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जन्म दिन विशेष: सिनेमा में यथार्थवादी ढंग से गंभीर सवाल उठाने वाले मृणाल सेन

profile of filmmaker mrinal sen

 

भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले विख्यात फिल्मकार मृणाल सेन का आज जन्म दिन है. बीते साल 30 दिसंबर को उनके निधन पर प्रकाशित इस लेख में भारतीय सिनेमा को समृद्ध बनाने में उनके योगदान की विस्तार से चर्चा की गई है. हम इस महान फिल्मकार को याद करते हुए इस लेख को फिर से साझा कर रहे हैं.

भारतीय समानांतर सिनेमा को विश्व पटल पर ख्याति दिलाने वाले, मशहूर फ़िल्मकार मृणाल सेन का आज अपने गृहनगर कोलकाता, पश्चिम बंगाल में निधन हो गया. वह 95 वर्ष के थे. मृणाल सेन, महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के समकालीन थे. इन तीनों महान विभूतियों को, भारतीय समानांतर सिनेमा के त्रिदेव भी कहा जाता था. आज जब मृणाल सेन शरीर रूप में हमारे बीच नहीं हैं, तब हम उनकी जीवन यात्रा, फ़िल्मों, पुरुस्कारों के बारे में कुछ बेहद शानदार और दिलचस्प वाक़्यें आप के साथ साझा करेंगे. यही हम सबकी तरफ़ से मृणाल दा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

14 मई सन 1923 को मृणाल सेन का जन्म ब्रिटिश इंडिया के फरीदपुर कस्बे में रहने वाले एक हिन्दू परिवार में हुआ था. आज यह जगह बांग्लादेश में स्थित है. अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद मृणाल सेन ने मशहूर ‘स्कॉटिश चर्च कॉलेज’ से स्नातक और फिर ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय’ से भौतिक विज्ञान में परास्नातक डिग्री प्राप्त की. यही मृणाल सेन ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के सांस्कृतिक इकाई से जुड़कर कई रचनात्मक कार्य किए. यही वह ‘इंडियन पीपल थिएटर एसोसिएशन’ से भी जुड़े, जहाँ उनकी मुलाक़ात कई समाजवादी बुद्धिजीवियों से हुई, जिसने मृणाल सेन की शख्सियत पर गहरा प्रभाव डाला.

जीवन में कुछ ऐसे हालात बने कि मृणाल सेन को कोलकाता के एक फ़िल्म स्टूडियो में बतौर ऑडियो तकनीशियन नौकरी करनी पड़ी. यही उन्हें फ़िल्म के निर्माण के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिली, जिससे उनके रुचि फ़िल्मों के प्रति बढ़ती चली गयी. मृणाल सेन ने फ़िल्म निर्माण के भूलभूत सिद्धांतों पर आधारित कई किताबें पढ़ी और उनके मन में फ़िल्म बनाने की चाहत कुलबुलाने लगी.

मृणाल सेन की मुलाक़ात एक निर्माता से हुई, जिसकी मदद से उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म ‘रात भोर’ का निर्माण किया. 21 अक्टूबर सन 1955 को रिलीज़ हुई इस बंगाली भाषा की फ़िल्म में अभिनेता उत्तम कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई. संगीत की ज़िम्मेदारी मशहूर संगीतकार सलील चौधरी के कंधों पर थी. मृणाल सेन ने बड़ी उम्मीदों से इस फ़िल्म को बनाया था मगर फ़िल्म उतनी कामयाब नहीं हुई. मृणाल सेन निराश हो गए. उन्होंने फ़ैसला किया कि अब वह फ़िल्में नहीं बनाएँगे. मगर मृणाल सेन फ़िल्मों के लिए ही बने थे और इसी नियति को सच करने के लिए वह कुछ सालों बाद फिर से फ़िल्मी दुनिया में लौटे.

मृणाल सेन ने सन 1958 में हिंदी की महान लेखिका ‘महादेवी वर्मा’ की लघु कथा ‘चीनी फेरीवाला’ पर आधारित बांग्ला भाषा की फ़िल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ का निर्माण किया, जो बेहद कामयाब साबित हुई. यहीं से मृणाल सेन के फ़िल्मी सफ़र ने रफ़्तार पकड़ी.

मृणाल सेन, उन फ़िल्मकारों में से थे जिनका मानना था कि फ़िल्मों का मनोरंजन से इतर एक बड़ा योगदान समाज के प्रति होना चाहिए. उनकी हर एक फ़िल्म, समाज के यथार्थ को प्रदर्शित करने वाली एक बेहद शानदार कलात्मक कृति होती थी. उनकी फ़िल्मों में समाज के दलित, वंचित, शोषित लोगों की भावनाओं की बड़ी कुशलता के साथ उकेरा जाता था.

मृणाल सेन ख़ुद एक विस्थापित थे और उन्होंने विभाजन का दर्द महसूस किया था. यह दर्द उनकी फ़िल्मों के ज़रिए सिल्वर स्क्रीन पर भी दिखाई देता था. उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘बाइसे श्रवण’ ( 1960) और ‘अकालेर संधाने’ (1980) के ज़रिए बंगाल के भीषण अकाल और दलितों-पिछड़ों के दमन के प्रश्नों को मज़बूती से उठाया.

उन्होंने अपनी मशहूर ‘कलकत्ता ट्राइलॉजी’ के अंतर्गत बनाई तीन फ़िल्मों ‘इंटरव्यू (1971), कलकत्ता 71 (1972), पदातिक (1973) के ज़रिए, बंगाल में सत्तर के दशक में चल रहे नक्सलवादी आन्दोलन के कारणों, चुनौतियों को दिखाने की कोशिश की. इन फ़िल्मों के ज़रिए उन्होंने उन गम्भीर प्रश्नों को उठाया, जो आज़ादी के बाद भी ग़रीबों, पिछड़ों के सामने मुंह खोले खड़े थे और जिनके निस्तारण के लिए, नक्सलवादी आन्दोलन आग की तरह पूरे बंगाल को अपनी चपेट में ले रहा था.

बांग्ला भाषा में अलावा, मृणाल सेन ने दूसरी भारतीय भाषाओं जैसे हिंदी, तेलगु, उड़िया में भी फ़िल्में बनाई. उनकी फ़िल्मों को देश में तो पसंद किया ही गया, इसके साथ-साथ उनकी फ़िल्मों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी बहुत सराहना मिली. उनको कई अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा गया.

मृणाल सेन की साहित्य में भी गंभीर रूचि थी. उन्होंने समय-समय पर कई बड़े साहित्यकारों की रचनाओं पर फ़िल्में बनाईं. ऐसी ही एक फ़िल्म से बेहद रोचक क़िस्सा जुड़ा हुआ है. मृणाल सेन ने भारत के महान लेखक प्रेमचन्द की कहानी ‘कफ़न’ पढ़ी और बेहद प्रभावित हुए. उन्होंने फ़ैसला किया कि वह इस कहानी पर आधारित एक तेलगु फ़िल्म बनाएंगे.फ़िल्म निर्माण शुरू हुआ. फ़िल्म का नाम रखा गया ‘ओका उरी कथा’.

फ़िल्म की शूटिंग हैदराबाद, आन्ध्र प्रदेश से 100 किलोमीटर दूर एक गाँव में हो रही थी. तभी एक घटना हुई, जिससे मृणाल सेन बहुत गुस्सा हो गए. दरअसल एक सीन के दौरान, अभिनेता वासुदेव राव को ‘जम्हाई’ लेने का अभिनय करना था. मगर बहुत कोशिश करने पर भी वह सही तरह से इस सीन को नहीं कर पा रहे थे. जब दस टेक के बाद भी सीन नहीं हो सका तो मृणाल सेन ने झुंझलाते हुए वासुदेव राव से कहा “तुमसे जम्हाई लेने का सीन भी नहीं होता है, क्या करोगे तुम?”. इस बात को सुनकर वासुदेव राव बहुत विनम्रता के साथ बोले “दादा, मैं पूरी ज़िन्दगी काम करने में इतना व्यस्त रहा हूँ कि मुझे कभी भी जम्हाई लेने का मौक़ा ही नहीं मिला”. वासुदेव राव की यह बात सुनकर मृणाल दा मुस्कुराए और उन्होंने वासुदेव राव को गले से लगा लिया. यह वाक़या, मृणाल सेन के सेंसिटिव और निश्चल मन का परिचय देता है.

मृणाल सेन ने हिन्दी भाषा में भी ‘एक दिन अचानक’, मृगया जैसी शानदार फ़िल्में भी बनाईं. मृणाल सेन फ़िल्मों को, सिनेमा को एक ऐसा ज़रिया मानते थे, जिससे एक इंसान अपने आप को, अपने समाज को अच्छे से समझ सकता है. वह फ़िल्म निर्माण की प्रक्रिया को “सुना, देखा सीखा, जाना हुआ ज्ञान” भूलने की बेहद शानदार प्रक्रिया मानते थे.

मृणाल सेन सन 1998 से लेकर सन 2003 तक राज्य सभा के सांसद भी रहे. उन्हें सन 2005 में महामहिम राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों से दादा साहब फाल्के पुरुस्कार मिला. मृणाल सेन को दादा साहब फाल्के पुरुस्कार मिलने के बाद का एक बड़ा दिलचस्प वाकया है.

जब पत्रकारों ने मृणाल सेन से पूछा कि उन्हें राष्ट्रपति के हाथों प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरुस्कार पाकर कैसा लग रहा है?, तो इसके जवाब में मृणाल सेन बोले “आजकल जिस तरह से लोग मुझसे मिलने, मुझसे बात करने चले आते हैं, वह देखकर मेरी पत्नी को यह ज़रूर एहसास हो गया है कि उसकी शादी किसी काबिल इंसान से हुई है, यानी मुझमें कोई बात तो ज़रूर है”..इतना कहकर मृणाल सेन मुस्कुराने लगे. यही सच्चाई और कोमलता मृणाल सेन को महान इंसान बनाती है.

मृणाल सेन की शादी बंगाली अभिनेत्री गीता सेन से हुई थी. उनका सन् 2017 में निधन हो चुका है. एक इंटरव्यू में गीत सेन ने बताया था कि किस तरह मृणाल सेन ने अपने फ़िल्मी सफ़र में तकलीफ़ों को चुनौतियों का सामना किया. गीता सेन के मुताबिक ऐसी कई रातें रहीं जब घर में खाने, पीने के लिए कुछ नहीं था. मगर मृणाल सेन ने समझौता नहीं किया और समाजिक सरोकार की फ़िल्में बनाते रहे.

आज मृणाल सेन भले ही हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी फ़िल्मों के रूप में एक संस्थान आने वाली कई पीढ़ियों को प्रोत्साहित करता रहेगा. मृणाल सेन की फ़िल्में आने वाले समय के फ़िल्मकारों के लिए एक प्रकाश पुंज का काम करेंगी और मृणाल सेन हमेशा अपनी फ़िल्मों के ज़रिए अपने चाहने वाले दर्शकों के दिलों में ज़िन्दा रहेंगे.

सभी तस्वीरें mrinalsen.org से साभार