और अब लॉकडाउन-3

article on lockdown three

 

इंतजार की घडिय़ां खत्म हुईं. लॉकडॉउन-1 और लॉकडॉउन-2 की अपार सफलता के बाद, अब आ रहा है, लॉकडॉउन-3. आपको हंसाने, आप को रुलाने, आंसू पोंछने के लिए रूमाल आपके मुंह पर ही बंधवाने, मुफ्त में डाइटिंग-फाइटिंग के गुर सिखाने आ रहा है, लॉकडॉउन-3. आपके मोहल्ले में, शहर में, गांव में, 4 मई से लग रहा है, लॉकडॉउन-3. देखना, हर्गिज मत भूलिएगा. देखना, कल पर मत टालिएगा. लॉकडॉउन में नॉकडॉउन कौन, यह जानने का मौका हाथ से जाने मत दीजिएगा. सिर्फ दो हफ्ते के लिमिटेड रिलीज में अवश्य देखिए–लॉकडॉउन-3.

देखिए, देखिए, यह मत सोचिएगा कि बहुत देख लिया, लॉकडॉउन. जो लॉकडॉउन-1 से नहीं हुआ, लॉकडॉउन-2 से नहीं हुआ, लॉकडॉउन-3 से ही क्यों हो जाएगा? जो एक में नहीं था, दो में नहीं था, ऐसा लॉकडॉउन-3 ही क्या दिखाएगा? ऐसी नेगेटिव सोच अच्छी नहीं है. ऐसा बहुत कुछ है, जो लॉकडॉउन-1 तो क्या लॉकडॉउन-2 में भी नहीं था, पर लॉकडॉउन-3 में है. जरा याद कीजिए, कैसे लॉकडॉउन-1 की गाला ओपनिंग, आकाशभेदी थाली-घंटानाद के साथ हुई थी. और बीच में आया था, बिजली के अंधेरे की बैकग्राउंड में दिया-बत्ती करने का प्रोग्राम. सुना है कि नासा वालों ने अंतरिक्ष के अपने सैटेलाइटों से दमकते हुए इंडिया की तस्वीरें भी खींची थी, लेकिन मोदी जी ने तस्वीरें वाइरल कराने से मना कर दिया. दोस्त ट्रम्प के अमरीका में कोरोना के मातम के टैम में, इंडिया का दमकना कैसा लगता? ऊपर से वहां चुनाव भी हैं. अगर अमरीकियों ने इंडिया की तरह दमकने के लालच में ‘‘वी वांट मोदी’’, ‘‘वी वांट मोदी’’ की मांग करना शुरू कर दिया तो? और अब. लॉकडॉउन-2 का पटाक्षेप भी हो रहा है, तो तीनों सेनाओं की सलामी के साथ. कोई समुद्र से जहाज का भोंपू सुनाएगा, तो कोई हवा में से फूल बरसाएगा और कोई अस्पतालों में जाकर फौजी बैंड बजाएगा. इस धूम से कोरोना की मैयत नहीं उठती न सही, काश इस धूम से लॉकडॉउन का पर्दा ही गिर जाता.

खैर, अब लॉकडॉउन-3 को देखिए. एकदम सिंपल. सैकड़ों फिल्मों की सफेद साड़ी वाली विधवा मां, निरूपा राय की तरह सिंपल. न कोई कोई घंटानाद, न कोई प्रकाशाघात. कोई फौजी सलामी-बाजा भी नहीं. सलामी की छोडि़ए, पीएम के मुखारविंद से एनाउंसमेंट तक नहीं. न राष्ट्र के नाम मोदी जी का कोई संबोधन और न कोई वीडियो संदेश. यहां तक कि उनके ‘मन की बात’ भी नहीं. पहले आने वालों से इतना अलग कि लोगों को तो शक हो रहा है कि यह वाकई लॉकडॉउन-3 है भी या नहीं? लॉकडॉउन के भेस में कुछ और तो नहीं है, मंदी या तनाशाही वगैरह. और शक तो होगा ही होगा. कहने को तो लॉकडॉउन है, पर अंदर-अंदर लॉकडॉउन नहीं भी है. ग्रीन जोन में बस कहने भर को लॉकडॉउन है, जैसे संसद में विपक्ष है या देश में डेमोक्रेसी है. है भी और नहीं भी है. इंसानों के लिए रेल, बस, हवाई जहाज, स्कूल-कालेज, मॉल-बाजार को छोडक़र, किसी का लॉकडॉउन नहीं है. ओरेंज जोन में तो उससे भी कुछ ज्यादा लॉकडॉउन है और कुछ कम लॉक-ओपन. बड़े धंधे जरूर से जरूर ओपन. पैसेंजर ठप्प, पर मालों की आवाजाही ओपन. कम मजदूरों से ज्यादा ज्यादा निचोड़ाई ओपन. पुलिस की डंडा फटकाराई तो खैर सुपर-ओपन.

और हां! मरते-खपते, पैदल नहीं तो साइकिल पर क्वारेंन्टीन भुगतते, चालीस दिन में भी घर नहीं लौट पाए, मजूरों-वजूरों की ‘घर वापसी’ को तो कोई भूल ही कैसे सकता है? देर से हुई, सौ-पचास के रास्ते में टें बोलने के बाद हुई, पर ‘घर वापसी’ आखिर होकर रही. कैसे नहीं होती, घर वापसी सांस्कृतिक एजेंडे में है. अब चार पैसे ज्यादा लग भी रहे हैं तो क्या हुआ, फटी जेबों के लिए इंतजाम मुश्किल हुआ तो क्या हुआ, बस-ट्रेन से आराम से जा भी तो रहे हैं. सच पूछिए तो चार पैसे भी ज्यादा इसलिए लिए जा रहे हैं कि बाद में विपक्ष वाले कहीं बेचारी सरकार पर भेदभाव का इल्जाम न लगाने लगें. मांग ज्यादा हो और सप्लाई कम तो हवाई जहाज की टिकट के दाम बढ़ जाते हैं, तो स्पेशल ट्रेन-बस के टिकट के दाम में बढ़ोतरी क्यों नहीं की? पब्लिक-पब्लिक में भेदभाव क्यों? सरकार ने टंटा ही काट दिया. पब्लिक के बीच समदर्शिता भी और सरकार के खाली खजाने में चार पैसे फालतू भी. इस तंगी के टैम में तो पैसा-पैसा कीमती है.

फिर पीपीई वगैरह के बिना तो काम चल भी जाए, पर पीएम जी, राष्ट्रपति जी के लिए नये हवाई जहाज भी तो खरीदने हैं, उनके विज्ञापन वगैरह भी तो देने हैं. और सबसे इम्पोर्टेंट नयी संसद, नया प्रधानमंत्री आवास वगैरह भी तो बनाने हैं. उसके 20 हजार करोड़ में से, दो-चार करोड़ तो मजूरों से एक्स्ट्रा वसूली से जमा होंगे. इन मामलों में जरूरत का सवाल कोई नहीं उठाएगा. आखिर, देश की इज्जत का सवाल है. 56इंच की छाती वाली सरकार और संसद इतनी छोटी? मोदी जी समेत बहुत से सांसद तो इसीलिए ज्यादातर टैम देश-विदेश के दौरे पर रहते हैं कि संसद में बैठने के लिए जगह ही नहीं है. सांसद जी खड़े रह सकते भी हैं तो कितनी देर. भीतर की बात यह है कि संसद के छोटेपन के संकोच से ही मोदी जी ने अब तक एक बार भी ट्रम्प जी को संसद में बोलने का न्यौता नहीं दिया है. न्यौता तो दे दें, पर मेहमान को बैठाएंगे कहां? चुनाव हों न हों, पर संसद तो बड़ी चाहिए ही चाहिए. और पीएम का घर, वह तो है ही नहीं. बेचारे मोदी जी कब तक किराए के घर में गुजारा करें. संसद तो चाहे पुरानी भी चल जाती पर पीएम का घर तो नया चाहिए ही चाहिए. और आजादी की पचहत्तरवीं सालगिरह पर उद्घाटन के लिए तैयार चाहिए. कोर्ट ने रोक लगाने से मना कर दिया है. संसदीय समितियों ने मोहर लगा दी है. अब भी जो सवाल उठाएगा, सेडीशन में अंदर जाएगा. यह सरकार न लटकाती है, न अटकाती है, न टालती है, वह तो कर डालती है. लॉकडॉउन-3 में और कुछ नहीं तो कम से कम श्रीगणेश ही हो जाए.

और लॉकडॉउन-3 की मिस्ट्री को कोई कैसे मिस कर सकता है. एक नहीं कई-कई मिस्ट्रियां हैं. पर बताकर हम पब्लिक का मजा खराब नहीं करेंगे. फिर भी एकाध क्लू तो दे ही दें. मोदी जी, पीएम केअर्स में यहां से वहां से हर जगह से पैसा इकट्ठा तो कर रहे हैं, लेकिन लॉकडॉउन-2 खत्म हुआ पर, एक पैसा खर्च करने का जिक्र नहीं आया. क्या लॉकडॉउन-3 में पीएम जी किसी की केअर कर के दिखाएंगे? या लॉकडॉउन-3 के बाद ये पैसे पीएम की ही केअर में जाएंगे? और यह भी कि क्या मोदी जी लॉकडॉउन-3 पर बस कर जाएंगे या लॉकडॉउन-4 वगैरह भी बनाएंगे? मिस्ट्रियां और भी बहुत हैं. देखना हर्गिज न भूलें–लॉकडॉउन-3.


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Arun Pandiyan Sundaram

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