबले विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के कदम उठाए जाते रहे और संघ मूकदर्शक बना रहा. यहां तक कि रक्षा क्षेत्र भी विदेशी निवेश के लिए खुल गया और संघ ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का हल्ला नहीं मचाया.

जब देश में मंदी की आहट सुनाई देने लगी, उसके काफी पहले से बेरोजगारी के और विकट रूप लेने के संकेत मिलने थे. लेकिन सरकार ने हकीकत को स्वीकार करने और उससे निपटने की योजना बनाने के बजाय हकीकत पर परदा डालने का रुख अख्तियार कर लिया. याद रहे, 2019 के आम चुनाव से पहले बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े जारी होने से सरकार ने रोक दिया था, जिसकी तमाम अर्थशास्त्रियों ने आलोचना की. क्या छिपाने से समस्या मिट गई? आज दुनिया जानती है कि भारत में बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर है.

छिपाने, गफलत फैलाने और लीपापोती करने की यह प्रवृत्ति मंदी और बेरोजगारी जैसे मसलों तक सीमित नहीं है. कश्मीर के मामले में दुनिया देख चुकी है कि बेहद असामान्य हालात को किस तरह सरकार की तरफ से सामान्य बताया जाता रहा है. यह और भी अफसोसजनक है कि हमारे मीडिया के बड़े हिस्से को इसे तोते की तरह रोज दोहराने में कुछ गलत नहीं लगा. पिछले दिनों महाराष्ट्र में अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर के संदर्भ में कहा, कहां है कोई बंदिश? जो लोग बंदिशों की बात करते हैं, दरअसल बंदिशें उनके दिमाग में हैं. इससे पहले, वह संसद में फारूक अब्दुल्ला की अनुपस्थिति के बारे में पूछे जाने पर तथ्यहीन जवाब दे चुके थे.

सत्ता में होने मात्र से गलतबयानी सच नहीं हो जाती. क्या पता, कल देश के युवा बेरोजगारी का मसला उठाएं तो सरकार की तरफ से जवाब मिले, कहां है बेरोजगारी? बेरोजगारी सिर्फ उनके दिमाग में है जो यह बात उठा रहे हैं! पिछले दिनों शाह ने यह भी कहा कि हमें मानवाधिकारों को पश्चिमी मानकों के हिसाब से नहीं, अपनी परंपरा के हिसाब से देखना चाहिए. उनकी यह दलील मानवाधिकारों का महत्त्व कम करने की कोशिश जान पड़ती है.

मानवाधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है, यह व्यक्ति की सुरक्षा, मानव जीवन की गरिमा और बराबरी और न्याय की अवधारणा है, जो राज्य के बलप्रयोग की मर्यादा और जवाबदेही तय करती है. और इस तरह यह राज्य को भी आपराधिक व्यवहार करने से रोकती है. इसे हमारे संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक तकाजों से ही परिभाषित किया जा सकता है, न कि परंपरा से. यह किसी से छिपा नहीं है कि स्त्रियों, दलितों, अन्य कमजोर तबकों और प्रचलित मान्यताओं से असहमत लोगों के साथ परंपरा ने न्याय नहीं किया है. उनके मानवाधिकार क्या होंगे, क्या यह परंपरा से तय किया जाना चाहिए?

समस्या से आंख चुराने और लीपापोती का सबसे नायाब उदाहरण मोहन भागवत की वह टिप्पणी है जिसमें उन्होंने कहा कि लिचिंग एक विदेशी शब्द है. हमारे देश में जितने बड़े पैमाने पर अंग्रेजी का व्यवहार होता है उसके प्रभावस्वरूप न जाने कितनी चीजों के लिए अंग्रेजी शब्द प्रचलित हो गए हैं. भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मार दिए जाने के लिए शायद कोई एक शब्द हिंदी में नहीं है. लेकिन वह होता और प्रयोग भी किया जाता, क्या तभी हमारा सिर शर्म से झुकता और क्या तभी हमारी सरकारें वैसी घटनाओं को न होने देने के लिए कमर कसतीं?

हमें देखना यह चाहिए कि लिंचिंग की घटनाएं क्यों हो रही हैं, इन्हें किस तरह और कौन लोग अंजाम दे रहे हैं, इनमें पीड़ित कौन हैं और इन घटनाओं को लेकर हमारे पुलिस प्रशासन और सरकारों का रवैया कैसा है. क्या इन घटनाओं की बाबत न्याय की प्रक्रिया तर्कसंगत परिणति तक पहुंची है? इन सवालों के जवाब घोर निराशाजनक रहे हैं. ऐसे में उचित ही देश के कुछ नामचीन व्यक्तियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा. लेकिन अंतरात्मा की आवाज के प्रति श्रवण-शून्य लोगों को इसमें भारत की छवि खराब करने की कोशिश नजर आई!

दुनिया में भारत की छवि लिचिंग की घटनाओं और ऐसी एक घटना के आरोपियों को एक मंत्री द्वारा माला पहनाए जाने से खराब होती है, या लिचिंग का विरोध करने से? गुजरात में 2002 के जनसंहार के बाद खुद तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अब किस मुंह से विदेश जाएंगे! 2002 से पहले 1984 ने भी भारत की प्रतिष्ठा गिराई थी. ऐसी घटनाएं शर्म कही जाएंगी, या उनकी मुखालफत? लिचिंग के लिए कोई दूसरा शब्द इस्तेमाल करेंगे तो वह भी वहशीपन और एक खास तरह के अपराध को ही सूचित करेगा. इसलिए असल मुद्दा बर्बरता है, शब्द नहीं.

क्या विडंबना है कि जब दुनिया गांधी को याद कर रही है, तब वहीं गांधी के अपने देश में असत्य के प्रयोगों की बाढ़ आई हुई है!