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मध्य प्रदेश डायरी: बीजेपी की रणनीति और कांग्रेस की चुनौतियों पर एक नज़र

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मध्य प्रदेश में नई सरकार का गठन हो चुका है और 15 सालों से सत्ता में बैठी बीजेपी अब विपक्ष में बैठने को मजबूर है. विपक्ष की भूमिका में आने के बाद बीजेपी की रणनीति और सत्ता में आने के बाद कांग्रेस की चुनौतियों पर डालिए एक नज़र.

‘टाइगर’ की धमकी गैरों के लिए कम, अपनों के लिए ज्‍यादा

सूबे में हार का सामना करने के बाद भी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री और अब विधायक शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता में कमी नहीं आई है. वे लगातार भ्रमण कर रहे हैं. तीखे बोलों से हमले कर रहे हैं. कभी खुद को टाइगर बताते हुए ‘जिंदा’ होने का सबूत दे रहे हैं तो कभी कहते हैं कि उनके द्वारा आरंभ की गई सभी योजनाओं को चालू नहीं रखा गया तो वे ईंट से ईंट बजा देंगे.

शुरुआत में माना गया कि वे एक-दो दिनों बाद शांत हो कर मंथन करेंगे और पार्टी प्रवक्‍ता सहित दूसरे नेता कांग्रेस सरकार को घेरेंगे. मगर हुआ इसके उल्‍ट.

पार्टी के दूसरे पदाधिकारी खामोश हैं और शिवराज सक्रिय बने हुए हैं. शिवराज की इस सक्रियता पर खासे चटखारे लिए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि उनकी यह सक्रियता कांग्रेस की घेराबंदी के लिए कम और बीजेपी के भीतर अपने दुश्‍मनों को डराने के लिए अधिक है. हार के बाद उन्‍हें किनारे न कर दिया जाए यह सोच कर शिवराज मैदान में सक्रिय हैं और अपनी धमकियों को ‘गीदड़ भभकी’ बनने से बचाने के उपक्रम कर रहे हैं.

साहब अभी मूड भांप रहे हैं…

सरकार गठन के बाद संभावित मंत्रियों के समर्थकों के साथ ही ब्‍यूरोक्रेसी भी उलझन में है. आरंभिक प्रशासनिक सर्जरी के बाद मुख्‍यमंत्री कमलनाथ तो मंत्रिमंडल गठन की कवायद में व्‍यस्‍त हो गए और अफसर ‘सरकार’ का मूड भांपने में.

संभावित विभागीय मंत्री के बारे में टोह लेते अफसरों ने कांग्रेस के घोषणा पत्र ‘वचन पत्र’ को पूरा करने की अपनी जिम्‍मेदारी का आकलन कर उसे पूरा करने का रोडमैप बना लिया है. वे मीडिया के संपर्कों सहित कांग्रेस सरकार में अलग-अलग ओहदों पर रहे साथियों और स्‍टाफ से दिशा-दशा को समझने की कोशिशों में जुटे हैं.

सरकार के कदमों का अनुमान होने तक अफसरों ने अपनी दिनचर्या में वक्‍त पर दफ्तर पहुंचना और समय पर घर वापसी को जरूर साध लिया है.

कांग्रेस को घेरने के फेर में उलझे भाजपाई

मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने शपथ ग्रहण करने के कुछ ही घंटों में कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ को पूरा करने की शुरुआत करते हुए किसानों के कर्ज की माफी के आदेश पर हस्‍ताक्षर कर दिए. कुछ ही मिनट में आदेश जारी भी हो गया.

मगर, 31 मार्च 2018 की डेडलाइन होने की गफलत के कारण बीजेपी की सोशल मीडिया बिग्रेड को मौका मिल गया और वे कांग्रेस पर टूट पड़े. इसे किसानों के साथ धोखा बताते हुए इतने मैसेज वायरल किए गए कि सत्‍ता पक्ष से सफाई दी गई.

जब मुख्‍यमंत्री ने कर्ज माफी के लिए मुख्‍य सचिव की अध्‍यक्षता में एक कमिटी ही बना दी तब अपने मुद्दे की हवा निकलती देख भाजपाइयों ने यूरिया संकट को मुद्दा बनाया. उन्‍होंने यह साबित करने का प्रयास किया कि प्रदेश में उर्वरक संकट कांग्रेस सरकार कि विफलता है. जब सत्‍ता पक्ष ने सक्रियता दिखाई तो इस मोर्चे से भी उल्‍टे पैर लौटना पड़ा.

अचानक कम हो गई संघ कार्यालय में उपस्थिति

बीजेपी के 15 सालों के शासनकाल में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के कार्यालयों और शाखाओं में उपस्थिति तेजी से बढ़ती हुई दिखाई दी थी.

सरकार के इन ‘पॉवर सेंटरों’ पर आरंभ में तो लोग देर शाम या एकांत के समय आना पसंद करते थे मगर बाद में सरकारी कर्मचारी हो या सामाजिक व व्‍यवसायिक संगठनों के पदाधिकारी, हर व्‍यक्ति खुल कर इन केन्‍द्रों में दिखाई देने लगा था.

शिवाजी नगर में विश्‍व संवाद केन्‍द्र के दफ्तर जैसी प्राइम लोकेशन वाली शाखा में तो बढ़-चढ़ कर चेहरा दिखाने की होड़ लगी रहती थी. बीजेपी की सरकार को विदा हुए एक पखवाड़ा भी न बीता कि इन केन्‍द्रों पर सन्‍नाटे सी शांति हैं.

चेहरा दिखाने वालों की भीड़ हट चुकी है. यहां तक कि बीजेपी के प्रदेश कार्यालय में रहने वाली चहल-पहल अब बरसों तक सूने रहे कांग्रेस प्रदेश कार्यालय की ओर मुड़ चुकी है.