ब्रिटेन ने अपने लिए कैसा भविष्य चुना?

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ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स (संसद के निचले सदन) के चुनाव नतीजों से यह साफ है कि इंग्लैंड के मतदाताओं के लिए ब्रेग्जिट (यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का अलग होना) सर्वोपरि प्राथमिकता है. अतः उन्होंने इसका दो-टूक वादा करने वाले प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और उनकी कंजरवेटिव पार्टी को स्पष्ट जनादेश दिया. लेबर पार्टी के नेता जेरमी कॉर्बिन ने अपने सोशलिस्ट प्रोग्राम से समाज की पुनर्रचना का जो एजेंडा देश के सामने रखा था, वह लेबर पार्टी के अपने समर्थक समूहों को भी पसंद नहीं आया. यानी पब्लिक सेक्टर के बड़े विस्तार, ग्रीन इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के पुनर्जीवन, मुफ्त शिक्षा आदि के ऊपर मतदाताओं ने ब्रेग्जिट को प्राथमिकता दी.

फौरी विश्लेषण में अनेक जानकारों ने उचित ही कहा है कि ये चुनाव असल में ब्रेग्जिट के मुद्दे पर हुआ दूसरा जनमत संग्रह साबित हुआ है. पहला जनमत संग्रह 2016 में हुआ था. लेकिन उसके साढ़े तीन साल गुजर जाने के बावजूद अब तक ये लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है. वजह पूर्व थेरिजा मे सरकार का यूरोपीय संघ से बेहतर करार के साथ ऐसा करने का प्रयास था. पहले लेबर पार्टी और बेहतर करार के साथ ऐसा करने के पक्ष में थी. लेकिन इस चुनाव में उसने इस सवाल पर दोबारा जनमत संग्रह कराने का वादा कर दिया. दूसरी तरफ बोरिस जॉनसन डील या नो-डील तय समयसीमा के भीतर ऐसा करने के वादे के साथ चुनाव में गए. अब साफ है कि यह वादा बाकी सब बातों पर भारी पड़ा. उत्तरी इंग्लैंड में इस वादे का सबसे ज्यादा जादू देखने को मिला, जिसे तकरीबन एक सदी से लेबर पार्टी का गढ़ समझा जाता था. यहां लेबर पार्टी के पांव उखड़ गए. कंजरवेटिव को यहां से उतनी सीटें मिलीं कि एक भव्य विजय नसीब हो गई.

इससे बेशक ब्रेग्जिट को लेकर जारी अनिश्चितता का अंत हो जाएगा. लेकिन इससे यह समझ लेना कि ब्रिटेन अब निश्चिंत हो गया है, बड़ी भूल होगी. दरअसल, अब अनिश्चिय खुद ब्रिटेन के भविष्य को लेकर पैदा हो गया है. गौरतलब है कि इंग्लैंड के अलावा ब्रिटेन के बाकी तीन हिस्सों- स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और वेल्स में ब्रेग्जिट लोकप्रिय मांग नहीं है. बल्कि स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरैंड में तो इसके खिलाफ भावना है. 2014 में स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर जनमत संग्रह हुआ था. तब आजादी समर्थक हार गए थे. लेकिन ब्रेग्जिट का एजेंडा सामने आते ही वहां फिर ये मांग प्रबल हो गई. स्कॉटलैंड के राष्ट्रवादियों का कहना रहा है कि वे तभी तक ब्रिटेन के साथ हैं, जब तक ब्रिटेन यूरोपीय संघ की उदारवादी और प्रगतिशील परियोजना के साथ है. अगर ब्रिटेन उससे अलग होता है, तो वे फिर आजादी के सवाल पर जनमत संग्रह कराना चाहेंगे.

उधर उत्तरी आयरलैंड में एक बार फिर से आयरलैंड के साथ इस इलाके के विलय की चर्चा शुरू हो गई है. उत्तरी आयरलैंड में हिंसा का लंबा इतिहास है और 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के बाद से वहां आई शांति भी अस्थिर ही रही है. वेल्स में आजादी की मांग ज्यादा प्रबल नहीं है. इसलिए अब बहुत से समीक्षक मानते हैं कि आने वाले वर्षों या दशकों में ब्रिटेन की सीमाएं महज इंग्लैंड और वेल्स तक सीमित हो सकती हैं. ऐसी संभावनाएं अब ज्यादा मजबूत हो गई हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की पहचान एक कल्याणकारी राज्य के रूप में रही. प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली के जमाने में एनएचएस (राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा) की नींव डाली गई थी. उसके बाद 1979 में मार्गरेट थैचर के सत्ता में आने तक ब्रिटेन कल्याणकारी राज्य और मजदूर हितों वाली नीतियों पर चलता रहा. गुजरे 40 साल धुर नव-उदारवाद के रहे हैं, जिससे ब्रिटेन में गरीबी और गैर-बराबरी बढ़ी है. ब्रेग्जिट समर्थकों ने इसी से पैदा हुई नाराजगी का फायदा उठाया. उन्होंने बीमारी की सही पहचान करने के बजाय यह बताया कि ये हाल ब्रिटेन आकर बसे विदेशियों के कारण हुआ है. मुस्लिम आव्रजकों को सुरक्षा के लिए खतरे के तौर पर पेश किया गया. प्रचारित किया गया कि ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि यूरोपीय संघ की उदारवादी नीतियों के तहत विदेशियों को आने से रोकना संभव नहीं था. तो मांग उठी कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो जाए. 2016 में इस मांग पर जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ब्रेग्जिट के पक्ष में तकरीबन 10 लाख अधिक लोगों ने मतदान किया. यानी यूरोपी संघ में रहने के इच्छुक लोग लगभग दस लाख वोटों से हार गए.

2017 में जब मध्यावधि चुनाव हुए तो जेरमी कॉर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने जनमत संग्रह के नतीजे का सम्मान करने की बात कही थी. तब कॉर्बिन ने सबको हैरत में डालते हुए कंजरवेटिव पार्टी को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया था. मगर पार्टी के भीतर खींचतान और कॉर्बिन विरोधियों के दबाव के कारण इस बार पार्टी ने ब्रेग्जिट के सवाल पर साफ रुख नहीं अपनाया. कहा कि सत्ता में आने पर वह छह महीनों के अंदर दोबारा जनमत संग्रह कराएगी. यह बात श्रमिक वर्ग के उन लोगों को पसंद नहीं आई, जो वैसे तो लेबर पार्टी का समर्थन आधार थे, मगर जिनके मन में ये बात बैठा दी गई है कि विदेशियों के कारण वे बदहाल होते गए हैं. यानी ब्रेग्जिट उनकी स्थिति सुधारने का पहला कदम है. तो इस बार वे लेबर पार्टी से अलग हो गए. नतीजा सामने है.

लेबर पार्टी अब कहीं ज्यादा बड़े अनिश्चिय में होगी. जेरमी कॉर्बिन नेता पद छोड़ने का एलान कर चुके हैं. मगर क्या कॉर्बिन-वाद का भी अंत हो जाएगा? कॉर्बिन के नेतृत्व में लाखों युवा पार्टी के सदस्य बने हैं. उन्हीं के बल पर कॉर्बिन समाजवादी एजेंडे की तरफ फिर से पार्टी को लौटाने में सफल रहे थे. लेकिन पार्टी के मध्यमार्गी धड़े ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया. मेनस्ट्रीम मीडिया भी इससे खफा रहा. अब सवाल है कि क्या लेबर पार्टी फिर से टोनी ब्लेयरवादी नीतियों को अपनाएगी, जो उसकी और ब्रिटेन की आज की मुसीबत की एक बड़ी वजह हैं? या कॉर्बिन-वाद कॉर्बिन से भी बड़ी शक्ति साबित होगा?

ये तमाम अनिश्चितताएं ये चुनाव छोड़ गया है. फिलहाल, यही कहा जा सकता है कि 2019 के ब्रिटिश आम चुनाव ने एक अनिश्चिय को खत्म कर ब्रिटेन को बहुत-सी दूसरी अनिश्चितताओं में धकेल दिया है.


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