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कोयला उद्योग में फिर माफिया राज?

Coal India workers strike on 24 September to protest against FDI

 

भ्रष्टाचार का उन्मूलन, पारदर्शिता, औद्योगिक विकास, श्रमिक कल्याण आदि शब्द झारखंड में मानों बेमानी हो गए हैं. माफियागिरी के लिए मशहूर धनबाद कोयलांचल फिर नवोदित कोयला माफियों के शिकंजे में है. कोलियरियों से कोयला आधारित उद्योगों तक सड़क मार्ग से कोयला पहुंचाना तभी संभव हो पाता है, जब मजदूरों के मसीहा के रूप में स्थापित माफियों की जेबें गर्म हो जाती हैं.

झारखंड राज्य बनने के बाद अठारह वर्षों में भले राजधानी के लिए नया टाऊनशिप नहीं बन पाया. पर सत्ताधारी दल का प्रश्रय पा कर कोयला माफियों की जड़ें मजबूत जरूर हो गईं हैं. सिर से पानी ऊपर बहने लगा तो उद्योगपतियों के साथ ही संघ परिवार का घटक विश्व हिंदू परिषद (विहिप) भी हाय-तौबा मचाने लगा है. अकुलाहट तो भाजपा में भी है. जनता के बदले-बदले रूख से चुनावी गणित गड़बड़ाने का डर सता रहा है. दूसरी तरफ चाल, चरित्र और चेहरा दूसरों से भिन्न होने का दावा करना भी मुश्किल हो गया है. भाजपा समर्थक व्यापारी अखबारों में बयान देकर भाजपा को वोट देने के लिए अफसोस जता रहे हैं.

देश में धनबाद कोयलांचल अकेला है, जहां प्राइम कोकिंग कोल का भंडार है. मांग के अनुरूप कोयले का उत्पादन न होने से साल दर साल आयात बढ़ाना पड़ रहा है. पर धनबाद कोयलांचल का हाल यह है कि कम से कम दर्जन भर कोलियरियों से बीते एक महीना से हार्डकोक कारखाने वाले एक छंटाक कोयला नहीं ले पाए हैं. एक कोलियरी तो ऐसी है, जहां एक साल से सड़क मार्ग से कोयले की बिक्री नहीं हो पा रही है.

आम चर्चा है कि एटक से जुड़े भारतीय जनता पार्टी के विधायक ढुल्लू महतो कोयला उत्पादक कंपनी भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और हार्डकोक उद्योगों के बीच रोड़ा बन गए हैं. कहा जा रहा है कि कोयले के ग्राहक श्रमिकों को ट्रकों पर कोयला लादने के एवज में प्रति टन 650 रूपए की जगह 1250 रूपए  देने का दबाव वे बना रहे हैं , पर उद्योगपति इसके लिए तैयार नहीं हैं.

उद्योगपति पुरानी दर पर भुगतान करने को तैयार हैं. पर अब वह रकम श्रमिकों के बैंक खाते में देना चाहते हैं. इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स एसोसिएशन ने इस गतिरोध की स्थिति में और सरकार से कोई रास्ता नहीं निकलने पर 1 जनवरी से सभी हार्डकोक उद्योग बंद करने की बात कही है. साथ ही यह भी जोड़ा है कि उनमें काम करने वाले लगभग एक लाख श्रमिकों को मुक्त कर दिया जाएगा.

दरअसल, कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी कंपनी बीसीसीएल प्रबंधन और उद्योगपतियों के नापाक गठबंधन से खास किस्म का माफियावाद पनपा था. अब वह उनके लिए ही भस्मासुर बन गया है. नियमत: कोयला उत्पादक कंपनी को ट्रकों पर कोयले की लोडिंग करवानी है. इसलिए कि कोयले की कीमतों में लोडिंग चार्ज शामिल होता है. पर कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद कुछ उद्योगपतियों ने जगह-जगह रंगदार खड़ा किया. ताकि उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पहले कोयला मिल जाए. बाद में कम कीमत पर महंगा कोयला लेने के लिए उन रंगदारों का उपयोग किया जाने लगा. कालांतर में वही रंगदार कोयले की लोडिंग में लगे श्रमिकों की हिमायत की आड़ में माफिया बन बैठे.

अब उन्हें गैर कानूनी तरीके से कोयले की लोडिंग में लगाए गए श्रमिकों की मजदूरी की आड़ में उद्योगपतियों से रंगदारी टैक्स चाहिए. कहते हैं कि माफिया कोयले की लोडिंग के लिए प्रतिटन सवा दो सौ रूपए श्रमिकों को देते हैं. पर कोयले के खरीददारों से अब तक 650 रूपए प्रतिटन लेते रहे हैं. इससे माफियों को पाचस-साठ करोड़ रूपए की कमाई हो जाती है. करोड़ों रूपए के इस नापाक कारोबार के लिए ही माफियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई होती रहती है. कोयला उत्पादक कंपनी को वैसे तो इस माफियावाद से कोई घाटा नहीं होना चाहिए था. इसलिए कि उसका लोडिंग चार्ज बच जाता है. पर कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए अधिकारी अपने कार्य-क्षेत्र में माफिया को पनपने दे रहे होंगे, ऐसा नहीं लगता. यदि उनकी नीयत साफ होती तो जिस तरह रेल वैगनों पर कोयले की लोडिंग करवाई जाती है, उसी व्यवस्था से सड़क मार्ग से भी कोयला बेचा जा सकता था. जाहिर है कि नापाक धंधे में उनकी भी भूमिका होगी.

माना जा रहा है कि धनबाद की ही एक अन्य कोलियरी में कोयला लोडिंग के धंधे पर वर्चस्व की लड़ाई की वजह से सड़क मार्ग से कोयले की बिक्री एक साल से नहीं हो पा रही है.

आम धारणा है कि पहले से वहां मार्क्सवादी समन्वय समिति (एससीसी) के विधायक अरूप चटर्जी के विश्वास पात्र नेताओं का कब्जा है. अब चर्चा है कि अब  वहां भाजपा के ही एक अन्य विधायक राज सिन्हा अपनी दखल चाहते हैं. राज सिन्हा कहते हैं कि यह कोलियरी उनके विधानसभा क्षेत्र में है. जाहिर है कि वह चाहते हैं कि उनके समर्थकों को भी कोयला लोडिंग का काम मिले. पर सबको मालूम है कि विवाद के पीछे आर्थिक हित जुड़ा हुआ है.

धनबाद कोयलांचल के झरिया विधानसभा क्षेत्र का लगातार प्रतिनिधित्व करने वाले चर्चित सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद एक दशक तक कोयला उद्योग संगठित माफियावाद से मुक्त रहा. बाद में अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रंगदार मजबूत होने लगे.

मौजूदा समय में धनबाद कोयलांचल के एक बड़े भू-भाग पर ढुल्लू महतो का दबदबा है. उनके साथ युवा-शक्ति है. इन युवाओं को लेकर बना टाईगर फोर्स इतना सशक्त है कि भाजपा संगठन धनबाद जिले के खासतौर से बाघमारा विधानसभा क्षेत्र में उसके पीछे ही नजर आता है.

अपने बूते राजनीति शुरू करने वाले ढुल्लू महतो पहले पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चे की टिकट पर गिरिडीह संसदीय क्षेत्र के बाधमारा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते. बाद में भाजपा में शामिल हो गए. अब वह भाजपा की टिकट पर विधायक हैं. अनुमान है कि हार्डकोक उद्योगों को उनके विधानसभा क्षेत्र की कोलियरियों से ही साठ फीसदी तक कोयला मिलता है. वे मुख्यमंत्री रघुबर दास के करीबी माने जाते हैं.

कोयला उद्योग का इतिहास रहा है कि यहां श्रमिकों की हिमायत करके ही माफियावाद फला-फूला. सन् 1971 से 1973 के बीच कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ था. उसके पहले दबंग लोग खान मालिकों को भूमिगत कोयला खदानों में कोयला खनन के लिए श्रमिक उपलब्ध कराते थे. पर खानों में अवैज्ञानिक तरीके से माइनिंग होने की वजह से दुर्घटनाएं होती रहती थी. लिहाजा श्रमिक डर कर भाग खड़े होते थे. ऐसी स्थिति की वजह से श्रमिकों के सप्लायरों को दो और काम मिलने लगे. पहला तो यह कि दुर्घटना होने पर उस बात को दबा देना है.

दूसरा यह कि श्रमिक खान छोड़कर भागने न पाएं. इसके साथ ही शुरू हो गया था श्रमिकों के शोषण का अंतहीन सिलसिला. श्रमिकों की हृदयविदारक स्थिति को केंद्र में रखकर कई किताबें छप चुकी हैं. फिल्में बन चुकी हैं. कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद कोयला श्रमिकों के जीवन में नया विहान हुआ था. पर हाल के वर्षों में सरकार ऐसी नीतियां बनाती गई जो कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण की मूल भावना के उलट हैं. उसका परिणाम यह हुआ है कि कोयला उदयोग में नए किस्म का माफियावाद पनप गया है.

सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग में बीते एक दशक में कोयला श्रमिकों की संख्या एक तिहाई कम गई हैं. कारण  कि कोयला खनन से लेकर कोयला लोडिंग तक के काम में आऊटसोर्सिंग कंपनियां लगी हुई हैं. इनमें कई कंपनियां तो सीधे तौर पर माफियों से जुड़ी हुई हैं. बाकी कंपनियों को भी माफियों की छत्रछाया में ही काम करना होता है. नतीजतन माफियों का अर्थतंत्र व्यापक हो चुका है. इसलिए हितों का टकराव न हो तो कोई भी राजनीतिक दल सोने के अंडे देने वाली मुर्गियों को हलाल करना नहीं चाहता है. खास बात यह है कि मौजूदा समय में अपवादों को छोड़ दें तो हितों का टकराव भाजपा नेताओं के बीच ही है.

सन् 1990 में सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकार उनके छोटे भाई बच्चा सिंह को मिला था. पर पांच साल बीतते-बीतते सूर्यदेव सिंह की पत्नी मैदान में आ गईं. उन्होंने भाजपा का दामन थामा और अपने दिवंगत पति के क्षेत्र झरिया से विधायक बनीं. बाद में बागडोर बेटे संजीव सिंह को दे दी. अब संजीव सिंह भाजपा की टिकट पर झरिया के विधायक हैं. पर अपने चचेरे भाई की हत्या से संबंधित मामले में जेल में हैं. माना जाता है कि उनकी ट्रेड यूनियन जनता मजदूर संघ, जो हिंद मजदूर सभा से संबद्ध है, का धनबाद कोयलांचल के झरिया से लेकर अनेक इलाकों खासा दबदबा रहा है.

कहा जा रहा है कि सूर्यदेव सिंह का युग समाप्त होने के बाद उनके परिवार को पहली बार ढुल्लू महतो से मजबूत चुनौती मिली है. काम और काम करने के तरीके इन सभी नेताओं की लगभग एक जैसी है.

अब देखना है कि अपराध मुक्त भारत की बात करने वाली और झारखंड से माफिया उन्मूलन को एजेंडे में शामिल करके सत्ता में आई भाजपा कोयले के काले धंधे और माफियावाद को बढ़ावा देने वाले अपने दिग्गज नेताओं से किस तरह निबटती है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और झारखंड से संबंधित हैं.