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आयकर में राहत से भी मंदी तुरंत नहीं जाने वाली

retail inflation rate increased to 3.99 percent

 

कॉरपोरेट टैक्स रेट में कटौती के बाद व्यक्तिगत आयकर में छूट की मांग जोर पकड़ने लगी है. इसके पीछे औचित्य यह है कि अर्थव्यवस्था में वास्तविक संकट उपभोक्ता मांग में कमी का है. विलासिता पर खर्च तो दूर की बात है लोग अपनी जरुरत की चीजों पर भी खर्च नहीं कर रहे हैं. इसलिए जरूरी है कि लोगो के हाथ में पैसा छोड़ा जाए तो वो महंगे उत्पाद भले ना खरीदें लेकन दैनिक उपयोग का सामान तो खरीदेंगे

इसके अलावा सरकार राजनीतिक दबाव भी महसूस कर रही है क्योंकि आर्थिक मंदी की असली मार आम आदमी झेल रहा है, जो कि उसका वोटर भी है लेकिन राहत उसने कॉरपोरेट सेक्टर को दी है जिसकी छवि आर्थिक घोटालों और बैंकों का उधार डकार लेने के मामलों की वजह से डांवाडोल है. कांग्रेस निरंतर प्रहार कर रही है कि सरकार ने कॉरपोरेट जगत को 1.45 लाख करोड़ का तोहफा दिया है, जबकि परेशानी में किसान और आम उपभोक्ता है. एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कॉरपोरेट मित्रों को फायदा पहुंचाने और उनकी सरकार के सूट-बूट की सरकार होने का आरोप लग रहा है.

हालांकि, सामान्य करदाता को राहत की उम्मीद तो बजट में भी की जा रही थी लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंतरिम बजट में आयकर छूट की सीमा 5 लाख को बरकरार रखने के अलावा कुछ नहीं किया. अब जब कॉरपोरेट सेक्टर भी कहने लगा है कि मांग बढ़ने के उपाय के रूप में आम करदाता को रहत देकर उसके हाथ में पैसा छोड़ने की जरुरत है, तो इस बात की सम्भावना बढ़ गई है. हाल में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने ऐसा संकेत दिया. उनका कहना था कि सरकार में इस पर चर्चा और विचार हो रहा है.

दरअसल, कॉरपोरेट टैक्स रेट कट के बनिस्बत ये तर्कसंगत भी है क्योंकि कॉरपोरेट टैक्स में कटौती का दीर्घकाल में कोई लाभ भले हो लेकिन अर्थव्यवस्था को ICU से बाहर लाने के लिए जिस बूस्टर डोज की जरुरत है, उसके लिए ये उपाय उपयुक्त नहीं है. अगर ये मान भी लिया जाए कि उद्योग जगत कॉरपोरेट टैक्स कटौती और कम टैक्स दरों से होने वाली बचत पर कुंडली मार कर बैठने के बजाय नया निवेश करेगा तब भी उसका फायदा मिलने में 3-4 साल लग सकते हैं. मंजूरी मिलने से लेकर नया संयत्र स्थापित करने में 3 से 4 साल का समय लगना मामूली बात है.

ऐसे में अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के त्वरित उपाय के तौर पर यही उचित लगता है कि आम व्यक्ति के हाथ में पैसा छोड़ा जाए तो उसका जल्दी लाभ मिलने लगेगा. सरकार के लिए ये उपाय दोनों हाथों में लड्डू होने जैसा है. इसकी मुख्य वजह है कि कॉरपोरेट टैक्स में कमी के विपरीत व्यक्तिगत आयकर में छूट की भरपाई सरकार GST राजस्व में होने वाली बढ़ोतरी से कर लेगी साथ ही इस समय जो व्यक्ति जेब में हाथ डाल के बैठा है वो कम से कम खाने-पीने की वस्तुएं और तेल, साबुन, शैम्पू अथवा इनरवेअर आदि जरुरत के सामान तो खरीदने लगेगा.

मुश्किल ये है कि अगर आम आदमी की कमाई पर टैक्स कमी तुरंत प्रभाव से लागू की जाए तो इसका असर भी कम से कम डेढ़ या दो साल में जाकर देखने को मिलेगा. यदि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने व्यक्तिगत आयकर में कमी का फैसला जुलाई में ही ले लिया होता तो आने वाली छमाही में ही अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिल जाते. अब तक तो सिर्फ विचार चल रहा है फैसला ना जाने कब तक होगा.

जबकि आम भारतीय के मानस को समझने वाला बता सकता है कि उसकी सबसे बड़ी खरीददारी तीज त्यौहार के समय होती है. राखी और और गणेश उत्सव निकल गए. दीपावली में महज बीस दिन बचे हैं और विवाह के लिए खरीददारी की प्लानिंग काफी पहले हो जाती है. अब भारतीय मिडिल क्लास अपने बच्चों के स्कूल और कॉलेज के एडमिशन के लिए प्लानिंग में जुटेगी, जिसकी प्रक्रिया दिसंबर से शुरू हो जाएगी. ऐसे में फ्रिज, टीवी, मोबाइल, कार, स्कूटर या वाशिंग मशीन जैसे महंगे उपभोक्ता सामान का नंबर अगली दीपावली तक टलने की आशंका है.

दैनिक उपभोग की वस्तुओं की खरीद तुरंत बढ़ेगी लेकिन दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है की तर्ज पर ये कंपनियां भी अपनी क्षमता बढ़ाने का फैसला लेने से पहले एक से दो तिमाही के नतीजों का इंतजार करेंगी और बाजार में खरीददारी लौटने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही निवेश बढ़ाएंगी.

इस लिहाज से केंद्र सरकार ये मौका चूक गई है. आश्चर्य है कि भारतीयता को समझने और साधारण वर्ग से होने का दावा करने वाले सरकार में बैठे लोगों ने इस आम भारतीय प्रवृत्ति को कैसे नजरअंदाज कर दिया!