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पूरी तरह से बदल गए हैं बैंक

article on changing nature of banks

 

दोस्त, दोस्त ना रहा… प्यार, प्यार ना रहा की तर्ज पर अब बैंक भी पहले वाले बैंक नहीं रहे हैं. पहले बैंकों में पैसा जमा कराना मतलब अपने लिए सामाजिक सुरक्षा हासिल करना था, जो अब दिन पर दिन कम होते जा रहे हैं. उल्टी नीतियों को इस तरह से अमलीजामा पहनाया जा रहा है कि लोग बैंकों में पैसा जमा रखने के बजाये उसे शेयर बाजार में निवेश करने की ओर बढ़ रहे हैं. किसी सयाने ने एक बार कहा था जहां से मानव समाज में बाजार की उत्पत्ति होती है, वहीं पर मानवता ने दम तोड़ दिया है.

समाचार-पत्रों के हवाले से खबर है कि अब बुजुर्गों की बचत में सेंध की तैयारी है. इसकी पुष्टि स्टेट बैंक की हालिया रिसर्च भी करती है.

स्टेट बैंक की रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि देश में बुजुर्गों के बैंक में करीब 14 लाख करोड़ रुपये जमा हैं, जो हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर है. 24 सितंबर 2019 को जारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की Ecowrap में कहा गया है कि “With the introduction of external benchmark linked lending rates, the stage is now set for an instantaneous transmission of a change in repo rate to lending rates.” अर्थात् रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट घटाने से बैंकों द्वारा दिया जा रहा ब्याज भी घटाया जाएगा. नये फॉर्मूले के अनुसार रिजर्व बैंक जैसे ही बैंकों के लिये अपने लोन रेट को घटाएगा बाकी बैंकों को भी तत्काल ब्याज दर बदलनी होगी.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि “Since data for size wise term deposits of senior citizens is not available, we estimated the number of senior citizens term deposits accounts and amount. Our estimate suggests that there are around 41 million senior citizens term deposits accounts in the country with total deposit of Rs 14 lakh crores. Out of such 41 million accounts, almost 38 million accounts are in the size of Rs 25,000 to Rs 15 lakh. The average deposits size per account is around Rs 3.3 lakh. Assuming 7% per annum interest rate, the interest amount comes out to be Rs 24,000 per annum (or Rs 2,000 per month only). In the backdrop of low level of social security in India and declining interest rate situation, this is a pertinent question that how we can protect the interest of such citizens.”

उल्लेखनीय है कि हाल ही में रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती की है. इससे रेपो रेट 5.15 फीसदी रह गई है. रेपो रेट उसे कहते हैं जिस दर पर रिजर्व बैंक, बैंकों को कर्ज देता है. इस कटौती से बैंकों का कर्ज और सस्ता होने की उम्मीद है. जिससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन सस्ता होगा. लेकिन हम तोप से गोले दागे जाने की बात नहीं कर रहे हैं, हम तोप के गोले से मचने वाली तबाही की बात कर रहे हैं.

हिन्दी के एक समाचारपत्र की खबर में कहा गया है “….इसीलिये, अगर आप निवेश के लिए एफडी करने पर विचार कर रहें हैं तो इसके बजाये दूसरे साधनों पर विचार करना आपके लिये बेहतर होगा.” यही वह मुद्दा है जिसे हम प्रस्थान बिंदु मानकर आगे बढ़ते हैं. सीधे-सीधे तौर पर जनता को बैंकों में धन जमा रखने के लिये हतोत्साहित किया जा रहा है तथा प्रोत्साहित किया जा रहा है कि शेयर बाजार में निवेश करें.

शेयर बाजार वह बाजार है जहां रोज ब रोज लोग लुटते हैं. वैसे पिछले तीन दशकों से यह खेल चल रहा है. जब से वैश्वीकरण-निजीकरण और खुलेपन की बयार ने बहना शुरू किया है देशज अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश पर निर्भर होती चली जा रही हैं. बता दें कि विदेशी अत्यंत तरल तथा अति चंचल होता है. जैसे ही किसी देश की सरकार ब्याज की दर कम करती है तो यह आना शुरू कर देती है तथा ब्याज की दर बढ़ाने से तुरंत ही दूसरे देश की ओर कूच कर जाती है.

यह सबको मालूम है कि पहले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 5 साल से ज्यादा के लिये फिक्स डिपॉजिट रखने पर ब्याज इतना मिलता था कि उससे भरण-पोषण हो जाता था. खासकर अवकाश प्राप्ति के बाद यदि किसी को पीएफ और ग्रेच्युटी मिलाकर 10 लाख रुपये भी मिल जाते थे तो उसे बैंक में फिक्स करा देने से साल में 13 फीसदी के हिसाब से 1 लाख 30 हजार रुपये तक यानी महीने में 10 हजार रुपये से ज्यादा मिल जाता था. यह बात साल 1995-96 की है. उसके बाद से लगातार बैंकों में फिक्स डिपाजिट को हतोत्साहित करने के लिये ब्याज देना कम किया जाता रहा. मसलन 2000-01 में यह घटाकर 9.50-10 फीसदी का तथा 2005-06 में यह ब्याज और घटकर 6.25-7 फीसदी हो गया. हालांकि 2010-11 में इसे बढ़ाकर 7-7.50 फीसदी कर दिया गया.

वर्तमान में सीनियर सिटीजन्स सेविंग स्कीम के तहत 15 लाख रुपये बैंकों में फिक्स डिपॉजिट रखने पर 8.6 फीसदी का ब्याज मिलता है. जिसका सीधा-साधा अर्थ है कि 15 लाख रुपये रखने पर साल में 1 लाख 29 हजार रुपये या महीने में 10 हजार 50 हजार रुपये मिलते हैं. जो पहले साल में 13 फीसदी के हिसाब से 1 लाख 95 हजार यानी महीने में 16 हजार 250 रुपये मिल जाते थे अब उसकी जगह पर काफी कम रकम मिल रही है. यदि 15 लाख की जमा पर रेपो रेट के अनुसार ही 5.15 फीसदी की दर से ब्याज मिले तो यह साल में 77 हजार 250 रुपये तथा प्रतिमाह 6 हजार रुपयों का हो जाएगा. जबकि जमाना महंगाई का हो गया है. अब आया माजरा आपकी समझ में कि भविष्य में क्या होने जा रहा है.

दूसरी तरफ, इसकी तुलना यदि गोल्ड स्टैंडर्ड से की जाए तो साल 1995 में 10 ग्राम सोने का भाव 4658 रुपये का था जो अब करीब 39,390 रुपये का हो गया है. यदि सोने के आधार पर तुलना की जाए तो महंगाई 8.1 गुना हो गई है. इस तरह से एक तरफ महंगाई बढ़ रही है तो दूसरी तरफ बैंकों में फिक्स डिपॉजिट रखना अब पहले के समान सुरक्षा प्रदान करने वाला नहीं रहा. क्रमशः सामाजिक सुरक्षा में कमी आ रही है.

इतना ही नहीं अब तो बैंक अपने बचत खातेदारों से नये-नये नियम कायदे लाकर वसूली भी करने लगे हैं. दो साल पहले एक आरटीआई से खुलासा हुआ था कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने इस साल के पहले तिमाही में अपने 388.74 लाख बचत खातेंदारों से न्यूनतम बैंलेंस से कम रखने के कारण 235.06 करोड़ रुपयों की वसूली की है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को भारत का सबसे बड़ा बैंक होने का रुतबा हासिल है और इसके 31 करोड़ बचत खातेदार हैं. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया दुनिया के टाप 50 बैंकों में शुमार हो गया है. विलय के बाद से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का बैलेंसशीट का आकार 41 लाख करोड़ रुपये का हो गया है.

इस तरह से बैंक के खाते में न्यूनतम रकम रखने को अनिवार्य कर दिये जाने से बैंकों में जमा रकम बढ़ने लगेगी. इसे कहते हैं चाबुक की जोर पर अर्थव्यवस्था को हांकना. बचत खातों में न्यूनतम रकम रखना अनिवार्य कर देने को गणित के माध्यम से समझा जा सकता है. यदि स्टेट बैंक के 31 करोड़ बचत खातों में 2000 रुपये भी न्यूनतम रखा जाये तो यह रकम होती है 6 खरब 20 करोड़ रुपये. इस नये नियम से बैंक के खजाने में वृद्धि होगी. यह जग जाहिर है कि बैंकों में रखे धन से कॉर्पोरेट को जो उधार दिया जाता है जिसमें से ज्यादातर डूब जाते हैं.

इस तरह से एक तरफ लोगों को बैंकों में फिक्स डिपॉजिट रखने से हतोत्साहित किया जा रहा, ताकि शेयर बाजार को शेयर खरीदने वाले मिल सकें. वहीं दूसरी ओर बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस रखने की अनिवार्यता लागू करके धन संग्रह किया जा रहा जिससे कॉरर्पोरेट घरानों को दिल खोलकर ऋण दिया जाता है. इसके बाद यदि यह कहा जाए कि कभी जिन बैंकों का देशहित, जनहित तथा अर्थव्यवस्था को स्थायित्व देने के लिये राष्ट्रीयकरण किया गया था वे अब बाजार अर्थव्यवस्था के औजार बन गए हैं तो गलत ना होगा. यानी बैंक अब वो बैंक नहीं रहे.