सुर्ख़ियां


मीडिया ने जो Echo Chamber बनाया है

article on eco chamber of indian media

 

“यह तीखी प्रतिस्पर्धा से भरी ऐसी दुनिया है जिसमें सफल होने के लिए लोग एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने को तत्पर हैं. डॉनल्ड ट्रंप, शी जिनपिन, व्लादीमीर पुतिन और उनकी नकल करने वाले ‘स्ट्रॉन्गमैन’ नेताओं ने यही दुनिया निर्मित की है.

यह नियम-विहीन दुनिया है, जिसमें अब कायदे लागू नहीं होते, जहां समझौतों और संधियों की अवहेलना की जाती है या उन्हें फाड़ कर फेंक दिया जाता है, जहां राष्ट्र स्वार्थ में अंधे हो गए हैं, और जहां अल्पसंख्यकों का मखौल उड़ाया जाता है, उन्हें उपेक्षित और शोषित किया जाता है.” ये लाइनें संविधान के अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर संबंधी भारत सरकार के हालिया फैसले पर संपादकीय टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश अखबार ऑब्जर्वर/गार्जियन ने लिखी हैं. साफ है, ये अखबार इस कदम पर विश्व समुदाय की निष्प्रभावी प्रतिक्रिया से मायूस और नाराज है.

ये संपादकीय टिप्पणी इस बात का भी प्रमाण है कि जम्मू-कश्मीर संबंधी भारत सरकार के हालिया फैसले पर दुनिया के शक्तिशाली देशों की प्रतिक्रिया दबे स्वर में ही सामने आई. बहरहाल, ये टिप्पणी इस बात का भी संकेत है कि (चीन के अलावा) विभिन्न देशों ने भले अपने मतलब से मतलब रखा, परंतु दुनिया के विवेकशील जनमत ने इस घटनाक्रम को अलग ढंग से देखा है. दुनिया के प्रमुख अंग्रेजी अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों के कश्मीर संबंधी कवरेज पर गौर करें, तो यह बात और साफ हो जाती है.

दरअसल, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के ऐसे कवरेज की तुलना में भारतीय मीडिया (खासकर टीवी न्यूज चैनलों) पर हो रही रिपोर्टिंग/चर्चा पर ध्यान दें, तो एक विरोधाभास का अहसास होता है. असल में इनसे अंतर्विरोधी तस्वीर उभरती है. भारत में भी कुछ अंग्रेजी अखबार और वेबसाइटें भी जो कहानी बता रही हैं, वो बाकी मेनस्ट्रीम मीडिया पर बताई जाने वाली सूरत से बिल्कुल अलग है. फिलहाल हकीकत यह है कि समाज में गहरे ध्रुवीकरण के बीच अलग-अलग समूहों ने अपनी मनमाफिक कहानी चुन ली है.

बहरहाल, यहां गौरतलब यह है कि भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया से सूचना प्राप्त करने वाले लोग कश्मीर के बारे में जो नैरेटिव देख-सुन रहे हैं, बाकी दुनिया उससे अलग कहानी देख-सुन रही है. जाहिर है, जैसा कथानक देखा या सुना जाता है, लोग वैसी ही राय भी बना लेते हैं. इसलिए संभव है कि भारतीय जनमत का बड़ा हिस्सा जीत-हार के जिस नैरेटिव में यकीन कर रहा हो, बाकी दुनिया वैसी ना मानती हो.

यह भी मुमकिन है कि कहानी के इस फर्क से फिलहाल कोई खास फर्क ना पड़े. जैसा कि ऑब्जर्वर ने कहा है कि स्ट्रॉन्गमैन नेताओं के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय नियमों, संधियों, मानवाधिकार आदि को लेकर वैश्विक सहमति बिखर गई है. इसलिए कोई देश या अंतरराष्ट्रीय संस्था किसी देश को कठघरे में खड़ा करने की स्थिति में नहीं है. दरअसल, आज कहीं ऐसी इच्छा या इच्छाशक्ति भी दिखाई नहीं देती. लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है.

असली सवाल न्यूज मीडिया से आने वाली सूचना की विश्वसनीयता और उसके परिणाम का है. बुनियादी सवाल यह है कि न्यूज मीडिया को अपने पाठक/दर्शक/श्रोता को कैसी सूचना देनी चाहिए? क्या ऐसी सूचना इस रूप में दी जानी चाहिए, जिससे सही तस्वीर सामने ना आए? क्या न्यूज मीडिया को किसी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा बनना चाहिए?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज के दौर में इन सवालों पर भारतीय न्यूज मीडिया का बड़ा हिस्सा कठघरे में खड़ा दिखता है. एक तरफ सोशल मीडिया ने समाज के संवाद को बदल दिया है. इसका सबसे नुकसानदेह रूप अपुष्ट या शरारतपूर्ण सूचनाओं का बेरोक प्रवाह है. फिर सोशल मीडिया का सियासी मकसदों से संगठित इस्तेमाल हो रहा है. इसका उद्देश्य है अपने अनुकूल जनमत का निर्माण और उसे लगातार पुख्ता करते जाना. अगर मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भी इस मकसद में सहभागी बन जाए, तो समाज में सूचना की बनने वाली स्थिति का अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है. इसी परिघटना ने वह सूरत बनाई है, जिसे post truth कहा गया है. post truth से मतलब उस स्थिति से है, जब सच राजनीतिक जनमत बनाने में अप्रसांगिक हो जाए.

तो धारणा यह बनी है कि आज असत्य के आधार पर सियासी जनमत बन रहे हैं. इसके जरिए सत्ता में आने वाले नेताओं की स्वाभाविक प्रवृत्ति नैरेटिव को नियंत्रित किए रहने में रहती है. इसके जरिए वे असत्य या अप्रसांगिक कथानक समाज में फैलाते हैं. मगर भले इससे ऐसी सियासी ताकतों को कामयाबी मिल रही हो, इसका अंतिम परिणाम समाज और आमजन के लिए हानिकारक होगा. इसलिए कि सच छिपाने या उसे ना बोलने से सच बदल नहीं जाता. ना ही उसके परिणाम टल जाते हैं.

मुद्दा यह है कि क्या भारत के ज्यादातर मीडिया घराने देश की जनता को सच नहीं बता रहे हैं? ऐसा नहीं हो रहा है- ये धारणा गुजरे वर्षों में लगातार गहराती गई है. जब कभी अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने जैसी बड़ी घटना होती है, तब इसका अहसास नए सिरे से और अधिक शिद्दत से होता है. तब ऐसा महसूस होता है कि भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया देश में एक Echo Chamber में तब्दील करने का माध्यम बन गया है।

इको चैंबर से मतलब ऐसे माहौल से है, जिसमें लोगों के ऊपर एक ही विश्वास, पूर्वाग्रह या विचार लगातार थोपे जाते हैं. स्वाभाविक है कि तब लोग अपने राजनीतिक रुख या फैसले थोपे जा रहे विचार/पूर्वाग्रह/विचार से प्रभावित होकर लेते हैं. न्यूज मीडिया की इस प्रवृत्ति के कारण लोग वैकल्पिक नजरिये से वंचित रह जाते हैं. इससे लोग ऐसे बहुत से तथ्यों से नावाकिफ रह जाते हैं, जिन्हें जानना खुद उनके हित में जरूरी होता है. नतीजतन, लोग नाजानकारी में ऐसे फैसले लेने लगते हैं, जिनके परिणाम अंततः खुद उनको भी भुगतने होंगे.

मसलन, अगर आम जन हित की बात करें, तो इस वक्त भारत का प्रमुख नैरेटिव देश की आर्थिक स्थिति से संबंधित होना चाहिए. सभी आर्थिक संकेतक बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त गहरे संकट में है. मांग और उपभोग में गिरावट का अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है. निवेश की स्थितियां प्रतिकूल हैं. बढ़ती बेरोजगारी और घटती आमदनी एक दीर्घकालिक संकट का रूप ले रही है. लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के बड़े हिस्से के लिए यह खबर नहीं है.

बरसों से उसके कवरेज में हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, अनुच्छेद 370 जैसे भावनात्मक मुद्दे हावी रहे हैं. इससे एक इको चैंबर बना है, जिसमें रहने वाले लोग अपने सामने मौजूद असली चुनौतियों और मुसीबतों से नावाकिफ मालूम पड़ते हैं. तो इसी तरह जम्मू-कश्मीर के मामले में लिए गए ताजा सरकारी फैसलों ने इको चैंबर में एक सुखबोध पैदा किया है. जबकि इन फैसलों के गंभीर दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. मगर इको चैंबर के बाशिंदों से अगर इन संभावित परिणामों की चर्चा की जाए, तो मुमकिन है कि वे इसे राष्ट्र-द्रोह मानें! यही आज की संभवतः सबसे बड़ी विडंबना है.