संविधान बचाने की चुनौती

संपादकीय | November 25, 2018

 

26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को बनाने का काम पूरा हुआ था. इस लिहाज से आधुनिक भारत के इतिहास में बेशक यह दिन खास महत्त्व का है. लेकिन इस दिन को अलग से मनाने की कोई परिपाटी नहीं बनी. कारण यह था कि संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और उस रोज को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.

तीन साल पहले वर्तमान केंद्र सरकार ने इस दिन को अलग से मनाने की पहल की. इसी पहल के हिस्से के तौर पर 2015 में इस दिन संसद की विशेष बैठक आयोजित की गई.

इस पहल के पीछे सियासी मकसद तलाशे जा सकते हैं. दशकों तक नजरअंदाज करने के बाद पिछले कुछ वर्षों में अपने राजनीतिक दलों ने डॉक्टर अबेंडकर की “तलाश” की है. इसके पीछे भी सियासी मकसद तलाशे जा सकते हैं. बहरहाल, इस घटनाक्रम का भी 26 नवंबर को अलग से ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाने की हुई पहल के पीछे एक खास योगदान है. इस पहल के पीछे मकसद भारतीय संविधान और उसके उसूलों के प्रति खुद को संकल्प-बद्ध करने की भावना है, या यह खुद को डॉक्टर अंबेडकर का अनुयायी बताकर चुनावी लाभ उठाने की जुगत है, इस बारे में सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं.

मगर बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें, तो कहा जा सकता है कि संविधान दिवस मनाने की परिपाटी सटीक मौके पर शुरू हुई है. गौरतलब है कि इस वर्ष केंद्र सरकार (और बीजेपी) की विरोधी शक्तियां इस मौके पर अधिक सक्रिय हुई हैं. अलग-अलग संगठनों ने ‘संविधान बचाओ दिवस’ मनाने का इरादा जताया है. जनमत के एक बड़े हिस्से में ऐसे अभियानों के लिए समर्थन का भाव देखने को भी मिला है.

लेकिन आखिर संविधान बचाने का आह्वान करने की जरूरत क्यों महसूस की गई है? दिल्ली में इस मौके पर विरोध मार्च निकाल रहे वकीलों की संस्था लॉयर्स फॉर डेमोक्रेसी ने इसका कारण बताते हुए कहा है, “पिछले साढ़े चार साल में संविधान की भावना को बार-बार अपमानित और जख्मी किया गया है.”

इस बात से सहमत होना या ना होना अलग-अलग लोगों की अपनी राजनीतिक समझ और विचारधारा पर निर्भर है. मगर जब कई समूह संविधान की भावना की रक्षा के लिए मुहिम चलाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं, तब यह उचित होगा कि संविधान के बुनियादी ढांचे और उसकी प्रेरक भावना पर सघन एवं व्यापक चर्चा छेड़ी जाए.

सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याओं पर गौर करें, तो लोकतंत्र, नागरिकों के मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संघीय व्यवस्था (फेडरलिज्म) और न्यायिक स्वतंत्रता भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं. प्रश्न विचारणीय है कि इन सभी मूल्यों या व्यवस्थाओं को लेकर आज विवाद क्यों उठ खड़े हुए हैं? जिस आधुनिक भारत की संकल्पना संविधान में की गई, आज उसके भविष्य को लेकर लोग आश्वस्त क्यों नहीं हैं? स्वाभाविक है कि इन सवालों के घेरे में मौजूदा सत्ताधारी दल खड़ा है.

26 नवंबर 1949 संविधान सभा की अंतिम बैठक में प्रारूपण समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अबंडेकर ने चेतावनी दी थी कि नए संविधान के साथ भारत अंतर्विरोधों के दौर में प्रवेश कर रहा है. एक पुरातन और मूल रूप से अलोकतांत्रिक समाज में एक आधुनिक- लोकतांत्रिक संविधान को सफल करने के रास्ते में मौजूद चुनौतियों के बारे में डॉक्टर अंबेडकर ने आगाह किया था.

साफ है कि संविधान के प्रति खुद को प्रतिबद्ध बताने वाले राजनीतिक दलों के साथ-साथ देश के प्रबुद्ध जनमत ने भी उन चेतावनियों को उचित गंभीरता से नहीं लिया. नतीजा है कि आज “संविधान बचाओ” जैसी आवाजें सुनाई पड़ रही हैं. लेकिन अहम सवाल है कि क्या इससे सचमुच संविधान के मूल्यों के संरक्षण और उन्हें आगे बढ़ाने का ईमानदार जन-संकल्प अब पैदा होगा?


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