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कंप्यूटरों पर इस निगरानी के मायने समझिए

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अब वित्तमंत्री अरुण जेटली विपक्ष पर तिल का ताड़ बनाने का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि कंप्यूटर और अन्य संचार उपकरणों को केंद्रीय जांच एजेंसियों की निगरानी के दायरे में लाना कोई नई बात नहीं है.

उनकी सरकार ने बस सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 में पहले से मौजूद धारा 69(1) को लागू किया है. जेटली एक कदम आगे जाकर यह याद दिलाना भी नहीं भूलते कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून में यह धारा यूपीए के शासन में जोड़ी गई थी.

गुजरी सरकारों के फैसलों को सामने रख अपनी आलोचनाओं का जवाब देने की यह अंदाज अब ज्यादा अटपटा नहीं लगता. बल्कि देखा जाए तो बीते कुछ सालों में जैसे यह अंदाज ही बीजेपी की राजनीतिक कार्यशैली की पहचान बन गया है.

लेकिन इस तरह के जवाब सच की आधी-अधूरी तस्वीर ही पेश करते हैं. जेटली का जवाब भी कुछ ऐसा ही है. वे ये भूल जाते हैं कि यूपीए ने इस कानून में धारा 69 (1) साल 2008 में जोड़ी थी. यह वह समय था जब नागरिकों के निजता के अधिकार को लेकर सार्वजनिक दायरे में इतनी बहस नहीं थी. आधार परियोजना के बाद निजता के अधिकार से जुड़े हर पहलू पर नए सिरे से विचार किया गया है.

बीते साल सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ यह स्पष्ट कर चुकी है कि निजता का अधिकार नागरिकों का मौलिक अधिकार है. राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भी सरकार नागरिकों के इस अधिकार के प्रति कोई समझौतावादी रुख नहीं अपना सकतीं.

जेटली विपक्ष को नसीहत देते समय इस बदले हुए सन्दर्भ का ध्यान नहीं रखते. इतना ही नहीं, बात बात पर कांग्रेस और यूपीए के राज को कोसने वाली उनकी सरकार को इस मामले में यूपीए की राह पर चलने में कोई दिक्कत नहीं होती.

जाहिर है कि हालिया आदेश में ऐसा बहुत कुछ है, जिसका सन्दर्भ और सन्देश दोनों अलग है. इसका संबंध जितना धारा 69(1) के प्रावधानों से है, उतना ही उस व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से भी है, जिसमें यह आदेश जारी किया गया है. निस्संदेह, धारा 69 (1) के प्रावधान नागरिकों की निजता के अधिकार में असीमित हस्तक्षेप करते हैं. इस आदेश की आंच केवल सर्विस प्रोवाइडर या संस्थानों की निगरानी तक नहीं जाती बल्कि निजी तौर पर कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति भी इसके दायरे में आ जाता है.

ऐसी स्थिति में सरकार ऑफ-लाइन सूचनाओं को भी खंगाल सकती है. ये सीधे तौर पर निजता के अधिकार का उल्लंघन है. फिर, जिन दस एजेंसियों को यह अधिकार दिया है, धारा 69(1) के तहत उनका आदेश मानना बाध्यकारी है. ऐसा नहीं करने पर सात साल की सजा का प्रावधान है.

बेशक, सरकार ये सफाई दे रही है कि केंद्रीय गृह सचिव की अनुमति मिलने के बाद ही एजेंसियां कम्प्यूटरों की निगरानी कर सकेंगी, लेकिन ये सफाई जैसे मामले की लीपा-पोती करने के लिए दी जा रही है. गर ऐसा नहीं होता तो सरकार शायद मूल आदेश के साथ निगरानी की प्रक्रिया और संबंधित दिशा-निर्देशों का भी विस्तृत विवरण देती.

दरअसल, यह आदेश इस बात की बानगी है कि कैसे वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में मोदी सरकार सार्वजनिक विमर्श को अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के अनुरूप ढालते और उसे नियंत्रित करने की हर संभव कोशिश कर रही है. ‘राष्ट्र’, ‘राष्ट्रीय हित’ और यहां तक कि ‘कानून और व्यवस्था’ की मनचाही परिभाषाएं गढ़कर वह एक राजनीतिक सहमति का निर्माण करना चाहती है. सूचनाओं को नियंत्रित करना इस व्यापक रणनीति का हिस्सा भर है. संयोग से मणिपुर के मुख्यमंत्री की आलोचना करने वाले पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हुई गिरफ्तारी भी यही संकेत करती है.