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धर्म की रक्षा के लिए नहीं लड़ा गया था 1857 का स्वतंत्रता संग्राम

local tales of 1857 and ajijan bai

 

1857 की गर्मियों में New York Daily Tribune के पन्नों में कार्ल मार्क्स 1857 के विद्रोह के बारे में कहते हैं कि वह (जॉन बुल) जिस चीज को फौजी गदर समझता है, वह असल में एक कौमी बगावत है. अर्थात कार्ल मार्क्स साफ थे कि 1857 का विद्रोह महज सिर्फ नाराज सैनिकों की ब्रिटिश राज से बगावत नहीं है, बल्कि इसमें अंग्रेजों के सामाजिक-आर्थिक शोषण से तंग आ चुके किसान भी शामिल हैं. बाद में उन्होंने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया.

वी डी सावरकर ने 1909 में इसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताते हुए कहा कि यह स्वधर्म और स्वराज के लिए लड़ा गया प्रथम स्वाधीनता संघर्ष था. सावरकर के इस कथन से दक्षिणपंथी इतिहासकार भी सहमत नहीं थे. आर सी मजूमदार और एस ए सेन जैसे दक्षिणपंथी इतिहासकारों ने इस विद्रोह को केवल सिपाहियों और कुछ उच्छश्रंखल तत्वों का कृत्य बताया. उनके तर्क उपनिवेशी इतिहासकारों के समान ही हैं. हालांकि, 1959 में एक और दक्षिणपंथी इतिहासकार एस बी चौधुरी ने सावरकर का पूरी तरह से समर्थन किया.

कई पुराने वामपंथी इतिहासकार भी 1857 के विद्रोह को आधुनिक अर्थों में राष्ट्रवादी आंदोलन नहीं मानते हैं. हालांकि, हाल के वर्षों के नव-वामपंथी इतिहासकारों ने इसे आधुनिक अर्थों वाला राष्ट्रवादी विद्रोह माना है और कहा कि इसमें शामिल आम जनता का लक्ष्य अंग्रेजों को भगाकर अठारहवीं शताब्दी की उस विकेंद्रीकृत शासन-व्यवस्था को कायम करना था, जहां केंद्रीय मुगल सत्ता से राजनीतिक स्वीकृति की तो जरूरत थी, लेकिन बाकी के फैसलों लिए क्षेत्रों के प्रशासक पूरी तरह से स्वतंत्र थे.

पुराने वामपंथी इतिहासकारों की अगर बात करें तो इनमें टॉमस मेटकाफ कहते हैं कि यह फौजी गदर से कुछ अधिक लेकिन जनता के विद्रोह से कुछ कम था. वे इसे पूरा जन विद्रोह इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह विद्रोह उत्तर भारत तक ही सीमित था और इसमें अंग्रेजों से लाभ पाने वालों ने हिस्सा नहीं लिया. इसके विपरीत उन्होंने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की. इनकी संख्या कम नहीं थी.

बंगाली मध्य वर्ग अंग्रेजों का वफादार बना रहा. पंजाबी राजे हिंदुस्तानी सिपाहियों से नफरत करते थे और मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना के विचार मात्र से ही घबराते थे.

इतिहासकार सी ए बेइली का तर्क है कि लड़ने वालों की प्रेरणाओं में भिन्नता थी और अंग्रेज विरोधी किसी खास शिकायत से उनका हमेशा संबंध होता भी नहीं था. अकसर वे खुद एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहते थे. अगर वे अंग्रेजों को हरा भी देते तो बाद में एक दूसरे का गला काटते नजर आते.

लेकिन यह दृष्टिकोण सिर्फ विद्रोह को कुलीन सामंतों के नजरिए से देखता है. हालांकि, बाद में सीए बेली ने इसमें सुधार किया और कहा कि यह देशभक्तों के एक समूह का विद्रोह था.

इतिहासकार रणजीत गुहा लिखते हैं कि आम लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार इसलिए उठाए क्योंकि वे उस क्षेत्र को वापस पाना चाहते थे, जिसे वे अपने पूर्वजों की धरोहर समझते थे. वहीं रजत रे का तर्क है कि जनता विदेशी जुवे से खुद को आजाद कराना चाहती थी और इस विद्रोह में हिंदू-मुस्लिम एकता का असाधारण प्रदर्शन हुआ.

1857 का विद्रोह मात्र धार्मिक कारणों से किया गया विद्रोह नहीं था. सिपाहियों ने केवल एनफील्ड राइफल के कारतूस की वजह से हथियार नहीं उठाए थे. हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके अंदर यह भावना नहीं थी कि अंग्रेज उन्हें भ्रष्ट करके ईसाई बनाना चाहते हैं. ईसाई मिशनरियों ने यह भय पैदा करने के लिए प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी. लेकिन विद्रोह केवल धार्मिक आधार पर ही नहीं हुआ था. आम किसानों ने इस विद्रोह में इसलिए बढ़-चढ़कर भाग लिया था क्योंकि अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने उनका खून चूस लिया था. इन नीतियों से ना केवल किसानों के भोजन की थाली सिकुड़ गई थी बल्कि जल्दी-जल्दी कृत्रिम अकाल भी पैदा हुए थे.

आम लोगों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ वास्तविक गुस्सा था. इसका प्रमाण यह है कि 1857 के पहले ही अंग्रेजों को कई किसान और आदिवासी विद्रोहों का सामना करना पड़ा था.

1857 के विद्रोह में ये जनता का व्यापक समर्थन ही था जिसने ब्रिटिश राज के हिंसा के एकाधिकार को चुनौती दी थी. अगर अंग्रेजों ने विद्रोहियों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर चढ़ाया, तोप से उड़ाया और मनमाने तरीके से गांव के गांव जला दिए तो बदले में विद्रोहियों ने भी प्रतिहिंसा का असाधारण प्रदर्शन किया. विद्रोहियों ने गोरे अफसरों, उनकी पत्नियों और बच्चों का बेरहमी से कत्ल किया. इस अर्थ में कानपुर का 22 जून, 1857 का कत्लेआम सबसे अधिक उग्र था.

यह बात भी सही है कि विद्रोह में कुलीन सामंतों के अपने व्यक्तिगत हित निहित थे. सामंती कुलीनों की प्रमुख शिकायत डलहौजी के विलय के सिद्धांत से थी. इसके तहत मरने वाले राजाओं के दत्तक पुत्रों को कानूनी वारिस का दर्जा नहीं मिलता था और उनके रजवाड़े जब्त कर लिए जाते थे. इसी के तहत सतारा, नागपुर, संभलपुर, उदयपुर और झांसी के रजवाड़े अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिए थे.

अंत में जब 1856 में अंग्रेजों ने अवध को कब्जे में लेकर नवाब को कलकत्ता भेज दिया तो इससे पूरा का पूरा कुलीन तंत्र असुरक्षित हो गया. दूसरी तरफ वो अवध जहां का प्रत्येक किसान परिवार अपने घर से एक आदमी अंग्रेजों की सेना में भेजता था, उन सैनिकों की वफादारी में भी कमी आ गई.

अंग्रेजों की बंगाल रेजिमेंट में ही सिपाही विद्रोह सबसे पहले शुरू हुआ. इसी रेजिमेंट में अवध के सैनिक सर्वाधिक थे. जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा किया तो वे घोर अविश्वास में आ गए. ये सैनिक किसानों के साथ मिल गए और वर्दीधारी किसान कहलाए.

दूसरी तरफ कुलीन सामंत अपने रजवाड़ों को बचाने के लिए लड़े. पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने कानपुर में, बेगम हजरत महल ने लखनऊ में, खान बहादुर खां ने रूहेलखंड में और लक्ष्मी बाई ने झांसी में मोर्चा संभाला. लेकिन कई रजवाड़े अंग्रेजों के वफादार बने रहे क्योंकि अंग्रेज उनके हितों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे थे. इनमें इंदौर, ग्वालियर, सागर और राजस्थान के कुछ रजवाड़े प्रमुख थे.

ठीक यही हाल ताल्लुकदारों का था. जिनके हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा, वे वफादार बने रहे और बाकी के विद्रोह में शामिल हो गए.

कुल मिलाकर यह विद्रोह सावरकर के अनुसार केवल स्वधर्म की रक्षा के लिए स्वाधीनता की प्रथम लड़ाई नहीं था. यह अंग्रेजी पूंजीवादी शोषण के खिलाफ आम जन का विद्रोह था, जो वृहत्तर आर्थिक-सामाजिक आजादी के लिए लड़ा गया.

इस विद्रोह को अंग्रेजों ने कुचल तो दिया लेकिन इसने कंपनी के शासन को भी समाप्त कर दिया. विद्रोह के बाद राज ब्रिटेन की महारानी के नियंत्रण में आ गया.

यहीं से विक्टोरियाई उदारवाद का कंजरवेटिव रूप सामने आया. विक्टोरियाई उदारवाद मानता था कि असभ्यों को सभ्य बनाया जा सकता है, बस उन्हें शासन व्यवस्था में स्थान देना पड़ेगा. लेकिन इस विद्रोह के बाद भारतीयों को कभी ना सुधरने वाली जाति माना जाने लगा. अंग्रेजों का नस्लीय भेदभाव बहुत बढ़ गया. वे भारतीयों को अत्यधिक हीन मानने लगे. उन्होंने पढ़े-लिखे मध्य वर्गीय भारतीयों को शासन व्यवस्था में जगह नहीं दी. पढ़े-लिखे मध्य वर्गीय भारतीयों की इसी कुंठा ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में राष्ट्रवाद को जन्म दिया.