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इतिहास की प्रगतिवादी धारा को रोकने का एक और प्रयास

analysis of rejection of indian history congress

  विकिमीडिया

पहली नज़र में यह केवल एक सूचना भर है कि 28 से 30 दिसम्बर 2018 को होने वाली 79 वीं इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस रद्द कर दी गयी है. इस कांग्रेस को पुणे के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय में होना था. इसके बारे में तैयारियां पिछले एक वर्ष से चल रही थीं. पिछले वर्ष इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस पश्चिम बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई थी.

12 दिसम्बर को उन सदस्यों को एक मेल आया जिन्हें इस कांग्रेस में सम्मिलित होना था. उसमें लिखा था कि स्थितियां हमारे नियन्त्रण से बाहर हैं और हमें 79वीं इतिहास कांग्रेस की तिथियों को टालने के लिए बाध्य होना पड़ा है. आप अपने बैंक के खाते का विवरण भेजिए, हम उसमें आपके द्वारा जमा की गयी धनराशि वापस कर देंगे.

यह न तो मात्र पैसे के लेनदेन का मसला है और न ही किसी कांग्रेस का रद्द हो जाना भर है बल्कि इसके गहरे निहितार्थ हैं. आधुनिक भारत में एक विषय के रूप में इतिहास को स्थापित करने और उसे बढ़ाने में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस की स्पष्ट और परिणामदायी भूमिका रही है. इस कांग्रेस का टल जाना अच्छा संकेत नहीं है. माना जा रहा है कि इसे ‘बाहरी दवाब’ चलते टाल दिया गया है.

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इस घटनाक्रम को यदि पुणे के इतिहास से जोड़कर देखें तो समझने में आसानी होगी. आज़ादी के आंदोलन के दौरान पुणे सबसे उद्दीप्त और सक्रिय शहर रहा है. उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में इसे एक बौद्धिक शहर के रूप में वैज्ञानिकों, न्यायाधीशों, अध्यापकों और महिलाओं ने संवारा था. इस शहर में उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य भारत के लोग मिल जाएंगे. इस शहर में कोंकणी, गुजराती, तमिल और कन्नड़ विद्वान और मजदूर पर्याप्त संख्या में हैं. इस शहर में युवाओं की एक बड़ी जनसंख्या है और कुछ खूबसूरत नए-पुराने सिनेमाहॉल और काफ़ी-हाउस हैं. शहर में कई प्रेक्षागृह हैं जिसमें एक तो इतना बड़ा है जिसमें हज़ार के करीब लोग बैठ सकते हैं. उसमें कालिदास की पंक्तियाँ अंकित हैं.

तो यह सब इस शहर को भारत की आधुनिक चेतना और विद्या के क्षेत्र में श्रेष्ठ परंपराओं का वाहक शहर के रूप में पेश करते हैं और वहाँ के नागरिकों को इस शहर पर गर्व करने का कारण उपलब्ध कराता है. पुणे शहर के बौद्धिक जीवन में एमजी रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, जीवी जोशी, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, महर्षि कर्वे, एमएस सुकथनकर, पीवी काणे, इरावती कर्वे और शर्मिला रेगे की बौद्धिक छाप अभी भी महसूस की जा सकती है.

सितम्बर 2018 में मैं पुणे विश्वविद्यालय गया था और शहर के एक कॉलेज में इस विषय पर व्याख्यान भी दिया था. वहां अंग्रेजी के एक प्रोफेसर ने बहुत ही गर्व से कहा भी था कि यह शहर संस्कृत और मराठी के अध्ययन का गढ़ रहा है.

पुणे विश्वविद्यालय का नामकरण सावित्री बाई फुले के नाम से किया गया है और इसका कैम्पस देश के कुछ सबसे खूबसूरत कैम्पसों में हैं. बरगद के विशाल पेड़ इसकी स्थाई पहचान हैं. वह जैसे इस विश्वविद्यालय के चरित्र को दर्शाते हों- विशाल और दृढ़. और इस वर्ष इसी विश्वविद्यालय में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का आयोजन होना था. इससे शहर और विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ती और देश-विदेश से आए विद्वानों को इस शहर के समृद्ध इतिहास से रूबरू होने का मौका मिलता.

पुणे शहर मार्क्सवादी इतिहासकार डीडी कोसंबी के लिए भी जाना जाता है. पेशे से गणितज्ञ कोसंबी ने आरंभिक भारतीय इतिहासलेखन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी. यह कांग्रेस पुणे के एक बेहतरीन इतिहासकार को याद करने का अवसर बनती. तो कहने का आशय है कि सावित्री बाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती थी जहाँ भारतीय इतिहास कांग्रेस का आयोजन हो.

पुणे शहर, इतिहासकारों और सबसे बढ़कर देश का सामूहिक दुर्भाग्य यह रहा कि इस आयोजन के आयोजित होने के मात्र दो हफ्ते पहले इसे रद्द कर दिया गया. कहा गया कि विश्वविद्यालय के पास इतने साधन नहीं हैं जितने की आवश्यकता होगी. क्या विश्वविद्यालय को इसे पहले नहीं सोचना था? उसने इसे कराने के लिए इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के सचिव से रजामंदी जाहिर की थी. ऐसा नहीं है कि पुणे विश्वविद्यालय को यह सब मुफ़्त में कराना था. प्रतिभागियों से दो हजार रूपये भी जमा भी कराए गए थे. इस धन से उनके भोजन और आवास की व्यवस्था की जानी थी.

पिछली बार जब जादवपुर में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस हुई थी तो 1500 के करीब प्रतिभागी आए थे. इस बार भी 1000 के करीब इतिहासकारों ने अपना पैसा जमा कर दिया था और वे पुणे में ज्यादा से ज्यादा पाँच दिन रुकने वाले थे- एक दिन पहले पहुँचना और कांग्रेस के समाप्त होने के अगले दिन निकल जाना. पुणे आने-जाने के लिए प्रतिभागियों ने अपने खर्च पर ट्रेन और हवाई जहाज के टिकट करा रखे थे. हवाई जहाज के टिकट कराने वाले लोगों के पैसे लगभग डूब गए जबकि ट्रेन की यात्रा रद्द कराने में भी बड़ी राशि रेलवे काट लेता है. ऐसे नौजवान जिनके पास चार पैसे केवल फेलोशिप से आते हों, कुछ मामलों में बेरोजगार इतिहासकार भी इस कांग्रेस में जाते रहे हैं, उनके लिए टिकट कैंसिल करना आर्थिक विपदा है. उन रिटायर्ड प्रोफेसरों के लिए भी यह तनाव का कारण है जिनके पास किसी पेंशन की सुरक्षा नहीं है.

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भारतीय इतिहास कांग्रेस का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इसे 1935 में स्थापित किया गया था और इसके सालाना आयोजनों में अपना शोध पत्र पढ़ना नौजवान और उभरते युवा इतिहासकारों का सपना होता है, वहीं जमे-जमाए इतिहासकार इन नौजवानों से कुछ नया सीखते हैं और बदले में उन्हें भविष्य की राहें दिखाते हैं. इस कांग्रेस में सदियों के संचित ऐतिहासिक ज्ञान का नवीनीकरण होता है और भविष्य की कार्य-योजना तैयार की जाती है. इसमें पढ़े जाने वाले शोधपत्रों की प्रोसीडिंग्स में छपना सम्मान की बात है और भारत की लगभग सभी बेहतर लाइब्रेरी इस प्रोसीडिंग्स को अपने स्थाई संग्रह में शामिल करती हैं. भारत का हर पेशेवर इतिहासकार इन्हें जरुर देखना और पढ़ना चाहता है.

दूसरे अनुशासनों के बीच भी यह प्रोसीडिंग्स काफी लोकप्रिय है. इतिहास कांग्रेस बुलेटिन, स्मारिकाएं और जर्नल भी निकालती है. प्रत्येक साल इसकी सामान्य सभा मिलती है और इतिहास के अध्ययन और शोध के लिए प्रस्ताव पास करती है. इस प्रकार यह कांग्रेस सीखने का सबसे सुंदर अवसर है. पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ा-पढ़ाया जा रहा है, इसे जानने का यह अवसर होता है. ऐसा सभी शैक्षिक आयोजनों के साथ होता है चाहे वह संस्कृत भाषा की कांग्रेस हो, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद की कांग्रेस हो या पक्षी वैज्ञानिकों की कांग्रेस हो- विद्वानों के यह जमावड़े न केवल विषय को जानने का अवसर होते हैं बल्कि देश को नए तरीके से जानने की खिड़की उपलब्ध कराते हैं. भारत ने यह अवसर गँवा दिया है. यह सबसे दुखद है.

अपनी स्थापना के समय से लेकर अब तक इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में इतिहासकारों का कोई समूह किसी एक स्वर में नहीं बोला है, उसमें अंदरूनी तनाव मौजूद रहे हैं लेकिन इसका मुख्य स्वर मार्क्सवादी ही रहा है. इन इतिहासकारों ने धर्म, राज्य और अर्थव्यवस्था के मुद्दे का धारदार विश्लेषण किया है. इस मंच से और उससे बाहर भी इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस से जुड़े इतिहासकारों ने जन पक्षधरता और वैज्ञानिक चेतना को बनाए रखने का लगातार प्रयास किया है.

आप इसकी वेबसाइट खोलिए. इसके मुख पृष्ठ पर ही इसके वैचारिक रुझानों और दिशा का पता चल जाता है. एक फोटो में इरफ़ान हबीब वक्तव्य दे रहे हैं, अगले फोटो में भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी दिखते हैं. रोमिला थापर और सव्यसाची भट्टाचार्य दिखते हैं. इन इतिहासकारों के लिखे और कहे से भारत के रूढ़िवादी, प्रतिगामी समूहों को लगातार दिक्कत होती रही है, इसलिए इनकी लगातार निंदा भी की जाती रही है.

सोशल मीडिया और खुले मंचों से उनके खिलाफ़ घृणा अभियान चलाया जाता रहा है. इन विद्वानों ने इसका जवाब अपने उम्दा इतिहास लेखन से दिया है. एक ऐसे दौर में जब इतिहास, धर्म, साम्प्रदायिकता और राज्य को एक ही धरातल पर ले आने की कोशिशों को परवान चढ़ाया जा रहा हो, उसमें कॉर्पोरेट की मदद भी शामिल हो तो उसमें सार्वजनिक वित्त से पोषित किसी विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास कांग्रेस अपने प्रस्तावों और इतिहासकारों के लेखन से छेद कर देने का प्रयास भी करती रहती है. इसलिए अबकी बार उस अवसर को ही समाप्त कर देने का निंदनीय प्रयास किया गया. यह अकादमिक स्वतन्त्रता और स्वतंत्र चिंतन के लिए कतई ठीक बात नहीं है.

(रमाशंकर सिंह प्रशिक्षित इतिहासकार हैं और शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फेलो हैं.)