अपने वक्त से आगे के विलक्षण कलाकार लियोनार्दो द विंची

death anniversary of man of renaissance leonardo da vinci

 

पुनर्जागरण के चित्रकार लियोनार्दो द विंची की पेंटिंग मोनालिसा हर दौर में दुनिया भर के लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं रही है. आज भी तमाम कलाकार और बौद्धिक 500 साल से ज्यादा पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी मुस्कान पर शोध में लगे हैं. मोनालिसा को लेकर एक मान्यता यह भी है कि विंची के सामने इस पोट्रेट के लिए महिला और पुरुष दोनों ही बैठे थे. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मोनालिसा असल में जियोकोंदो थी जो फ्लोरेंस के एक सिल्क कारोबारी की पत्नी थी. 1911 में पेरिस के लूव्रे संग्रहालय में रखी यह पेंटिंग चोरी हो गई. इसे इटली का ही एक चोर अपने देश ले आया था जहां उसे देशभक्त के रुप में सम्मानित किया गया. दो साल बाद चोर पकड़ लिया गया, पेंटिंग लूव्रे संग्रहालय में वापस लाई गई. इसका सृजन काल 1503 से 1506 के बीच माना जाता है.

सिगमंड फ्रायड ने लियोनार्दो द विंची के लिए ही कहा है, ” जब अंधकार युग में सभी सो रहे थे एक इंसान जाग उठा था. वह सही मायने में पुनर्जागरण पुरुष थे जिन्होंने मानव की क्षमता को सीमाहीन माना. उनके दर्शन में चर्च की सत्ता को लेकर विद्रोह था. हालांकि वह एक ऐसा समय था जब चर्च की मान्यता के खिलाफ जाना सबसे खतरनाक माना जाता था. कई लोगों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी थी. और यह वही दौर भी था जब नए प्रयोगों की जमीन तैयार हो रही थी.”

यूरोप तेरहवीं शताब्दी में करवटें बदल रहा था. लोग मध्यकाल के अंधकार से जागते हुए चर्च की सत्ता को चुनौती देने लगे. एक ऐसे दौर की शुरुआत हो चली थी जिसमें लैटिन और ग्रीक साहित्य की ओर लौट चलने का आह्वान जोर पर था. इस साहित्य में मानव की शक्ति और गौरव के वर्णन के समर्थन में आवाजें उठने लगीं. इटली का फ्लोरेंस नगर इसका केन्द्र बनकर उभरा जहां इसकी मशाल महान कवि दांते थामे हुए थे. दांते के बाद इसकी विरासत फ्रांसिस्को पेट्रोर्क के हाथों में थी जिन्हें मानवतावाद का जनक भी माना गया. यूरोप में पुनर्जागरण की शुरुआत यहीं से मानी जाती है. यहीं से यूरोप अंधकार युग से निकल कर आधुनिकता में पैर रख रहा था.

दूसरी ओर कलाकार नई पद्धति के प्रयोग में लगे हुए थे. लियोनार्दो द विंची इनमें सबसे आगे रहे. उन्होंने विज्ञान और कला को कभी एक-दूसरे से अलग नहीं माना. उनके अध्ययन में सब कुछ शामिल रहा जिससे उनकी प्रतिभा चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, आविष्कारक और लेखक के रुप में स्थापित हुई. वह असल मायने में एक महान गणितज्ञ और पुनर्जागरण के चित्रकार माने गए.

शरीर रचना विज्ञान में भी विंची की गहरी रुची थी. मिलान में रहते हुए उन्होंने दूसरे कई डिजाइन तैयार किए थे. इसके अलावा पेरिस आकर उन्होंने युद्ध से जुड़ी डिजाइन भी बनाई थी जो ड्यूक को पंसद नहीं आई. उस वक्त फ्रांस का तुर्की के साथ युद्ध चल रहा था. इसके बाद वो अपनी श्रेष्ठ कृति ‘दि लास्ट सपर’ की तैयारी में लग गए.

लियोनार्दो द विंची की पेंटिंग ‘दि लास्ट सपर’ कला के इतिहास में उत्कृष्ट नमूना है. इसमें बाइबिल की एक घटना का चित्रण है. इसके सहारे विंची ने यह बताया कि ईश्वर के सामने सब बराबर हैं. यह पेंटिंग द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बमबारी में क्षतिग्रस्त हो गई. इसके बावजूद आज भी यह सबसे ज्यादा अध्ययन की जाने वाली कलाकृति है.

‘सेंट जॉन द बैपटिस्ट’ लियोनार्दो की सबसे आखिरी पेंटिंग मानी जाती है. इसका रचना काल 1513 से 1516 के बीच माना गया है. यह वह दौर था जब यूरोप पुनर्जागरण के चरम की ओर तेजी बढ़ रहा था. इसमें सेंट जॉन का चंचल चित्रण है. मुस्कान मोनालिसा जैसी रहस्यमयी है.

‘मैडोना ऑफ दि यार्नविंडर’ में यीशु की बाल्यावस्था का चित्रण है. इस पेंटिंग को विंची ने फ्रांस लौटने के बाद पूरा किया था. तब उनकी उम्र पचास साल के करीब थी. विंची तीस साल की उम्र में अपना शहर फ्लोरेंस छोड़ कर मिलान चले गए थे. फ्रांस के क्लाउस शहर में 2 मई 1519 को 67 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली.


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