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‘डूबे हुए पटना’ के अवसान का सिलसिला जारी है

article on historicity of flooded patna

 

पटना जलमग्न है. सड़कों पर नावें चल रही हैं. पिछले कुछ दिनों में हुई बारिश ने आफत और मुसीबत के एक ऐसे अनुभव से शहर का परिचय कराया है, जो अनदेखा तो नहीं था लेकिन उसकी अपेक्षा शहर के लोगों को नहीं थी.

पटना के 2500 साल के इतिहास में ना जाते हुए सिर्फ वर्तमान और पिछली सदी की बात करते हैं. 1912 से पटना राजधानी है. राजधानी की ऐसी दशा? इन पंक्तियों के लेखक ने 1980 और 90 का दशक पटना में ही गुजारा है और हर साल बारिश के मौसम में कभी घुटनों और कभी कमर तक जमा पानी में सड़कों पर आवाजाही की है. लेकिन आज जो स्थिति दिखाई दे रही है, वो उससे भी भयावह है. ऐसा लगता है कि राजधानी में रहने की विशिष्टता का बोध भी नागरिकों से छीन लिया गया है.

इस पूरी बात को सिर्फ यह कहकर सिरे से खारिज किया जा सकता है कि जलजमाव की यह स्थिति मुंबई, चेन्न्ई जैसे शहरों में भी देखी जाती है. लेकिन क्या यह सही तर्क होगा?

क्या ‘डूबे हुए पटना’ के इस दृश्य को सिर्फ प्राकृतिक परिस्थिति के तर्क से समझा जा सकता है? क्या इस ‘डूबने’ का कोई सिरा पटना (इसे बिहार भी पढ़ सकते हैं) की राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक संस्कृति से जुड़ा है? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये ‘डूबना’ उतना नया है जितना ये दिखाई दे रहा है या इसकी एक लंबी प्रक्रिया रही है?

पटना के पास इन सवालों का जवाब है, लेकिन पटना के पास ये सवाल नहीं हैं. पटना की बहुसंख्यक आबादी और राजनीतिक वर्ग अपने शहर की ऐतिहासिकता के गर्व से मुक्त है. शहर की विरासत से उसका कोई जीवंत रिश्ता नहीं है. कहा तो यह भी जा सकता है कि जीवित विरासत में उसका यकीन भी नहीं है.

लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था. इतिहासकार आनंद यांग ने अपनी किताब ‘बाजार इंडिया’ में एक बेहद दिलचस्प दृष्टि के साथ पटना का अध्ययन किया है. यह किताब पाटलीपुत्र के पटना बनने, फिर उसके अजीमाबाद होने और एक बार फिर पटना में रूपांतरित होने की कहानी के साथ-साथ उसके असमान विकास की कहानी भी कहती है. आज जो पटना है, उसमें पुराना पटना, अंग्रेजों का बसाया बांकीपुर और नया पटना शामिल है. यांग के अध्ययन से एक बहुत बड़े क्षेत्र में पटना की केंद्रीयता का पता चलता है. वे तो पटना के अवसान के तर्क से भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं. वे मानते हैं कि पटना निरंतर प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र बना रहा और आर्थिक मोर्चे पर बड़ी विफलता के बावजूद खंडहर हो चुके शहर में पटना तब्दील नहीं हुआ.

लेकिन पटना एक सहज और सुविधाजनक शहर के औपनिवेशिक विचार का शायद कभी हिस्सा नहीं हो पाया. बुकानन हैमिल्टन ने 1812 में पटना का दौरा किया था. उनके अनुसार, “शहर के अंदर का हिस्सा घृणास्पद है और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. दूर से देखने पर यह पिद्दी सा लगता है.”

1882 की ‘मरे हैंडबुक टू बंगाल’ ने यात्रियों को यहां तक चेतावनी दे दी कि वे ट्रेन से सफर करते वक्त पटना में न उतरें, क्योंकि वो यूरोपीय लोगों के लिए जाने लायक जगह नहीं है. इन संदर्भों को देखते हुए आनंद यांग की इस बात में दम लगता है कि अंग्रेजों का पटना के साथ बोझिल सा अप्रेम का रिश्ता था.

पटना को लेकर लंबे समय से मौजूद इस समझ के बावजूद उसकी जरूरत, ताकत और लोकप्रियता लगातार बनी रही है. लेखक अमितावा कुमार ने ये नोट किया है कि अरुंधती रॉय के ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ में पटना का जिक्र है. अनीता देसाई की किताब ‘फास्टिंग, फिस्टिंग’ में भी पटना पांचवें पन्ने पर ही आ जाता है. विक्रम सेठ के ‘ए सूटेबल ब्वॉय’ में पटना एक ऐसी जगह के रूप में चित्रित है जहां महत्वपूर्ण घटनाएं हो रही हैं. सलमान रश्दी की ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ में पटना के चावल की चर्चा है.

लेकिन यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि पटना के अवसान की प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी, हालांकि उसका सकारात्मक समानांतर रचने का सिलसिला भी जारी रहा है. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में इस उद्देश्य से काफी प्रयास हुए. पृथक बिहार राज्य की मांग और उसकी चालक शक्ति के रूप में पटना में प्रिंट संस्कृति का जबरदस्त उभार इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी हैं.

पटना में एक उन्नत बौद्धिक संस्कृति और पब्लिक स्फेयर का निर्माण हो रहा था और आज पटना के वर्तमान को देखकर कतई यह भरोसा नहीं होता कि यह उस बौद्धिक संस्कृति का प्रतिफल है. निश्चित रूप से कहीं कोई कमजोर सिरा बचा रह गया था, जिसकी शिनाख्त जरूरी है. नहीं तो हमारी सामाजिक संस्कृति के उत्पाद के रूप में विकसित हुई गैर-जवाबदेह राजनीतिक संस्कृति और उसके प्रति प्रतिबद्ध नागरिक संस्कृति की चुनौतियों से हम मुकाबला नहीं कर पाएंगे.