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इस कठिन राह का विकल्प नहीं

Congress CWC meeting to be held for the first time on August 10 after Rahul Gandhi's resignation

 

संविधान का अनुच्छेद 370 हर व्यावहारिक अर्थ में निष्रभावी कर दिया गया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नजरिए से देखें तो बेशक नरेंद्र मोदी सरकार की यह बहुत बड़ी सफलता है.

संघ आरंभ से इस अनुच्छेद के खिलाफ था. इसे खत्म करना हमेशा भारतीय जनसंघ के एजेंडे पर रहा. इमरजेंसी के बाद जब जनसंघ जनता पार्टी में शामिल हुआ, तब फिर भारतीय जनता पार्टी के रूप में नए अवतार के आरंभिक वर्षों में जरूर ये पार्टी इस सवाल पर मुखर नहीं थी. लेकिन ये वो दौर था, जब दल जनता पार्टी से मिली गांधीवादी समाजवाद की विरासत और हिंदुत्व की अपनी मूल विरासत के बीच नई दिशा की तलाश में थी. 1989 में अपनाए गए पालमपुर प्रस्ताव के साथ गुमराह होने का पार्टी का वो दौर खत्म हो गया था.

तब से बीजेपी का घोषित एजेंडा अयोध्या में विवादित जगह पर ‘भव्य’ राम मंदिर का निर्माण, धारा 370 की समाप्ति और समान नागरिक संहिता लागू करना रहा. फौरी ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाकर और अब धारा 370 को खत्म कर इनमें से दो मकसदों को उसने हासिल कर लिया है. अयोध्या में मंदिर निर्माण का लक्ष्य भी संभवतः बहुत दूर नहीं है. बहरहाल, यहां उल्लेखनीय यह है कि धारा 370 को बीजेपी सरकार ने खत्म करने में कामयाबी हासिल कर ली है. लेकिन इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. जब बीजेपी लगातार दूसरी बार बड़ा जनादेश हासिल करने में सफल रही, तो यह कदम लाजिमी और हाल के चुनाव नतीजों का तार्किक परिणाम ही है.

इस बीच कोई असामान्य बात (कम-से-कम ऐसा प्रतीत हुआ) रही, तो यह कि जिन दलों से धारा 370 को हटाने (या कम-से-कम इसके लिए अपनाए गए तरीके) का विरोध करने की आशा थी, उनमें से अनेक इस कदम के समर्थन में खड़े हो गए. इनमें तेलुगू देशम पार्टी या बीजू जनता दल जैसी पार्टियां भी थीं, जिनकी पहचान ही क्षेत्रीय स्वायत्तता की आकांक्षाओं की प्रतिनिधि के बतौर मानी जाती रही है. इनमें बहुजन समाज पार्टी भी थी, जिसे कभी सामाजिक न्याय की लड़ाई की प्रतिनिधि माना जाता था. इस सवाल पर कांग्रेस के भीतर भी ऐसे अंतर्विरोधी स्वर उभरे कि यह समझ पाना कुछ घंटों के लिए मुश्किल बना रहा कि क्या सचमुच इतने बुनियादी मुद्दे पर इस पार्टी का अपना कोई रुख है?

बहरहाल, मंगलवार (6 अगस्त) की रात कांग्रेस कार्यसमिति ने अपनी बैठक के साथ इस बारे में भ्रम खत्म किया. यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या किसी पार्टी में परस्पर विरोधी मत रखने वाले नेताओं के लिए गुंजाइश रहनी चाहिए? और क्या ऐसे मतभेदों को सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त किया जाना चाहिए? मगर ये कांग्रेस पार्टी का सिरदर्द हैं. जिन उसूलों को लेकर भारतीय संविधान निर्मित हुआ, उनमें आस्था रखने वाले नागरिकों के नजरिए से ज्यादा अहम सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर राज्य के ढांचे और अनुच्छेद 370 के मामले में कांग्रेस कार्यसमिति ने धारा के विरुद्ध जाकर जो साहसी रुख लिया, क्या उस पर वह आगे हर ऐसे सवाल पर अडिग रहेगी?

गुजरे हफ्ते राज्य सभा में जो देखने को मिला, उसके मद्देनजर ये प्रश्न अति महत्त्वपूर्ण है. वहां गैर-कानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम में संशोधन बिल का अपने भाषणों कांग्रेस नेताओं ने विरोध किया. मगर सबको हैरत में डालते हुए पार्टी ने इस विधेयक के समर्थन में मतदान कर दिया. देर तक यह समझना मुश्किल बना रहा कि आखिर कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया? पार्टी ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया, लेकिन मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि वो खुद को आतंकवाद से लड़ाई में पीछे नहीं दिखाना चाहती थी. उसे भय था कि इससे मतदाता नाराज हो जाएंगे.

मगर इस भय में पार्टी को ये ख्याल नहीं रहा कि ऐसा कर उसने आतंकवाद की बीजेपी की परिभाषा को सहज स्वीकार कर लिया है. और उसे यह भी याद नहीं रहा कि ऐसा करके जो स्थान वह पाना चाहती है, वह आज खाली नहीं है. हकीकत यह है कि बीजेपी से उसके मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा कर कांग्रेस कुछ हासिल नहीं कर सकती. जबकि वह उन बहुत से तबकों और लोगों को मायूस करती है, जिनका झुकाव आज के हालात में स्वाभाविक रूप से उसकी तरफ बन रहा है.

लोक सभा का चुनाव परिणाम आने के बाद से कांग्रेस अधर में है. राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद से अब तक वह कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं चुन पाई है. (10 अगस्त को ऐसा होने की संभावना है.) ऐसे वैचारिक भटकाव भी स्वाभाविक है. मगर ये भटकाव सिर्फ पिछले ढाई महीनों की कहानी नहीं है. ये कथा कई दशक पुरानी हो चुकी है. पार्टी को लंबे समय से महज एक चुनावी मशीन समझा जाता रहा है. यूपीए के शासनकाल में उसकी यह एक प्रमुख आलोचना रही कि वैचारिक दिशा देने का काम उसने यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) को आउटसोर्स कर रखा है. एनएसी की पहल पर यूपीए सरकार ने कई अच्छे काम किए, मगर ये सवाल पूछा जाता रहा कि आखिर कांग्रेस की राजनीति क्या है?

नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी कांग्रेस इस सवाल पर भ्रम नहीं छांट पाई. इसका क्या असर होता है, इसका अहसास शायद राहुल गांधी को भी हुआ. इसकी झलक अध्यक्ष पद से दिए गए उनके इस्तीफे में देखने को मिली. ये अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे हालात नहीं होते, तो शायद राहुल गांधी पद छोड़ने पर इतना जोर नहीं डालते. बहरहाल, अब कांग्रेस के सामने समस्याएं और भी गहरा गई हैं. भ्रम का शिकार रहते हुए वह इनका कोई समाधान नहीं ढूंढ सकती. अब उसे तय करना ही होगा कि उसकी राजनीति क्या है? उसकी प्रासंगिकता क्या है?

इस सिलसिले में उसे यह तय करना होगा कि वह देश को नेतृत्व देना चाहती है, यह भीड़ के नेतृत्व में चलना चाहती है? यह तर्क भीड़ का अनुयायी बनने की तरफ जाता है कि लोग जो चाहते हैं या लोगों की जो मानसिकता है पार्टी को वैसा ही रुख अपनाना चाहिए, भले यह रुख पार्टी के अपने इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और संविधान की मूलभूत भावना के खिलाफ जाता हो. मगर ऐसा करके कांग्रेस आज कहीं पहुंच पाएगी, इसकी संभावना न्यूनतम है.

इसीलिए जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर कांग्रेस कार्यसमिति ने जो रुख लिया, वह न सिर्फ स्वागतयोग्य है, बल्कि खुद कांग्रेस के हित में भी है. खबरों के मुताबिक बैठक में राहुल गांधी ने कहा कि पार्टी विचारधारा से हटकर स्टैंड नहीं ले सकती. यह बात आस जगाने वाली है. मगर भरोसा तब बंधेगा, जब पार्टी पहले अपने कार्यकर्ताओं और फिर बाकी देश को अपनी उस विचारधारा के प्रति जागरूक बनाने का अभियान चलाए. इस सिलसिले में मार्क्सवादी विचारक एंतोनियो ग्राम्सी के hegemony (वर्चस्व) का सिद्धांत उसके लिए सहायक हो सकता है.

एक समय कांग्रेस ने विचारधारात्मक, नैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में वैचारिक वर्चस्व स्थापित किया था. उसे कायम रखने का प्रयास उसने छोड़ दिया, जिससे आरएसएस के लिए समाज में जगह बनती चली गई. आज इस विचार का वर्चस्व कायम हो गया है. जब तक कांग्रेस और वो तमाम ताकतें जो खुद को संघ की विचारधारा का विरोधी बताती हैं, इस वर्चस्व को नहीं तोड़तीं और फिर से अपना वर्चस्व नहीं बनातीं, आज के हालात में ज्यादा बदलाव नहीं हो सकता.

कांग्रेस की प्रासंगिकता तभी है, जब वह hegemony के इस संघर्ष में उतरे. दूसरा रास्ता बीजेपी की कार्बन कॉपी बनने का है, जिसका उतना ही महत्त्व होगा जितना कार्बन कॉपी का होता है. फिलहाल कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल गांधी की सोच के मुताबिक रुख लेकर सही रास्ता चुना है. मगर ये सवाल कायम है कि इस पर वह कब तक और कितनी दूर तक चल पाएगी?