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विकास को तरसता जन-स्वास्थ्य

विकास के दावों के बीच सच्चाई है कि स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के रहमों करम पर छोड़ दिया गया है.

 

सबका साथ सबका विकास, के नारे के साथ ‘विकासवादी’ सरकार के सत्तारूढ़ होने के चार साल बाद भी भारत में जन-स्वास्थ्य की अवहेलना जारी है. स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में बढ़ोतरी नहीं की जा रही है जिसके कारण सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों और बिस्तरों की संख्या सीमित है. हारकर मरीजों को निजी क्षेत्र के चिकित्सकों तथा चिकित्सा संस्थाओं की शरण में जाना पड़ता है.

हाल ही में जिस आयुष्मान भारत स्कीम की घोषणा की गई है उसका सारा दारोमदार निजी क्षेत्र के चिकित्सकों तथा चिकित्सा संस्थाओं पर आधारित है. जाहिर है कि इस तरह से जनता के टैक्स के पैसों को निजी क्षेत्र में प्रवाहित किया जाएगा. खुद केन्द्र सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पादन के 1.02 फ़ीसदी मात्र का ही हो रहा है.

दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अऩुसार भारत दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देशों की तुलना में इस मामलें में काफी पिछड़ा हुआ है. साल 2015 के आकड़ों के अनुसार मालद्वीप सरकार ने स्वास्थ्य पर 9.4%, थाईलैंड ने 2.9%, भूटान ने 2.5%, तिमोर-लेस्टे ने 1.9%, श्रीलंका ने 1.6% तथा इंडोनेशिया, म्यंमार एवं नेपाल ने 1.1% खर्च किया हैं. भारत ने 1% खर्च किया है.

भारत से कम खर्च स्वास्थ्य पर केवल बांग्लादेश करता है. साल 2015-16 में केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने मिलकर 1 लाख 40 हजार 54 करोड़ रुपये खर्च किए. अर्थात् प्रति व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए 1112 रुपये केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा खर्च किए गए. जो कि साल 2009-10 के 621 रुपये की तुलना में दुगने के करीब है. इसके बाद 2017-18 के बजट अनुमान के अनुसार यह खर्च 1657 रुपयों का होगा. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन प्रति व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र में 16,956 और शहरी क्षेत्र में 26,455 रुपये खर्च करने पड़े.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य करने वाले जानकारों का मानना है कि भारत जैसे देश में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च उसके सकल घरेलू उत्पादन के 3 फीसदी के करीब होनी चाहिए. यदि ऐसा कर दिया जाता तो यह खर्च बढ़कर 4 लाख करोड़ रुपये के आसपास का हो जाता.

विश्व-स्वास्थ्य-संगठन के अनुसार साल 2015 में दक्षिण-पूर्व एशिया के अलावा भी दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च काफी कम किया गया है. स्वीडन सरकार ने स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पादन का 9.2%, फ्रांस में 8.7%, डेनमार्क में 8.7%, बेल्जियम में 8.6%, स्विटजरलैंड में 8.5%, नार्वे में 8.5%, अमरीका में 8.5%, इग्लैंड में 7.9%, आस्ट्रेलिया में 7.8%, कनाडा में 7.7%, आइसलैंड में 7%, इटली में 6.7% तथा सिंगापुर में 2.2% किया.

कुछ और आकड़ें हैं जो विकास के दावों की सच्चाई बयां करते हैं. स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में बढ़ोतरी न किए जाने का नतीजा है कि देश के सरकारी अस्पतालों में एलोपैथिक के कुल चिकित्सकों की संख्या 1 लाख 14 हजार 9 सौ 69 मात्र है. इस कारण से औसतन 11 हजार 82 की आबादी के लिए 1 सरकारी एलोपैथिक चिकित्सक उपलब्ध है. इसी तरह से 1 लाख 76 हजार 4 की आबादी के लिए 1 सरकारी डेंटल सर्जन उपलब्ध है. इसी तरह से औसतन प्रति 55 हजार 5 सौ 91 की आबादी के लिए 1 सरकारी अस्पताल उपलब्ध है. जहां तक अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता की बात है तो 1 हजार 8 सौ 44 की आबादी के लिए सरकारी अस्पताल में 1 बिस्तर उपलब्ध है.

केन्द्र सरकार द्वारा जारी दस्तावेज के आधार पर कहा जाना चाहिए कि भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में यूपीए सरकार के कार्यकाल के समय किए जा रहे खर्च के आसपास ही खर्च हो रहा है. हालांकि यूपीए सरकार ने दावा किया था कि वह स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को 2.5 से 3 फ़ीसदी तक ले जाएगी लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अब तो यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार भी उसी राह पर चल रही है. फिर विकास का दावा किस आधार पर किया जा रहा है. खुद सरकारी आकड़े गवाह हैं कि जनस्वास्थ्य पर खर्चे को नहीं बढ़ाया गया है ऐसे में विकास कैसे होगा. जबकि लोक कल्याणकारी सरकार की अवधारणा ही है कि वह स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर ज्यादा खर्च करें लेकिन इसका उल्टा हो रहा है.

यहां पर भोरे समिति की प्रमुख अनुशंसा का उल्लेख करना गलत न होगा. ब्रिटिश इंडिया में सर जोसेफ भोरे की अध्यक्षता में स्वास्थ्य पर एक समिति का गठन किया गया था. उस समिति ने परतंत्र भारत में 1946 में अपनी अनुशंसाएं सौंपी थी. जिसमें सबसे पहले ही कहा गया था कि भुगतान करने में असमर्थ न होने के बावजूद भी किसी को स्वास्थ्य सेवा पाने से मरहूम न होना पड़े. स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त होनी चाहिए.

हमारे देश में मरीज कोई वोट बैंक नहीं होता है इसलिए उसकी नहीं सुनी जाती है. सुनी जाती है भाषा, धर्म, प्रांतीयता, समाज, जाति और संप्रदाय के आधार पर बंटी जनता का. आज तक किसी भी चुनाव में स्वास्थ्य का मुद्दा कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है. इसलिए दोष केवल राजनीतिक पार्टियों का नहीं खुद जनता (वोटरों) का भी है. वोट करते समय यह नहीं देखा जाता कि जिसे वोट दिया जा रहा है वह जीतने के बाद कौन सी नीतियां लागू करेगा या करवाएगा.