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स्वच्छ पानी के अधिकार के बावजूद आरओ प्यूरिफायर पर पैसे लुटाने की मजबूरी

Since 1951, per capita water availability has decreased to one-third

 

उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने हाल में एक बयान दिया है कि दिल्ली और बीस अन्य शहरों में पानी की गुणवत्ता पीने के लायक नहीं है, उनके इस बयान ने सभी को सांसत में डाल दिया है और जो व्यवस्था पाने उपलब्ध कराने के लिए बनी उसको लेकर सब आशंकित हैं और उनके भीतर जिज्ञासा के साथ यह चिंता पैदा हो गई है कि आखिर पानी की गुणवत्ता कैसी है.

दिल्ली में बुलाए गए एक संवाददाता सम्मेलन में, पासवान ने कहा कि जांच के लिए पानी के नमूनों को विभिन्न स्थानों से लिया गया था और भारतीय मानक 10500-2012 के अनुसार जांच के लिए आगे भेजा गया था, यह मानक बीआईएस या भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित एक बेंचमार्क की पुष्टि करता है. सैंपल की जांच भौतिक, रासायनिक, विषाक्तता, बैक्टीरियोलॉजिकल और अन्य मापदंडों पर की गई थी. बहुत सारे नमूने इन जाँचों में विफल रहे हैं.

दिल्ली में विभिन्न जगहों से 11 नमूनों को लिया गया था और उनकी जांच 10 मापदंडों के आधार पर की गई थी, जिसमें खनिज सामग्री के उपलब्ध होने से लेकर बैक्टीरिया जैसे दूषित पदार्थ शामिल थे. पानी की गुणवत्ता के मामले में जानकारी देना और पारदर्शिता महत्वपूर्ण है और इसे नागरिकों के लिए आसानी से उपलब्ध होना चाहिए. हालांकि, यह अध्ययन जिस तरीके से किया गया है वह सवाल पैदा करता है: क्या इस जांच का मकसद इन शहरों में पानी की गुणवत्ता को सार्वजनिक रूप से प्रचारित करने के अलाव कुछ और था?

जांच का संदिग्ध तरीका

मुंबई से लिए गए सभी 10 नमूने मानकों पर खरे उतरते हैं. जबकि हैदराबाद, भुवनेश्वर, रांची, अमरावती, और शिमला में एक या उससे अधिक नमूने मानक के हिसाब से खरे नहीं उतरे. 13 राज्यों की राजधानियों, चंडीगढ़, तिरुवनंतपुरम, पटना, भोपाल, गुवाहाटी, बेंगलुरु, गांधीनगर, लखनऊ, जम्मू, जयपुर, देहरादून, चेन्नई और कोलकाता में से कोई भी नमूना भारतीय मानक की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं निकाला है.

फिर, इसमें कोई संदेह नहीं है कि नागरिकों को पीने लायक पानी मिलना चाहिए और यह प्रत्येक शहर में इस तरह की सुविधा प्रदान करने वाली सरकारों/संस्थाओं की जिम्मेदारी है. लेकिन जब हम निष्कर्षों और कार्यप्रणाली पर करीब से नजर डालते हैं तो नीचे वर्णित दो मामलों में इन सभी शहरों में पानी की गुणवत्ता की जांच कैसे की गई है, इस पर संदेह पैदा होता है.

सबसे पहले तो यह जान लें कि देश में पानी की जांच करने के लिए बीआईएस की जिम्मेदारी नहीं है. चूंकि उन्होंने जांच की है, आइए उनके नमूनों के संग्रह और उनकी जांच की पद्धति पर विचार करें. 22 नवंबर को प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया ने दिल्ली में किए गए एक अध्ययन की जाँच में कहा कि नमूनों के संग्रह का तरीका काफी मजेदार या कहे तो बड़ा अजीब था. रिपोर्ट के अनुसार, बीआईएस ने रामविलास पासवान के घर और कार्यालय से नल के पानी के दो नमूने लिए गए थे.

एक अन्य मामले में, मंडोली का एक पता गलत साबित हुआ. विनायत अपार्टमेंट, बुरारी से नमूना कभी लिया ही नहीं गया था. जबकि मुकुंदपुर में भगवानदीन नाम का कोई भी व्यक्ति उल्लेखित पते पर नहीं रहता है. जब भलस्वा से नमूने लिए गए थे, तब कंटेनरों को स्टरलाइज नहीं किया गया था और न ही उन्हें ले जाने से पहले सील किया गया था. इसलिए, दिल्ली में, जांच की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है.

यह निश्चित नहीं है कि नमूनों को इकट्ठा करने के लिए उचित प्रोटोकॉल को अपनाया गया था या नहीं. इसके बाद ही ‘स्वीकृति’ और ‘विफलता’ आती हैं – कहीं भी बीआईएस इस बात का जिक्र नहीं करता है कि परीक्षण का सिद्धान्त या उसका सटीक मानक क्या हैं. जब कोई सिद्धान्त तय नहीं किया गया है, तो उसके बारे में निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है कि वह नमूना पास है या नहीं?

इसके अलावा, एक और अंतर निकाला जाना चाहिए कि क्या पानी के नमूने सामान्य जल उपचार प्रक्रिया से गुजरने से पहले विफल हो गए, और इस उपचार के माध्यम से उनकी स्थिति क्या थी? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यदि पानी के नमूने जल उपचार संयंत्र के मानकों का अनुपालन नहीं करते हैं, तो इसमें बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ेगी. यदि पानी के वितरण के समय नमूने विफल होते हैं, तो किसी भी प्रकार की विषाक्तता से निपटने की रणनीति बिलकुल अलग होगी.

दूसरा शहर जो मापदंडों में विफल रहा है वह शिमला है. बस रिकॉर्ड के लिए बता दें कि 2016 तक यह शहर एक हेपेटाइटिस महामारी की सुर्खियों में रहा था – यह महामारी सिर्फ एक बार नहीं आई, बल्कि कई बार आई और कई लोगों ने इसके संक्रमण के कारण अपनी जान गंवा दी थी. लेकिन 2016 के बाद से शिमला ने किसी भी अन्य शहर के विपरीत न केवल जल वितरण को दुरुस्त किया बल्कि जल का उत्पादन भी लिया. शिमला नगर निगम की सेवा जिसका नाम जीएसडब्ल्यूएसएससी या ग्रेटर शिमला वाटर सप्लाई एंड सीवरेज सर्कल है, जिसका नाम अब शिमला जल निगम लिमिटेड रखा गया है, ने विभिन्न स्रोतों से पानी का उत्पादन शुरू किया था और इसे शहर में पंप कर लोगों को वितरित किया था। कोई अन्य एजेंसी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं रही है.

इसने शिमला शहर को न केवल पानी के दूषित होने की समस्या से छुटकारा दिलाया, बल्कि इसने केवल एक ही एजेंसी को पीने योग्य पानी की आपूर्ति और पानी के उत्पादन की जिम्मेदारी दी. पानी को एक पैरा-स्टैटल सरकारी निकाय द्वारा उत्पादित किया जाता है और मुख्य रूप से शहरी सरकार द्वारा उसका वितरण किया जाता है. यह शिमला है जो अन्य शहरों के विपरीत की कहानी कहता है. दिल्ली में जल वितरण और उत्पादन के लिए दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली छावनी से लेकर एनडीएमसी तक कई एजेंसियां जिम्मेदार हैं.

शिमला में उपरोक्त हस्तक्षेप के बाद हेपेटाइटिस का एक भी मामला रिपोर्ट नहीं हुआ और पानी के स्रोत से नल आपूर्ति को ट्रैक करने के लिए एक संबंधित प्रोटोकॉल स्थापित किया गया है. प्रोटोकॉल के तहत, पानी को दैनिक आधार पर विभिन्न बिंदुओं पर एकत्र किया जाता है और सरकारी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला में उसकी जांच भी की जाती है.

अब तक, इसके परिणाम बहुत ही बढ़िया रहे हैं और कोई असफलता समाने नहीं आई है. जल विभाग के अधिकारियों ने यह भी कहा कि वे इस बात से अनजान हैं कि पानी के नमूने शहर से लिए गए थे. मुद्दा यह है कि पानी की एजेंसी की मदद और हस्तक्षेप के बिना नमूने नहीं लिए जा सकते हैं. नतीजतन, किसी को भी पता नहीं है कि शिमला शहर से ये नमूने कब या कैसे लिए गए थे.

कुछ ऐसे सवाल, जिनके कोई जवाब नहीं हैं

निजी क्षेत्र की जल शोधन लॉबी और बीआईएस के अध्ययन के बीच एक मजबूत संबंध का कोई काल्पनिक आधार नहीं हो सकता है. बहुत से लोग इस तथ्य को जानते हैं कि वाटर प्यूरीफायर बनाने वाली छह कंपनियां बीआईएस की सदस्य हैं. यह आश्चर्य की बात है कि बीआईएस ने पहली बार पानी की जांच में जो दिलचस्पी दिखाई, वह हर मामले में शहर की सरकारों और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के लिए अनिवार्य सी बात है.

यह भी बताया गया है कि बीआईएस एक ट्रस्ट चलाता है, जिसे जल-शोधन (रिवर्स ऑस्मोसिस) कंपनियों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है. इसे सेफ वॉटर नेटवर्क कहा जाता है, इसमें भाग लेने वाली कंपनियों में हनीवेल, टाटा ट्रस्ट और अन्य जैसे शीतल पेय पेप्सिको, हिल्टन और कोस्मोस एनर्जी शामिल हैं.

दिलचस्प बात तो यह है कि बीआईएस में जल शोधन पर एक उप समिति भी बनी हुई है. आप शायद अनुमान लगा सकते हैं कि इसके सदस्य कौन हैं: हिंदुस्तान यूनिलीवर, जो आरओ ब्रांड प्यूरिट बनाता है, यूरेका फोर्ब्स (प्रसिद्ध एक्वागार्ड बनाने वाली कंपनी), आयन एक्सचेंज (जीरो बी वाटर प्यूरीफायर के निर्माता), उषा श्रीराम, जिनके कई जल शोधक ब्रांड हैं, व्हर्लपूल जो पूरासेंस वॉटर प्यूरीफायर और जाने-माने ब्रांड केंट को बेचती है-इन सभी ब्रांडों को किसी भी परिचय की जरूरत नहीं है. इन ब्रांडों को विज्ञापन विज्ञापन के द्वारा क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, बॉलीवुड अभिनेता हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित और कई अन्य प्रतिष्ठित लोगों द्वारा प्रचारित किया जाता है.

क्या यह अभी भी आश्चर्य की बात है कि 1986 में इसकी स्थापना के बाद पहली बार बीआईएस ने नल के पानी पर अध्ययन क्यों किया? अगर पानी की गुणवत्ता को लेकर खतरा है, तो क्या इन कंपनियों को इसका फायदा नहीं होगा? क्योंकि बहुमत लोगों के पास इसका एकमात्र उपाय यही होगा कि वे साफ पानी पीने के लिए वाटर प्यूरीफायर खरीद लें.

इनमें से कुछ कंपनियां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के उस आदेश के खिलाफ लड़ रही है जिसमें उसने पर्यावरण और वन मंत्रालय को उन क्षेत्रों में रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्रों या इकाइयों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है, जहां कुल जल आपूर्ति 500 टीडीएस से कम हो गई है (कुल ठोस पदार्थ का विघटन)। एनजीटी ने पानी की बर्बादी को कम करने के लिए कहा क्योंकि आरओ तकनीक के पानी बर्बाद करने के मामले में कुख्यात हैं. इसके जवाब में और एनजीटी के आदेश पर रोक लगाने के लिए आरओ कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. (22 नवंबर को मामले की सुनवाई हुई और कंपनियों को अदालत से कोई राहत नहीं मिली-न ही अदालत ने बीआईएस रिपोर्ट का ही संज्ञान में लिया.)

यह समझने के लिए दो समान बातों पर विचार करें कि बीआईएस-जो कि आरओ कंपनियों का सिरमौर है जो इस बहस को आगे बढ़ा रहा है. क्या होगा अगर कोई यह कहे कि चूंकि एयर प्यूरिफायर हवा को साफ बना सकते हैं, तो वायु प्रदूषण के लिए यातायात के मोर्चे या अन्य योगदानकर्ताओं पर कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को कहना जारी रखा है कि सरकार उचित दिशानिर्देशों को लागू करे और शहरों में जहां टीडीएस 500 से कम है, वहां आरओ का उपयोग बंद कर दे. ऐसे परिदृश्य में, जहां भंग किए गए सॉलिड पदार्थ 500 टीडीएस से कम हैं, वहाँ पानी को फिल्टर करने के लिए किसी भी झिल्ली की जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश, इसमें कोई संदेह नहीं है, कि शहरों में आम लोगों की लूट को कम करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करेगा.

पीछे के रास्ते से निजीकरण

आरओ व्यवसाय शहरों में पानी के निजीकरण करने का एक प्रकार का पीछे का दरवाजा है. दिल्ली जैसे शहर में, जहाँ 50 लाख से अधिक परिवार रहते हैं, वहाँ लगभग 25 लाख आरओ या तो घरों और या फिर कार्यालयों में लगे हुए हैं. लोग इन उपकरणों को लगाने, उन्हें बनाए रखने और बदलने के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करते हैं, जो पैसा आरओ निर्माताओं के लाभ को बढ़ाता हैं. यह सारा का सारा पैसा पानी को शुद्ध करने के नाम पर खर्च किया जाता है.

केवल पैरा-स्टेट्ल और शहर की सरकारों को नियंत्रित करने वाले नियमों पर एक नजर डालने से अनायास ही पता चलता है कि पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने का उन्हें जनादेश है और वे इसकी अवज्ञा नहीं कर सकते हैं या लोगों को इससे इनकार नहीं कर सकते हैं. यह ऐसी जिम्मेदारी है जिसे केंद्र, राज्य और शहर की सरकारों को पूरा करना चाहिए.

पानी की उपयोगिताओं के लिए पूरी तरह से पारदर्शी प्रोटोकॉल स्थापित की जानी चाहिए, जहां भी कानूनों लागू करने की जिम्मेदारी उन पर है. पानी हर नागरिक का अधिकार होना चाहिए. यह बहस कि पानी केवल एक जरूरत है जिसे निजी कंपनियों द्वारा भी पूरा किया जा सकता है, पानी के निजीकरण के लिए केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों की इच्छा को उजागर करता है. यह सुनिश्चित करने के लिए इस पर नजर रखी जानी चाहिए कि उपयोगिताओं के निजीकरण के माध्यम से शहरों में लोगों से बड़े पैमाने पर धन की प्राप्ति तो नहीं की जा रही है.

वैकल्पिक मॉडल

पीने लायक पानी उपलब्ध करनी की जिम्मेदारी राज्य/देश की होनी चाहिए. उदाहरण के लिए कि एक ऐसा मॉडल जो पीने के पाने के कुशल प्रबंधन को पानी से संबंधित सेवाओं के एकीकरण से उत्पन्न होता है. शहरों के भीतर, सार्वजनिक संस्थानों द्वारा बनाए गए मॉडल को नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उदाहरण के लिए एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) मॉडल. इस मॉडल को सभी को लागू करना चाहिए, यहाँ संस्थान में पानी को साफ-सवच्छ और पीने लायक बनाने का उपचार एम्स के भीतर ही किया जाता है, जिसमें काफी उच्च स्तर की निगरानी, उत्पादन, उपचार, जांच पर पूर्ण एकीकरण होता है. कई वर्षों से संस्थान में पानी के दूषित होने का एक भी मामला सामने नहीं आया है.

राज्य या शहर की सरकारों के अधिकार क्षेत्र में काम करने के लिए जो आवश्यक है वह एक एकीकृत, पारदर्शी, जवाबदेह और जिम्मेदार सेवा की है. स्वच्छ जल आपूर्ति के लिए भारत की बढ़ती आवश्यकता के सामने कुछ भी कम नहीं है.

लेखक हिमाचल प्रदेश के शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर हैं. व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.