झारखंड: चौदह सीटें और मोदी के चार दौरे

in jharkhand emotional appeal decimated powerful opposition leaders

 

झारखंड में रविवार यानी 12 मई को चार संसदीय सीटों के लिए चुनाव है. मैं धनबाद जिले के धनबाद संसदीय क्षेत्र के पूर्वी टुंडी प्रखंड के उस ग्रामीण इलाके में हूं, जहां कच्ची सड़क की दूसरी ओर गिरिडीह संसदीय क्षेत्र है. लेकिन जिला धनबाद ही है. यह पूरा इलाका ऐतिहासिक इस मामले में है कि यहां से कुछ दूरी पर ही पोखरिया आश्रम है, जहां से सत्तर के दशक में दिशम गुरू और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के सुप्रीमो शिबू सोरेन की अगुआई में झारखंड राज्य के लिए आंदोलन का शंखनाद किया गया था.

पास की बस्ती के युवा रमेश किस्कू अपने दोस्तों के साथ मिले तो मैंने उन्हें रोका और चुनावी चर्चा शुरू की. वे और उनके साथी राजनीतिक रूप से जागरूक थे. छूटते ही कहने लगे – “मोदी जरूरी है, पीएन सिंह मजबूरी हैं.” मोदी क्यों जरूरी हैं? ऐसा लगा कि उनके पास मेरे इस सवालों का जबाव पहले से तैयार था. कहने लगे – “हमारे बाप दादा रोटी कपड़ा और मकान की चिंता करते हुए दुनिया से गुजर गए. लेकिन मोदी राज में गांव-गांव में पक्के का मकान और शौचालय बन गया. राशन दुकानों से एक रूपए किलो चावल मिल रहा है. इलाज के लिए कार्ड बन गया है. आतंकवादी मारे जा रहे हैं. अगले पांच साल में देश का और विकास होगा.”

लेकिन मैं जैसे ही गिरिडीह संसदीय क्षेत्र वाले हिस्से में थोड़ा अंदर तक गया, नजारा बदला हुआ था. लोग एक दूसरे का अभिवादन जय जगन्नाथ कहकर कर रहे थे. घरों पर जेएमएम के झंडे ज्यादा थे. मैंने कुंए पर स्नान करने आए एक सज्जन से पूछा – किस पार्टी का जोर है? मेरी ओर देखे बिना उत्तर था,“कोई जीते, हमें क्या?” इतने निराश क्यों हैं? मेरे इस सवाल पर कहने लगे – “निराश नहीं रहेंगे? हर चुनाव में बीजेपी जीतती है. पांडेय जी (रवींद्र पांडेय) चुनाव के समय ही दिखाई देते हैं. इस बार तो आए भी नहीं. गांव में न बिजली है, न पानी. एक स्कूल था, उसको भी सरकार ने बंद कर दिया. आठ साल पहले एक डिस्पेंसरी खुली थी. कुछ दिनों बाद से ही डाक्टर गायब हो गए. अब वहां एक स्टाफ आता है, जिसको इलाज करना नहीं आता है.”

उनकी बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि कई लोग और इकट्ठे हो गए. उनमें से एक ने पूछा, “आप किस पार्टी से हैं?” मैंने कहा कि पत्रकार हूं. इस पर थोड़े पढ़े-लिखे युवक का उत्तर था, “गर्मी में कहां मर रहे हैं. जाइए, नेता लोग से बात करके लिख दीजिए. आप छापिएगा तो वही जो नेता लोग बोलेंगे.” मैंने बीच में रोका और बात बदलकर राजनीतिक मिजाज जानने की कोशिश की. लोगों के मिजाज से साफ था कि वे बीजेपी से बेहद नाराज हैं और बदलाव चाहते हैं.

मैं इस बात से हैरान-परेशान रह गया कि पांच किलोमीटर के भीतर एक इलाके में लोगों के लिए मोदी जरूरी थे तो दूसरे इलाके में मोदी और उनके प्रत्याशी नहीं, बल्कि नए प्रत्याशी जरूरी थे. मैं अपनी गाड़ी से आगे बढ़ गया. चाय की दुकान के पास एक सज्जन बाइक से कहीं जाने को तैयार थे. मैंने उन्हें रोका और चुनावी मूड जानने की कोशिश की. मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है कि पूर्वी टुंडी प्रखंड में मोदी जरूरी हैं तो पश्चिमी टुंडी में इसके उलट बात हो रही है? बातचीत से पता चला कि वह सज्जन आरएसएस से जुड़े हुए थे. कहने लगे, “मोदी जी को सत्ता बीजेपी के कारण नहीं, आरएसएस के कारण मिलेगी. जहां-जहां आरएसएस का जोर है, वहां के लोग राष्ट्रवाद ठीक से समझने लगे हैं. ऐसे लोग मोदी जी को पसंद कर रहे हैं. परन्तु जहां आरएसएस का काम कमजोर है, वहां के लोग छोटी-छोटी बातों में उलझे हुए हैं और किसी को भी वोट देने को तैयार हैं.” क्यों बीजेपी का अपना भी तो आधार है? सज्जन कहने लगे, “बीजेपी के लोग ठेका-पट्टा में उलझ गए हैं. उन्हें बाकी बातों से मतलब नहीं. न नेता को और न कार्यकर्त्ता को. यहीं कई लोग हैं. पूछ लीजिए, कितने लोग अपने सांसद का नाम जानते होंगे.”

खैर, मैं आगे बढ़ गया. मैंने बीजेपी के धन-बल का असर हर जगह देखा. प्रचार के मामले में बीजेपी के आसपास भी दूसरे दल नहीं थे. समस्याएं एक जैसी दिखीं हर जगह. केवल लोगों के सुर राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से बदले हुए थे. यह चुनाव शुरू में बीजेपी के लिए जितना आसान दिख रहा था, क्षेत्रवार दौरे के बाद साफ हुआ कि ऐसा कुछ भी नहीं है. शहरी इलाकों को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर जहां-जहां विपक्ष विखरा हुआ है, वहीं बीजेपी को आशा की किरणें दिख रही हैं.

शायद यही वजह है कि चौदह लोकसभा क्षेत्रों वाले छोटे से आदिवासी बहुल झारखंड राज्य में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने दल के चुनाव प्रचार के लिए पूरी ताकत झोंकनी पड़ी है. राज्य में चार चरणों में चुनाव हो रहा है. मोदी का कार्यक्रम इस तरह बना हुआ है कि वह हर चरण के चुनाव से पहले झारखंड में होते हैं. यानी हर तीन-चार सीटों के लिए उनका दौरा. वह रांची में रोड शो भी कर चुके हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित अनेक स्टार प्रचारकों की ताकत लगी हुई है सो अलग. साफ है कि भाषणों में भले मोदी लहर के दावे किए जा रहे हैं. लेकिन हकीकत कुछ और है.

राज्य की बारह सीटें बीजेपी के पास हैं और दो सीटें झारखंड मुक्ति मोर्च (जेएमएम) के पास हैं. बीजेपी का दावा है कि पूरे राज्य में मोदी लहर है. मतदाता हर हाल में दिल्ली की गद्दी पर मोदी को देखना चाहते हैं. ताकि भारत मजबूत रहे और पूरे दुनिया में उसकी धाक रहे. इसलिए उनकी नजर ना तो प्रत्याशियों पर है और ना ही वे स्थानीय मुद्दों को महत्व दे रहे हैं. लेकिन क्षेत्रवार राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बीजेपी को छठे चरण के चुनाव में दो सीटों धनबाद और जमशेदपुर में थोड़ी राहत है. लेकिन सिंहभूम और गिरिडीह में विपक्षी गठबंधन के प्रत्याशियों के चक्रव्यूह को भेदना बीजेपी के लिए आसान नहीं है.

चौथे और पांचवें चरणों में झारखंड की सात सीटों के लिए चुनाव हो चुका है. अब छठे चरण में कोल्हान क्षेत्र की दो सीटों जमशेदपुर व सिंहभूम और उत्तरी छोटानागपुर की दो सीटों धनबाद व गिरिडीह में 12 मई को चुनाव होना है. जमशेदपुर में “मोदी जरूरी, प्रत्याशी मजबूरी” के नारे लग रहे हैं तो बगल की सीट सिंहभूम में विपक्षी गठबंधन से कांग्रेस की प्रत्याशी गीता कोड़ा के जयकारे लग रहे हैं. वही हाल उत्तरी छोटानागपुर में है. धनबाद में “मोदी जरूरी, प्रत्याशी मजबूरी” की बात करने वाले हर तरफ मिल जा रहे हैं. दूसरी तरफ बगल के गिरिडीह संसदीय क्षेत्र में “जय जगन्नाथ” का नारा जगह-जगह सुनाई दे रहा है. विधायक जगन्नाथ महतो विपक्षी गठबंधन से झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के प्रत्याशी हैं. मतलब साफ है कि जहां जिस दल का राजनीतिक गणित पक्ष में है, वहां उसके जयकारे लग रहे हैं. किसी के पक्ष में कोई लहर नहीं है. तभी एक शहर में मोदी जरूरी हैं तो बगल के शहर में विपक्ष के प्रत्याशी जरूरी हैं.

झारखंड में बीजेपी का एक ही चेहरा है. वह हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. स्टार प्रचारकों से लेकर प्रत्याशी तक मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं. वे मतदाताओं से कहते हैं, “आप अपने प्रत्याशी को वोट देंगे तो वह सीधे मोदी जी को मिलेगा.” मुख्यमंत्री रघुवर दास तो यहां तक कह चुके हैं, “न मुझे देखें, न प्रत्याशी को. मोदी जी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दें.” दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के नेता और प्रत्याशी बेरोजगारी, जल जंगल और जमीन जैसे स्थानीय मुद्दों और बीजेपी के निवर्तमान सांसदों की कथित विफलताओं पर फोकस बनाए हुए हैं. निशाने पर प्रधानमंत्री भी हैं. मतदाताओं को बार-बार याद दिलाया जा रहा है कि मोदी जी ने पिछले चुनाव में कौन-कौन से लोकप्रिय वायदे किए थे, जिन्हें पूरा नहीं किया गया.

बीजेपी के विपरीत विपक्षी गठबंधन में स्टार प्रचारकों का टोटा है. पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी का एक बार झारखंड दौरा हुआ. गुलामनबी आजाद आए और शत्रुध्न सिन्हा की सभा हुई. जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं, “विपक्ष किसी स्टार प्रचारक के भरोसे चुनाव नहीं लड़ रहा है. सभी प्रत्याशी जनता के बीच के हैं, वे अपने जन सरोकारों की बदौलत जनता की नजरों में किसी स्टार से कम नहीं हैं.”

सच कहा जाए तो राज्य में बीजेपी की असल लड़ाई अब शुरू हुई है. जेएमएम राज्य की इकलौती व्यापक जनाधार वाली पार्टी है. बीते चुनाव में मोदी लहर के बावजूद संथालपरगना की दुमका और राजमहल सीटें जेएमएम के खाते में चली गई थीं. दूसरी तरफ 81 विधानसभा सीटों में से 19 सीटों पर जेएमएम का कब्जा है. छठे और अंतिम चरण के चुनाव में बीजेपी गठबंधन का जेएमएम के साथ चार सीटों पर सीधा मुकाबला है. जमशेदपुर में बीजेपी के प्रत्याशी व निवर्तमान सांसद विद्युत वरण महतो का सीधा मुकाबला विपक्षी महागठबंधन से जेएमएम के प्रत्याशी चंपई सोरेन से है. दूसरी तरफ दुमका में तीन बार हार का रिकार्ड बनाने वाले बीजेपी के प्रत्याशी सुनील सोरेन फिर जेएमएम के सुप्रीमो और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन के सामने हैं. राजमहल में विपक्षी महागठबंधन के प्रत्याशी विजय हांसदा के साथ दो-दो हाथ करने के लिए एक बार फिर बीजेपी के हेमलाल मुर्मू मैदान में हैं. पिछले चुनाव में विजय हांसदा ने ही उन्हें पराजित किया था. गिरिडीह में एनडीए से आजसू के प्रत्याशी चंद्रप्रकाश चौधरी का मुकाबला महतो जाति के कद्दावर नेता और विधायक जगन्नाथ महतो से है.

सत्ता पक्ष के राज्यस्तरीय नेताओं की बात करें तो मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बीजेपी के पुराने रिकार्ड को कायम रखने के लिए जान लगा दी है. वह अनेक संसदीय क्षेत्रों में चार से पांच बार तक दौरा कर चुके हैं. अब उनकी नजर संथालपरगना के चुनावों पर है. वह हर हाल में जेएमएम की सीटें बीजेपी के खाते में डलवाने के लिए प्रयासरत हैं. राज्य में ऐसी धारणा बनी हुई है कि बीजेपी के निवर्तमान सांसदों के साथ ही राज्य सरकार से लोग नाराज हैं और लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनावों में भी सत्ता पक्ष को इसका खामियाजा भुगतना होगा. रघुवर दास इस धारणा को तोड़ने के लिए जुगत भिड़ा रहे हैं.

वैसे शह-मात का खेल भी साथ-साथ चल रहा है. खूंटी संसदीय क्षेत्र में पांचवें चरण में हुए चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री रघुवर दास और पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रत्याशी अर्जुन मुंडा के बीच का शीतयुद्ध साफ-साफ दिखा. तो छठे चरण के तहत जमशेदपुर में होने वाले चुनाव में साफ दिख रहा है कि जेएमएम के प्रत्याशी चंपई सोरेन को कांग्रेस का खुलकर साथ नहीं मिल रहा है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और जमशेदपुर के पूर्व सांसद डॉ. अजय कुमार ने सोरेन के पक्ष में एक भी आम सभा नहीं की है. उसी तरह बगल की सिंहभूम सीट पर कांग्रेस की प्रत्य़ाशी गीता कोड़ा को जेएमएम के नेता मजबूती प्रदान नहीं कर पा रहे हैं. जबकि इस संसदीय क्षेत्र के छह विधानसभा सीटों में से पांच पर जेएमएम का कब्जा है. यह हाई प्रोफाइल सीट इस मायने में है कि एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी और विधायक गीता कोड़ा हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और निवर्तमान सांसद लक्ष्मण गिलुआ की प्रतिष्ठा दांव पर है.

धनबाद संसदीय क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हाल है. महागठबंधन से कांग्रेस के प्रत्याशी कीर्ति झा आजाद को पूर्व सांसद एके राय की पार्टी एमसीसी का साथ तो मिल रहा है. लेकिन जेएमएम और बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के नेता पूरे चुनाव प्रचार में रस्मी तौर पर ही साथ दिख रहे हैं. हद तो यह है कि चुनाव प्रचार खत्म होने से एक दिन पहले जेवीएम के नेताओं ने बैठक करके आजाद को जिताने के लिए गली-गली में प्रचार करने फैसला किया और उसे स्थानीय अखबारों में प्रकाशित करवाया. राहुल गांधी का रोड शो हो या शत्रुध्न सिन्हा की सभा, जेएमएम और जेवीएम के बड़े नेता कहीं नजर नहीं आए. गिरिडीह संसदीय क्षेत्र इसका अपवाद जरूर है, जहां जेवीएम और कांग्रेस के स्थानीय नेता जेएमएम के प्रत्याशी जगन्नाथ महतो के समर्थन चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं.


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