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अब मेक-अप धुल गया है

gdp growth rate slips to five year lowest

 

संदेह पहले से था. अब यह बेहद गहरा गया है. इसका संभावित नतीजा अति हानिकारक हो सकता है. किसी देश के आर्थिक आंकड़े अगर संदिग्ध हो जाएं, तो उस देश का आर्थिक वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ने की आशंका पैदा हो जाती है. यह अंदेशा इस वक्त जितना भारत को लेकर है, उतना शायद ही किसी अन्य लोकतांत्रिक या विकसित देश के बारे में हो.

और ऐसा नरेंद्र मोदी सरकार के दुस्साहसी नजरिए और गुमराह कदमों की वजह से हुआ है. यह लगातार साफ होता जा रहा है कि पूर्व यूपीए सरकार से अपना प्रदर्शन बेहतर दिखाने की चाह में मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था से बहुत खतरनाक खिलवाड़ किया है.

कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए थे. उसके पहले भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने शक जताया था कि भारत की अर्थव्यवस्था सात फीसदी की दर से विकसित हो रही है.

राजन ने कहा था कि जब पर्याप्त संख्या में रोजगार पैदा नहीं हो रहे, तो इतनी ऊंची जीडीपी दर पर यकीन करना मुश्किल है. दरअसल, हाल में तमाम आर्थिक संकेतक नकारात्मक रहे हैं. इस हकीकत के मद्देनजर जानकारों को स्वाभाविक रूप से भारत की उच्च आर्थिक वृद्धि की दर पर शक होता रहा है.

अब राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) के एक अध्ययन से जीडीपी गणना की नई सीरीज की ऐसी खामी उजागर हुई है, जिससे भारतीय जीडीपी से जुड़ी वो तमाम धारणाएं निराधार साबित हो सकती हैं, जिनके आधार पर भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताया जाता रहा है.

एनएसएसओ ने यह अध्ययन जुलाई 2016 से जून 2017 तक किया. उसकी रिपोर्ट पिछले हफ्ते जारी हुई। इस अध्ययन में पाया गया कि  MCA-21 डेटाबेस की 36 फ़ीसदी कंपनियों का कोई अता-पता नहीं है. MCA-21 डेटाबेस की कंपनियां वो हैं, जिनका उपयोग जीडीपी की गणना के लिए किया जाता है. कंपनी मामलों के मंत्रालय ने इन लापता कंपनियों को ‘सक्रिय कंपनी’ की श्रेणी में रखा था. इस श्रेणी में उन कंपनियों को रखा जाता है, जिन्होंने गुजरे तीन वर्षों में कम-से-कम एक बार टैक्स चुकाया हो. सवाल यह उठता है कि क्या मंत्रालय ने जानबूझ कर एक निराधार कथा बुनी? क्या संदिग्ध आंकड़ों के आधार पर नई सीरीज में जीडीपी की गणना की जा रही है?

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद 2015 में जीडीपी गणना की नई सीरीज शुरू की थी. इसके तहत गणना का आधार वर्ष बदल दिया गया. साथ ही गणना के तरीकों में भी बदलाव किए गए. इस सीरीज में अचानक जीडीपी वृद्धि की दर में भारी बढ़ोतरी नज़र आने लगी. इस सीरीज पर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने भी अपनी मुहर लगा दी थी. अब अगर सीएसओ पर भी सवाल उठ रहे हैं, तो यह वाजिब ही है. भारत के सीएसओ की कभी दुनिया भर में ऊंची प्रतिष्ठा थी. आजादी के बाद तब के नेतृत्व ने बड़ी मेहनत से इसे बनाया और इसकी साख बनाई थी. इसके मद्देनजर हाल में इसका जो आचरण रहा है, वह अफसोसनाक है.

एनएसएसओ के अध्ययन से शक उठा है कि फर्जी कंपनियों को MCA-21 डेटाबेस में शामिल किया गया. सीएसओ ने इसे अपनी मान्यता दी, यह हैरतअंगेज है. अब ये सारा मामला वैश्विक स्तर पर चर्चित हो सकता है, जहां से पहले भारतीय आर्थिक आंकड़े सवालों के घेरे में थे. अगर ये धारणा गहरा गई कि भारत के जीडीपी वृद्धि दर के आंकड़े वास्तविक नहीं, बल्कि बनावटी हैं, तो इससे देश, इसकी अर्थव्यवस्था और हमारे संस्थानों की साख पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है. इसका खराब असर हमारे अंतरराष्ट्रीय कारोबार और हमारी खुशहाली पर पड़ सकता है.

इसलिए यह वक्त सरकार के जागने का है. उसे कम-से-कम अब पूरी पारदर्शिता का परिचय देना चाहिए. उसे MCA-21 डेटाबेस को अविलंब जारी कर देना चाहिए. उस स्थिति में स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता और आम लोग भी खुद उसकी जांच-परख कर सकेंगे. अब जो हालात पैदा हो गए हैं, उसके बीच जीडीपी आंकड़ों को लेकर गहरे शक पैदा होते गए हैं. उन्हें दूर करने के लिए आंकड़ों को सार्वजनिक करना अनिवार्य है. अगर ऐसा नहीं किया गया और संदेह की स्थिति बनी रही, तो भारत अपनी आर्थिक उपलब्धियों के चाहे जो दावे कर ले, उन पर कोई यकीन नहीं करेगा. उसका क्या परिणाम होगा, यह खुद जाहिर है.