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हिन्दू-मुसलमान में बंटे देश में बच्चे कौन सा गीत गाएंगे?

India of my dreams

 

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसके ये गुलसितां हमारा
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

मैं अल्लामा इकबाल की इन्ही पंक्तियों के साथ बड़ी हुई हूं. इस नज्म का शीर्षक है, “हिन्दुस्तानी बच्चों का कौमी गीत.”

ये हम सब बच्चों का पसंदीदा गीत था, जिसमें सभी धर्मों के मानने वाले बच्चे थे. इस नज्म के अलावा हम सब बच्चे, ‘मेरे प्रभुवर मेरी तुझसे ये प्रार्थना है’ और ‘राम नाम रस पी ले मनवा’ जैसे गीत भी गाते थे. हम सब बच्चे जिसमें सभी धर्मों को मानने वाले शामिल थे कभी भी इन गानों को ‘हिन्दू गाना’ या ‘मुस्लिम गाना’ की तरह नहीं देखते थे.

विभाजन के जख्म को झेलने के बावजूद मैंने और मेरे परिवार ने हमेशा अपने मुल्क हिन्दुस्तान को सभी मजहब, सभी सम्प्रदाय, सभी जाति तथा सभी धर्मों के लिए एक जन्नत की तरह देखा. वो सब एक ऐसे बच्चे के उत्साही चिंतन के हिस्से थे जिसका परिवार एक ऐसे भारतवर्ष का पक्का समर्थक था जिसकी कल्पना गांधी और नेहरू ने की थी.

मेरी दादी महात्मा गांधी की शहादत वाली रात को रात भर रेडियो से चिपकी हुई गांधी जी की अंत्येष्टि का प्रसारण सुनती रही. उस रात हमारे घर में किसी ने खाना नहीं खाया था.
लेकिन आज के हालात को बयान करने के लिए मैं कवि विलियम बटलर येट्स की इस पंक्ति का सहारा लेना चाहूंगी. “सबकुछ, सबकुछ तब्दील हो गया.” मैं भी एक ऐसे भारत में रह रही हूं जिसे मैं पहचान नहीं पा रही हूं.

मैं एक ऐसे भारत को देखना चाहूंगी जिसमें लाखों फूल खिले हों जो अलग-अलग रंगों के हों. मैं चाहती हूं कि गरीबों में भी जो सबसे गरीब हैं उसे भी एक सम्मानजनक जीवन मिले. मैं चाहती हूं कि महिलाओं को ऐसा जीवन जीने की आजादी मिले जैसा वह खुद चाहती हैं. मैं इस धरती को कुपोषण, हिंसा, दमन और अशिष्टता से मुक्त देखना चाहती हूं. पिछले पांच साल में ये सारी कुरीतियां आम हो गईं हैं. बहुत सारे ऐसे मूल्य जिन्हें हमें सिखाया गया था आज वो सब बेकार साबित कर दिए गए हैं. नेहरू के आदर्शों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं तथा उन्हें इतिहास से भी मिटाने की साजिश की जा रही है. वर्तमान सरकार ने बड़े-बड़े वादे किए थे लेकिन उनमें से ज्यादातर को पूरा नहीं किया गया है.
यूपीए के दोनों कार्यकालों के दौरान सरकार में ऐसे लोग थे जिनकी मेहनत की वजह से मनरेगा, एनआरएचएम और आईसीडीएस जैसी लोक कल्याणकारी योजनाएं लागू की जा सकीं.
दशकों के जन आंदोलनों के परिणामस्वरूप ‘शिक्षा का अधिकार’ और ‘सूचना का अधिकार’ जैसे ऐतिहासिक कानून पास किए गए.

बीजेपी के शासन के दौरान जनकल्याणकारी योजनाओं की घोषणा तो बहुत धूमधाम से की जाती रही लेकिन जमीन पर उसकी सफलता के निशान कहीं देखने को नहीं मिले. कहां गए वो वादे जिसके तहत सभी गरीब भारतीयों के बैंक खाते में पैसे मिलने वाले थे? बल्कि इसके उलट नोटबंदी एक त्रासदी साबित हुई.

क्या इसी बात के लिए हमने साल 2014 में वोट किए थे? बिल्कुल नहीं! बड़े-बड़े वादे धूमिल हो गए. चुनाव के विभिन्न चरणों के समाचार को टीवी पर देखते हुए मतदाताओं की कम उपस्थिति का पता चला? 130 करोड़ की आबादी वाले देश की जनता उनलोगों को किस प्रकार का संदेश दे रही है. इसका पता कुछ हफ्तों में लग जाएगा.

उन 18 करोड़ मुसलमानों को कैसे नजरअंदाज किया जाए जो न्याय पाने के लिए लाइनों में खड़े हैं? जिन्हें न्याय से वंचित रखा गया है. जो गरीबों में भी सबसे गरीब हैं, जिन्हें गाय का मांस खाने और गाय की हत्या करने के शक की बिना पर लिंच कर दिया जाता है. उन्हें मारा-पीटा जाता है, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है. पुलिस इस भीड़ की हिंसा का मूकदर्शक बनी रहती है. पुलिस बल को कार्यहीन और अधिकार विहीन बना दिया गया है. दलितों को गाय के नाम पर या अपने अधिकारों की इच्छा जाहिर करने पर बेरहमी से पीटा जाता है. ये रोज-रोज की एक सी कहानी है.

हिंसा और असफलता को राष्ट्रवाद और झूठे नारों के पीछे छुपाने की कोशिश हो रही है. वो राष्ट्रवाद जिसके बारे में महात्मा गांधी ने हमें बार-बार बतलाया, जिसमें नेहरू ने विश्वस प्रकट किया तथा जिसको मौलाना आजाद ने बताया आज उस राष्ट्रवाद को सिलेबस से हटाया जा रहा है. ताकि लोगों के जेहन से उसे मिटाया जा सके.

इस नए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल पड़ोसी देशों और उन देशवासियों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए किया जा रहा है जो दूसरे धर्मों को मानने वाले हैं या जो जन्म से ही नीची जाति कहलाने के लिए अभिशप्त हैं. हर तरफ उन महिलाओं के खिलाफ हिंसा का माहौल है जो एक व्यक्ति की तरह अपनी मर्जी से और आजादी से जीना चाहती हैं.

निश्चित ही यह वो हिन्दुस्तान नहीं है जिसमें हम पले-बढ़े हैं. बिल्कुल नहीं. ये वो जगह नहीं है, जिसे हम ‘सारे जहां से अच्छा’ कह सकें. और फिर वो ये हिन्दुस्तान भी नहीं है जिसके बारे में शायर और दार्शनिक अल्लामा इकबाल ने 1936 में कहा था,

“कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा”

नहीं ये वो हिन्दुस्तान नहीं है जिसमें हम पले-बढ़े थे या फिर जिसमें हमने रहने की कल्पना की थी.

डॉक्टर सैयदा हमीद – लेखिका और समृद्ध भारत फाउंडेशन की ट्रस्टी

रेयाज अहमद – फेलो, मुस्लिम वीमेंस फोरम