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भारतीय दवाओं की चीन पर बढ़ती निर्भरता

increasing dependence of indian medicines on china

 

युद्ध केवल सेना के बल पर नहीं लड़ा जा सकता है वरन् देश को भी उसके लिये तैयार रखना पड़ता है. मसलन वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक हालात ऐसी है कि वह जंग नहीं छेड़ सकता है.

सतही तौर पर देखने से लगता है कि भारतीय सेना चीन से भी लोहा ले सकती है लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि भारत में जिन जीवन रक्षक और आवश्यक दवाओं का उत्पादन होता है उसे बनाने के लिए लगने वाले एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स के लिए भारतीय दवा कंपनियां चीन पर अत्यधिक निर्भर है. जाहिर है कि यदि किसी समय मिलिट्री वार या ट्रेड वार के समय चीन, भारत को सप्लाई की जाने वाली इन बल्क ड्रग पर रोक लगा दे तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में त्राहिमाम मच सकता है. ऐसा नहीं है कि इस पर सरकार का ध्यान नहीं है लेकिन अब तक चीन पर से दवाओं के उत्पादन के लिये अति निर्भरता से छुटकारा नहीं पाया जा सका है.

जाहिर है कि भारत का मनोबल गिराने के लिए चीन इन बल्क ड्रग की सप्लाई रोक सकता है. ऐसी स्थिति में भारतीय दवा कंपनियों को यूरोप तथा अन्य विकसित देशों से इन बल्क ड्रग का आयात करना पड़ेगा. जानकारों की मानें तो उनका मूल्य चीनी बल्क ड्रग से चार गुना हो सकता है जिससे भारत में दवाओं के दाम इतने गुना ही बढ़ाने पड़ेंगे वरना कौन सी निजी कंपनी घाटा सहकर दवा बेचने वाली है.

बात केवल सैन्य युद्ध, सीमा पर टकराव या ट्रेड वार की ही नहीं है बल्कि देश की आत्मनिर्भरता की भी है. जो देश बीमार पड़ने पर जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाओं के लिए विदेशों पर निर्भर है विकास का दावा किस आधार पर कर सकता है.

आज से 20-30 साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी. बल्क ड्रग का हमारे देश में उत्पादन भी होता था तथा उसे बड़ी मात्रा में विदेशों को निर्यात भी किया जाता था. लेकिन वैश्वीकरण की जंग में भारत इसमें पिछड़ गया. इसका कारण है कि चीन से मंगाए जाने वाले बल्क ड्रग सस्ते होने लगे. चीनी सरकार बल्क ड्रग के निर्माण करने वाली कंपनियों को कई तरह से आर्थित सहायता भी प्रदान करती है. ज्यादा मुनाफे कमाने के लिए भारतीय दवा कंपनियों ने बल्क ड्रग का उत्पादन करने की बजाए उसे चीन से आयात करना शुरू कर दिया.
कहा जाता है कि जहां से बाज़ार की शुरुआत होती है वहीं पर मानवता दम तोड़ देती. इस मामले में भारतीय निजी दवा कंपनियों ने देश को एक संकट के सामने लाकर खड़ा कर दिया है.

भारत दवाओं के उत्पादन के मामलें में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. लेकिन आज भी अधिकतर एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स पड़ोसी चीन से ही आयात किया जाता है.

समाचार एजेंसी पीटीआई की 13 मार्च, 2018 की खबर के मुताबिक संसद में सूचना दी गई थी कि साल 2016-17 में चीन से 66 फीसदी बल्क ड्रग का आयात किया गया. भारत ने पड़ोसी देशों से साल 2015-16 में कुल 13,853 करोड़ रुपयों का आयात किया था जबकि चीन से ही साल 2016-17 में 12,254 करोड़ रुपयों के बल्क ड्रग का आयात करना पड़ा था. साल 2016-17 में भारत ने कुल 18,372 करोड़ के बल्क ड्रग का आयात किया था.

दरअसल, इन बल्क ड्रग से ही जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाएं बनाई जाती हैं. पिछले साल जब चीन की सरकार ने पर्यावरणीय कारणों से चीन के कई उत्पादन इकाई को बंद कर दिया था तब भारत में बल्क ड्रग के दाम बढ़ गए थे. मसलन बुखार की दवा पैरासीटामॉल के बल्क ड्रग का दाम 45 फीसदी, एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन का दाम 36 फीसदी, सिप्रोफ्लाक्सासिन का दाम 28 फीसदी बढ़ गया था.

इसके अलावा भी अल्सर की दवा रैबीप्राजॉल, इशमोप्रजॉल, पैन्टाप्रजॉल, नसों की दवा मिथाइलकोबाल्मिन, उच्च रक्तचाप की दवा लोसारटन, टेल्मीसारटान, हृदयरोग की दवा सिल्डनाफिल, तथा सिफोलोस्पोरिन ग्रुप की दवा सीफेक्सिन, सैफपोडक्सोमिन और सेफ्युरोक्सिन के बल्क ड्रग की कीमत बढ़ गई थी. इससे यही साबित होता है कि आप लाख वैश्वीकरण के गुणों का बखान करे परन्तु जिस देश से आयात किया जाता है वहां पर होने वाली हर हलचल से हम प्रभावित हो जाते हैं. बता दें कि हमारे देश में दवाओं पर ढीला-ढीला ही सही, मूल्य नियंत्रण लागू है. ऐसी हालात में कौन सी निजी कंपनी घाटा सहकर जनता को दवा बेचेगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

पिछले साल मोदी सरकार-1 के समय वाणिज्य मंत्रालय और बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने संयुक्त रूप से एक अध्ययन करवाया था. जिसे तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने जारी किया था जिसमें कहा गया था कि भारत दवाओं के एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स के लिए चीन पर निर्भर है. इसके अनुसार भारत अपने पड़ोसी देशों से करीब 80 फीसदी (मात्रा के आधार पर) एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स का आयात करता है.

इसी अध्ययन में पाया गया कि चीनी सरकार वहां की एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स बनाने वाली निजी कंपनियों को भरपूर मदद करती तथा बैंकों से भी कम ब्याज पर कर्ज दिया जाता है. आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि चीन की दवाओं को भारत में रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए दो से पांच माह का समय लगता है जबकि चीन में भारतीय दवाओं को रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए दो से पांच साल का समय लगता है. जाहिर है कि इस मामले में भारत कुछ ज्यादा ही खुला हुआ देश है.

ऐसा नहीं है कि यह बात सरकार की जानकारी में नहीं है लेकिन पिछले साल इस दिशा में ईमानदार कोशिश करने के बावजूद भारत में बल्क ड्रग का निर्माण देश की आवश्यकता के अऩुसार शुरू नहीं किया जा सका है. नतीजतन, दवाओं की कमी देश के हौसले पर नकारात्मक असर डाल सकती है. वर्तमान में हमारे देश की दवा कंपनियां चीन से एस्परिन से लेकर पैरासिटामॉल तथा एंटीबायोटिक्स एवं शुगर की दवा मैटफॉर्मिन तक का आयात करती है.

आज से 20 साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी. बल्क ड्रग का हमारे देश में उत्पादन भी होता था तथा उसे बड़ी मात्रा में विदेशों को निर्यात भी किया जाता था. लेकिन वैश्वीकरण की जंग में भारत इसमें पिछड़ गया. इसका कारण है कि चीन से मंगाये जाने वाले बल्क ड्रग सस्ते होने लगे.

चीनी सरकार बल्क ड्रग के निर्माण करने वाली कंपनियों को कई तरह से आर्थिक सहायता भी प्रदान करती है. ज्यादा मुनाफे कमाने के लिए भारतीय दवा कंपनियों ने बल्क ड्रग का उत्पादन करने की बजाए उसे चीन से आयात करना शुरू कर दिया. कहा जाता है कि जहां से बाज़ार की शुरुआत होती है वहीं पर मानवता दम तोड़ देती. इस मामले में भारतीय निजी दवा कंपनियों ने देश को एक संकट के सामने लाकर खड़ा कर दिया है.

पिछले साल यह मामला संसद में उठा था. भारतीय दवा कंपनियां देश में दवाओं के उत्पादन में लगने वाली 84 फीसदी बल्क ड्रग का आयात करती है जिसमें से 65 से 70 फीसदी चीन से आयात किया जाता है. भारतीय दवा कंपनियों ने साल 2015-16 में कुल 21 हजार 216 करोड़ रुपये का बल्क ड्रग आयात किया था जिसमें से चीन से 13 हजार 853 करोड़ रुपयों का अर्थात 65.29 फीसदी आयात किया गया था.

खबरों के अऩुसार चीन पर दवाओं के लिए भारत की निर्भरता पर नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजऱ ने भी आगाह किया था. उसके बाद केन्द्र सरकार ने कटोच कमेटी का गठन भी किया. जिसने अपनी अनुशंसा में कहा कि देश में बल्क ड्रग के निर्माण को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए निर्माताओं को टैक्स सहित कई रियायतें दी जाए. उसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. सबसे दुख की बात यह है कि पिछले कई दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां सरकारी नीतियों के कारण बीमार हो गई है. इस दौरान कांग्रेस के अलावा जनता पार्टी, एनडीए, यूपीए की सरकारें भी सत्ता में रही हैं लेकिन किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि देश का आत्मनिर्भर दवा उद्योग, विदेशों पर निर्भर होता जा रहा है. यदि सरकारी दवा कंपनियां मजबूत होती तो देश को चीन का मुंह नहीं ताकना पड़ता.

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि साल 2015-16 में भारतीय दवा बाज़ार 1.85 लाख करोड़ रुपयों का था जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां जैसे आईडीपीएल, एचएएल, कर्नाटक एंटीबायोटिक, राजस्थान ड्रग एंड फार्मास्युटिकल्स और बेंगाल केमिकल का कुल टर्न ओवर मात्र 550 करोड़ 96 लाख रुपये का था.
जाहिर है कि सरकारी दवा कंपनियां की हालत इतनी पतली कर दी गई हैं कि वे देश की आवश्यकता के अऩुसार दवाओं का भी निर्माण करने में सक्षम नहीं है. दूसरी तरफ, मुनाफाखोरी की आस में निजी दवा कंपनियों ने देश को चीन पर निर्भर बना दिया है.

हमारे देश में चीन आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और दूसरे सामान का आयात बंद हो जाने से कोई संकट में नहीं पड़ने वाला है लेकिन यदि दवाओं के उत्पादन और उऩकी सहज उपलब्धता पर असर पड़ने से देशवासियों के हौसले पर नकारात्मक असर जरूर पड़ने जा रहा है. चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा देकर उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले शायद दवा बाजार की इस अंदरूनी हालात से वाकिफ नहीं होंगे.

दवाओं के लिए भारत की चीन पर अत्यधिक निर्भरता से साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुंआ’ याद आता है. उस कहानी में जब गांव के गरीब-पिछड़े ठाकुर के खेतों में काम करने से इंकार कर देते है तब बदला लेने के लिए ठाकुर उनके कुएं में मरे हुए जानवर फेंकवा देता है. फलस्वरूप गांव के लोग पीने के पानी के लिए ठाकुर के कुएं का मुंह ताकने लगते हैं. दूसरी तरफ ठाकुर अपने खेतों पर पहरे बैठा देता है. कहने का तात्पर्य यह है कि कहीं चीन ‘ठाकुर’ न बन बैठे. इसके लिए समय रहते देश को जीवन रक्षक और आवश्यक दवाओं के बल्क ड्रग के उत्पादन के मामलें में आत्मनिर्भर होने की जरूरत है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)