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स्वास्थ्य बजट: ऊंट के मुंह में जीरा

budget allocation on health services is very low

 

केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में जन स्वास्थ्य पर खर्चे को बढ़ाया है, उसके बावजूद यह देश की जरूरत से मेल नहीं खाता है. देश की जरूरत से हमारा तात्पर्य वर्तमान ‘बीमारी के बोझ’ और पड़ोसी देशों द्वारा स्वास्थ्य पर किए जा रहे सरकारी खर्च की विश्व-बैंक द्वारा की गई तुलना से है.

अपने साल 2019-20 के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य पर बजटीय आवंटन को पिछले साल की तुलना में 16.15% बढ़ाया है, जबकि अन्य प्रमुख मदों के खर्चे में बजट में 13.39% की ही बढ़ोतरी प्रस्तावित है. इस कारण से केन्द्र सरकार को साधुवाद देना चाहिये कि उसने जन स्वास्थ्य को वरीयता दी है, लेकिन उसके बावजूद यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.

साल 2018-19 के संशोधित बजट अनुमान के अनुसार स्वास्थ्य पर 55,949 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और साल 2019-20 के बजट में इस पर 64,999 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है. इस तरह से 9,050 हजार रुपये की बढ़ोतरी स्वास्थ्य के लिए प्रस्तावित है. इसी सरकार ने साल 2017-18 में स्वास्थ्य पर 52,994 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिसे साल 2018-19 में 2955 करोड़ रुपये अर्थात् महज 5.5% ही बढ़ाया गया था.

यहां पर इस बात का उल्लेख करना गलत न होगा कि केन्द्र सरकार का दावा है कि साल 2024 तक भारत की अर्थव्यवस्था 5 खरब डॉलर की हो जाएगी. इसी के साथ कहा जा रहा है कि भारत उच्च मध्यम आय समूह में प्रवेश करेगा. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजटीय भाषण में कहा है कि 1) “भारतीय अर्थव्यव्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने में 55 साल लग गए, लेकिन जब देश और उसके लोगों का दिल आशा, विश्वास और आकांक्षाओं से भरा हुआ है तो हमने पांच सालों में एक ट्रिलियन डॉलर जोड़ने का काम किया. 2) “आज हम लोग तीन ट्रिलियन डॉलर के करीब हैं. जब हम पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ख्वाहिश रखते हैं तो कई चकित होते हैं कि क्या ये संभव होगा.” 3) “हमें अपने नागरिकों पर विश्वास है और उनके पुरुषार्थ और आगे बढ़ने के सपने पर भी. मोदी सरकार के नेतृत्व में हम इस लक्ष्य को जरूर हासिल करेंगे.”

गौरतलब है कि विश्व-बैंक ने साल 2015 के आधार पर दुनिया के देशों द्वारा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के बारे में आंकड़ा पेश किया था, जिसका उल्लेख भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल हेल्थ प्रोफाइल में भी किया गया है. उसके अनुसार उच्च आयवर्ग के देश स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पादन का 5.2%, उच्च मध्यम आयवर्ग के देश 3.8%, निम्न मध्यम आयवर्ग के देश 2.5% और निम्न आयवर्ग के देश 1.4% खर्च करते हैं. जबकि भारत उस समय स्वास्थ्य पर मात्र 1% सरकारी खर्च करता था.

केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा मिलकर साल 2015-16 में स्वास्थ्य पर 1.40 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए. इस तरह से प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर 1112 रुपए खर्च किए गए. कुल मिलाकर देश के सकल घरेलू उत्पादन का मात्र 1.02% स्वास्थ्य पर खर्च किया गया. इसमें केन्द्र सरकार की भागीदारी 31% और राज्य सरकारों की भागीदारी 69% रही है.

अर्थात् मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि केन्द्र सरकार ने उस साल 30 हजार करोड़ रुपये और राज्य राज्य सरकारों ने मिलकर 70 हजार करोड़ रुपये खर्च किए. स्वास्थ्य पर खर्चे को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पादन के 3 फीसदी के करीब लाया जाना चाहिए. यदि स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन का 3 फीसदी खर्च करना है तो साल 2015-16 के आंकड़ों के हिसाब से यह करीब 4.20 लाख करोड़ रुपयों के बराबर का होता है. जिसमें केन्द्र सरकार की हिस्सेदारी बढ़कर 1.26 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष और राज्य सरकारों की हिस्सेदारी बढ़कर 2.94 लाख करोड़ रुपयों के बराबर का बैठती है.

बजट प्रतावों के अनुसार इस साल 64,999 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है, यह जरूरत के 1.26 लाख करोड़ रुपयों के करीब आधे के बराबर का बैठता है. इस कारण से अपनी शुरुआती टिप्पणी में हमने कहा था कि यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. भारत की तुलना में मालद्वीप स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च अपने सकल घरेलू उत्पादन का 9.4%, थाईलैंड 2.9%, भूटान 2.5%, श्रीलंका 1.6%, इंडोनेशिया-म्यांमार और नेपाल 1-1% और बांग्लादेश 0.4% करता है.

केन्द्र सरकार जिस तरह से जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने की बात कर रही थी उससे स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों को उम्मीद थी कि सरकार दवाओं को टैक्स फ्री कर सकती है. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपने पहले कार्यकाल में जेनेरिक दवा पर जोर देने से लगा था कि सरकार की मंशा दवाओं की कीमत कम करना है. दरअसल, जहां स्वास्थ्य को सर्वसुलभ बनाने के लिए सरकारी खर्च में बढ़ोतरी एक रास्ता है, वहीं एक दूसरा रास्ता भी है जो कहता है कि दवाओं के दाम को कम कर दिया जाए जिससे स्वास्थ्य सुविधाएं सस्ती हो जाती हैं. इसी कारण से स्वास्थ्य क्षेत्र के कुछ जानकारों का मानना था कि दवाओं पर जीएसटी को शून्य किया जा सकता है. लेकिन इस मामलें में केन्द्र सरकार ने निराश ही किया है.

भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग की साल 2017-18 की सलाना रिपोर्ट के अनुसार साल 2016-17 के दौरान भारत का दवा बाजार 2,19,755 करोड़ रुपये का रहा है, जिसमें से देशी बाजार 1,12,137 करोड़ रुपये का रहा था. आईए इसे आधार मानकर दवाओं पर कितना जीएसटी सरकार को मिला होगा इसका मोटे तौर पर अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं. दवाओं पर जीएसटी 0%, 5% और 12% की दर से लगता है. ज्यादातर दवाएं 12% के दायरे में आती हैं. दवाओं पर अधिकतम जीएसटी कितना इकट्ठा हुआ होगा इसका अनुमान यदि 12% की दर से करें तो सरकार को दवाओं पर तकरीबन 12 हजार करोड़ रुपये से 13 हजार करोड़ रुपये अधिकतम मिला होगा.

जब 10 माह में ही सरकार ने 9.71 लाख करोड़ रुपयों की जीएसटी संग्रहित की तब क्या दवाओं को जीएसटी से छूट नहीं दी जा सकती है. इससे जीएसटी संग्रहण में ज्यादा-से-ज्यादा 12-13 हजार करोड़ रुपयों की कमी आएगी लेकिन इससे दवाओं के दाम तो कम हो जाएंगे, जिसका फायदा सीधे तौर पर आम जनता को होगा जो दवाएं अपनी जेब से खर्च करके खरीदते हैं.

बता दें कि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स का अखिल भारतीय संगठन एफएमआरएआई काफी समय से मांग कर रहा है कि दवाओं को टैक्स फ्री कर दिया जाए ताकि इनके दाम कम हो सकें. इस मांग पर देशभर के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स पिछले करीब 10 सालों से हर साल हड़ताल करते रहते हैं.

शुरुआत में हमनें जिस ‘बीमारी के बोझ’ की बात की थी उस पर भी चर्चा कर ली जाए. केन्द्र सरकार के विभाग की तरफ से जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 के अनुसार गैर-संक्रामक रोग साल 1990 की तुलना में साल 2016 तक 30% से बढ़कर 55% का हो गए हैं. गैर-संक्रामक रोग का अर्थ उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, डाइबिटीज, दमा, किडनी के रोग, कैंसर और मस्तिष्क घात जैसी बीमारियों से हैं.

जहां तक गैर-संक्रामक रोगों की बात है तो इस पर जारी सरकारी आकड़ें चौंकाने वाले हैं. 1 जनवरी 2017 से 31 दिसंबर 2017 के बीच सरकारी Non-Communicable Diseases Clinic में देशभर में 3 करोड़ 57 लाख 23 हजार 660 लोग गए, जिनमें से 30 लाख 06 हजार 443 लोगों को डाइबिटीज था. इसी तरह से 36 लाख 54, हजार 099 लोगों में उच्च रक्तचाप की बीमारी पाई गई. जिसका अर्थ होता है कि सरकारी अस्पतालों में जाने वालों में से तकरीबन 10% लोगों को डाइबिटीज और उच्च रक्तचाप की बीमारी निकली है. इनमें से 1 लाख 34 हजार 348 लोग हृदय रोग से पीड़ित थे. इसके अलावा 47,464 लोगों को मस्तिष्कघात और 39,635 लोगों को कैंसर की बीमारी थी.

इसी तरह से साल 2015 में प्राकृतिक आपदा और दुर्घटना में 4 लाख 13 हजार 457 जानें गई थीं.

अब जरा संचारी रोग अर्थात् संक्रमण से होने वाले रोगों और मौतों के बारे में भी जान लिया जाए.

साल 2017 में 8,42,095 लोगों को मलेरिया हुआ जिसमें से 104 मौत के गाल में समा गए. इसी तरह से 63,679 लोगों को चिकनगुनिया, 5758 को कालाजार हुआ था. इसी साल 13,036 लोगों को एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम हुआ, जिसमें से 1010 की जान चली गई. 2180 लोगों को जापनीज इंसेफेलाइटिस हुआ जिसमें 252 की मौत हो गई. 1,57,996 लोगों को डेंगू हुआ जिसमें 253 की मौत हो गई.

इसी तरह से साल 2016 में 1,41,66,574 लोगों को एक्यूट डाइरिया हुआ जिसमें 1,555 की जान चली गई. इसी साल 22,15,805 लोगों को टाइफाइड हुआ जिसमें से 511 मौत के मुंह में समा गये. 4,08,10,524 लोगों को एक्यूट रेसपिरिटी इंफेक्शन हुआ जिसमें 3164 लोग मारे गए. जहां तक वाइरल हेपेटाइटिस की बात है तो इसी साल इससे 1,45,970 लोग ग्रसित हुए, जिसमें से 451 की मौत हो गई.

साल 2016 में ही 7,44,865 को निमोनिया हुआ, जिससे 3459 की मौत हो गई. इसी साल 3087 लोगों को मेनेन्जाइटिस हुआ था, जिसमें 146 की जानें चली गईं. साल 2017 में टीबी के 6,95,078 मामले सामने आए.

बहरहाल, बीमारी और उनसे हुई मौतों की सूची लंबी है, जिसका यहां पर उल्लेख करना संभव नहीं है. कुलमिलाकर, बीमारों की संख्या और बीमारी के प्रकार देखकर जाहिर होता है कि स्वास्थ्य पर सरकार अपने खर्च में बढ़ोतरी करे. वैसे अच्छे स्वास्थ्य के लिये केवल दवाएं ही काफी नहीं हैं, उसके लिये पीने का स्वच्छ पानी, संतुलित आहार, साफ-सफाई और बेहतर पर्यावरण की भी आवश्यकता है.

इस साल हुए लोकसभा के चुनावों में मोदी सरकार को जिस तरह से भरपूर जनादेश मिला है, उससे सरकार की नैतिक जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. हमारा मानना है कि स्वास्थ्य पर सरकार अपने खर्च में बढ़ोतरी करे अन्यथा 5 खरब डॉलर की वह अर्थव्यवस्था किस काम की जहां के बाशिंदें पैसे के अभाव में इलाज को तरस जाएं.