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जब अशफ़ाक़ राम-राम रटते रहे

article on Ashfaqulla Khan anniversary

 

यह लेख अशफाक उल्ला खाँ के बारे में नहीं है. न ही रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में है. यह आज़ादी के दो परवानों के आपसी रिश्तों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है. यहाँ तो गर्मजोशी से भरे एक अटूट रिश्ते की बात होनी है. क्योंकि आज के झूठ और अफवाह भरे दौर में इस रिश्ते की बात करना बेहद जरूरी है. जो लोग आज आज़ादी की लड़ाई से जुड़े प्रतीकों पर जमीनी काम कर रहे हैं उन्हें पता है कि ऐसा क्यों है?

ऐसा इसलिए है कि जिनके राजनीतिक पुरखों ने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया था, वो शहीदों के दामन पर कीचड़ उछालकर समूची विरासत को कठघरे में खड़ा कर देना चाहते हैं. इसका शिकार सिर्फ़ गाँधी- नेहरू नहीं हैं, अभी छोटे स्तर पर ही सही लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ भी एक बड़ी साजिश चल रही है. यह सिद्ध करने की कोशिश है कि स्वतंत्रता संघर्ष के सभी नायक आपस में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या की भावना से भरे हुए थे.

आज से तकरीबन 90 साल पहले 19 दिसंबर 1927 को इन दोनों क्रांतिकारियों ने रोशन सिंह के साथ हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमा था. चार क्रांतिकारी जिन्हें फाँसी की सज़ा सुनायी गयी थी उनमें राजेंद्र लाहिरी को दो दिन पहले ही फाँसी पर चढ़ा दिया गया था. उसकी वजह सबको पता है और उन्हें यहाँ दोहराने की कोई मंशा नहीं है. काकोरी की प्रसिद्ध ट्रेन डकैती में अभियुक्त बनाये गए इन शहीदों के प्रति ब्रिटिश शासन ने अभूतपूर्व सख्ती दिखाते हुए उन्हें फाँसी की सजा सुनाई थी.

मेरे एक मित्र कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में बिस्मिल जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत करने गए. उन्होंने वहाँ देखा कि बिस्मिल की याद में हो रहे कार्यक्रमों में आरएसएस के लोग बतौर वक्ता आमंत्रित हैं. जिनकी विचारधारा के लोगों ने क्रांतिकारियों की मुखबिरी की थी, कालापानी होने पर माफ़ीनामे लिखे थे— वे बिस्मिल को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे. लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात थी कि इस मौके पर उन्होंने बड़ी चालाकी के साथ बिस्मिल के खिलाफ अशफ़ाक़ को खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि बिस्मिल को फाँसी न होती अगर अशफ़ाक़ उल्ला खाँ ने उनकी मुखबिरी न कर दी होती. अशफ़ाक़ की गवाही और शिनाख्त पर ही बिस्मिल गिरफ्तार हो गए वरना वो पुलिस के हाथ कभी न आते.

यह एक सफ़ेद झूठ है और साथ ही एक खतरनाक योजना भी. इसमें एक तरफ़ तो आज़ादी की लड़ाई के इतिहास को तोड़-मरोड़कर लोगों की उसके प्रति श्रद्धा ख़त्म करने की साजिश है तो दूसरी तरफ़ उसमें अपनी नकारात्मक भूमिका को छुपा ले जाने की छुपी मंशा भी है. आधुनिक भारतीय इतिहास को नए सिरे से लिखने के संघी उत्साह के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन के नायकों का चरित्र हनन करते हुए उनके नैतिक प्रभाव को जनता के बीच ख़त्म करना है.

लेकिन अशफ़ाक़ और बिस्मिल के रिश्ते के मामले में उनको एक-दूसरे के बरक्स खड़ा करना हिन्दू साम्प्रदायिकता के मुस्लिम विरोधी प्रोजेक्ट को भी स्थापित करता है. “मुसलमान भारत के प्रति कभी वफादार नहीं हो सकते” की संघी धारणा को पुख्ता करने के लिए यह और ऐसे तमाम झूठ काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं. अगर अशफ़ाक़ बिस्मिल जैसे क्रांतिकारी मित्र को धोखा दे सकते हैं तो भला कौन मुसलमान है जिस पर भरोसा किया जा सकता है? ख़ास बात यह है कि इस झूठ का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं है कि अशफ़ाक़ ने बिस्मिल की मुखबिरी की थी. यहाँ तक कि लोकस्मृति में भी यह बात कभी सुनने में नहीं आई. इसलिए यह संघ की अपनी झूठ फैक्ट्री का नायाब उत्पाद है जिसे छोटे-छोटे मंचों के सहारे लोगों के दिमाग में उतारा जा रहा है.

रामप्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में अशफ़ाक़ के बारे में एक क़िस्सा सुनाते हैं. एक बार अशफ़ाक़ को हार्ट अटैक का दौरा पड़ा. बेहोशी की हालत में वो राम-राम कराह रहे थे. आर्य समाजी बिस्मिल के साथ रहने के कारण घर-परिवार और आस-पड़ोस के लोगों को लगा कि अशफ़ाक़ ने कहीं धर्मांतरण तो नहीं कर लिया. सब उन्हें टोकने लगे कि अल्लाह-अल्लाह कहो लेकिन अशफ़ाक़ राम-राम रटते रहे. तभी एक क्रान्तिकारी साथी वहाँ आए और उन्होंने राज खोला. अशफ़ाक़ बिस्मिल रामप्रसाद को राम कहकर पुकारते थे. तब रामप्रसाद बिस्मिल को बुलाया गया और अशफ़ाक़ को चैन मिला.

जो इंसान बेहोशी की हालत में भी अपने क्रांतिकारी नेता का नाम ले रहा हो, उसकी शहादत के बाद उस पर इतना गन्दा इल्ज़ाम सुनकर हम सबको शर्म से झुक जाना चाहिए. अशफ़ाक़ के बारे में लिखते समय बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में एक शेर लिखा है, “असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है/ रखना कभी न पाँव यहाँ सर लिए हुए.”

यहाँ असगर शायर रामप्रसाद बिस्मिल का तख़ल्लुस है जो उर्दू कविता परंपरा में एक शान की बात समझी जाती है और हरीम का मतलब मस्जिद है. वो दीवाने अपने सिर तो कटा गए लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भान न था कि आपने वाली पीढ़ियों के कुछ सिरफिरे उन्हें गद्दार ठहराएंगे. बहुत कोफ़्त है, अफ़सोस है. आप भी काकोरी काण्ड के अभियोग में फाँसी का फंदा चूमने वाले इन शहीदों की शहादत के दिन अफ़सोस मनाइए. अफ़सोस इसका नहीं कि वो शहीद हुए, अफ़सोस इसका कि हम और आप उनकी शहादत को सहेजकर भी न रख सके.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के सहायक प्रवक्ता हैं और आज़ादी की लड़ाई को समर्पित संगठन राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के संयोजक हैं.)