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रंगभेद की गहराती छायाएं : नागरिक समाज का विराट मौन

racial discrimination against africans in india

 

सैम्युअल पानिन येल्ले, भारत में घाना के पूर्व राजदूत को शायद ही कोई जानता हो, अलबत्ता दो साल पहले ‘अफ्रीका दिवस’ के अवसर पर उनकी गायी दर्दभरी एक कविता की अनुगूंज अब भी सुनाई दे रही है.

‘हे अफ्रीका मेरी आवाज़ सुनो..अफ्रीका की वे महान नदियां, नाईल से टांगानिका तक, गंगा नदी से पहुंच रहे मेरे रक्त़ को स्वीकार करो.’

देश के वरिष्ठ मंत्री ही नहीं बल्कि वहां जुटे तमाम राजदूत एवं अन्य गणमान्य अतिथि बिल्कुल खामोश होकर उस कविता को सुन रहे थे. दिल्ली की सड़कों पर हुई कांगो के नागरिक की बर्बर हत्या के खिलाफ उनकी यह आवाज़ गोया वहां मौजूद अफ्रीकी देशों के राजदूतों की अपनी पीड़ा को जुबां दे रही थी.

पिछले दिनों दिल्ली के द्वारका इलाके में चार तांजानियाई और दो नाईजीरियाई लोगों पर स्थानीय नागरिकों द्वारा किए गए हमले की घटना के बाद – जब किसी बच्चे के अपहरण और उसे मार कर खाने की अफवाह फैलाकर उन पर हमला किया गया था – उस कविता की पीड़ा और अधिक गहराती दिख रही है. एक अग्रणी अख़बार के मुताबिक इस मामले में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की है.

आम तौर पर जैसा कि ऐसे हमलों के बाद होता है, कानून के रखवाले ऐसे हमले को नस्लीय हमला मानने से इन्कार कर देते हैं और बात आई-गई हो जाती है.

अभी पिछले ही साल दिल्ली के बगल स्थित नोएडा में नाइजीरियाई मूल के लोग स्थानीय लोगों द्वारा हमले का शिकार हुए थे और बहाना बनाया गया था कि किसी स्थानीय युवक की नशीली दवा के अत्यधिक सेवन से हुई मौत के लिए वही जिम्मेदार हैं. इतना ही नहीं बर्बरता से हुए ऐसे हमलों के वीडियो भी प्रसारित किए गए थे गोया बाकियों को संकेत मिलें कि वह भी उन्हें हिंसा का निशाना बनाए.

मार्च महीने में द क्विन्ट ने इस पर स्टोरी की थी और बताया था कि एक साल गुजरने के बाद भी उनके मामले में न्याय नहीं मिला है. रेखांकित करनेवाली बात है कि ऐेसे हमलों को स्थानीय विवादों या व्यक्तिगत कारणों तक ही सीमित करने की कोशिश हर स्तर पर दिखाई देती है. इन हमलों को नस्लीय हमले मानने से इंकार किया जाता है, जबकि यह स्पष्ट रहता है कि उनकी त्वचा के रंग के चलते अफ्रीकी छात्रा हमले का शिकार हुए हैं या उनके बारे में जो गलतफहमियां और गलत धारणाएं मौजूद होती हैं, वही उन पर हमले का कारण बनती हैं. यह अलग बात है कि मामले की गंभीरता बढ़ती जा रही है.
अभी पिछले ही साल न्यूयॉर्क टाईम्स ने ऐसे हमलों पर स्टोरी की थी, जिसमें बताया था ऐसे हमलों में उछाल आया है.

उन्हीं दिनों मानवाधिकारों की हिफाजत के लिए प्रयत्नशील अंतरराष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी एक सख्त बयान जारी करते हुए इन ‘नस्लवादी हमलों को रोकने की सरकार से मांग की तथा आततायी तत्वों को दंडित करने को कहा. मगर क्या यह कहा जा सकता है कि अफ्रोफोबिया या नस्लवाद की समस्या मनगढंत है और ऐसे हमलों को बेवजह तूल दिया गया है. काश, ऐसा कहा जा सकता !

विडम्बना ही है कि ‘नीचे’ से लेकर ‘उपर’ तक यह समस्या विभिन्न छटाओं में मौजूद है.

विडम्बना ही है कि भारत का नागरिक समाज खुद ‘अन्य’ के साथ व्यवहार को लेकर गलत कारणों से अक्सर सूर्खियों में रहता है और उसका यह व्यवहार सिर्फ किसी शहर विशेष तक सीमित नहीं है. रंग को लेकर छींटाकशीं, नस्लीय हमले और तरह तरह के अन्य भेदभाव उन्हें झेलने पड़ते हैं.

बंगलुरू में एक अश्वेत कार चालक ने शिकायत की थी कि किस तरह उसे कार में खींच कर लोगों ने तब पीटा जब वह उस स्थान से गुजर रहा था जहां अश्वेत समुदाय के छात्रों द्वारा गाड़ी चलाते हुए कोई दुर्घटना हुई थी और उसे इसीलिए पीटा गया था क्योंकि वह अश्वेत था. स्थानीय पुलिस ने भी इस मामले में उसकी सहायता नहीं की थी. दिल्ली के मेट्रो स्टेशन पर तीन नाइजीरियाई छात्रों की पीटाई का मामला चार साल पहले सुर्खियों में रहा था.

विडम्बना यही कही जाएगी कि न केवल वहां खड़ी पुलिस ने इन तीनों को बचाने का प्रयास किया और इस बात के प्रमाण होने के बावजूद कि किसने इन छात्रों पर हमला किया, उसने उन्हें पकड़ने में आनाकानी की. किसी लड़की को छेड़ने के नाम पर भीड़ ने यह कार्रवाई की.

अनधिकृत आंकड़ों के मुताबिक मुंबई में रहनेवाले लगभग पांच हजार अफ्रीकियों को इसी किस्म का भेदभाव झेलना पड़ता है. हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपने विशेष आलेख में अफ्रम ओगोनी नामक अश्वेत छात्रा की आपबीती बयां की थी, जो मुंबई में पढ़ता है. वैसे इन हमलों या भेदभाव की घटनाओं को कैसे समझा जा सकता है?

औपनिवेशिक शोषण एवं लूट के साझा इतिहास के बावजूद या गरीबी की विकराल समस्या के बावजूद अश्वेत लोगों के प्रति यहां के लोगों का व्यवहार आखिर क्यों अहंकारपूर्ण होता है. शायद यह बात अब इतिहास के पन्नों पर एक सन्दर्भ के तौर पर ही दर्ज रहेगी कि वर्ष 1948 में भारत ने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी शासन की समाप्ति की मांग की थी. क्या इसे उपनिवेशवाद की विरासत के तौर पर देखा जाए-जिसमें एक बड़े हिस्से के मन मस्तिष्क पर श्वेत चमड़ी का भार दिखाई देता है? सुहास चक्रवर्ती अपनी किताब ‘द राज सिन्डोम: ए स्टडी इन इम्पीरियल परसेप्शन्स’ में इसी की तरफ इशारा करते हैं: ‘‘उपनिवेशवाद की विरासत ने दोयम दर्जे के भारतीयों की एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान को मजबूती प्रदान की जो आज भी श्वेत रंग को अश्वेत रंग से उंचा मानने के जरिए अभिव्यक्त होती है.’’

या इसे सफेद रंग के प्रति लोगों के सम्मोहन का परिणाम कहा जाए जिसके तहत बड़े-बड़े फिल्म स्टार्स भी -फेयरनेस क्रीम – के प्रचार में मुब्तिला दिखते हैं. या इसे वर्णमानसिकता का विस्तार समझा जाए जिसके चलते अवर्णों/अतिशूद्रों को, श्रमजीवी आबादी के बड़े हिस्से को भेदभाव का सामना करना पड़ता है. अगर बारीकी से देखें तो इसे हम सभी कारकों के मिलेजुले असर के तौर पर देख सकते हैं.

वैसे भारतीय समाज में ‘हम’ और ‘वे’ का यह सिलसिला इतना जडमूल है कि अन्यीकरण की यह प्रक्रिया ‘अश्वेत’ बनाम भूरे के बीच ही नहीं बल्कि सवर्ण बनाम दलित, पिछड़े बनाम अगड़े, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक आदि विभिन्न स्तरों पर प्रगट होती देखी जा सकती है. देश के अलग अलग हिस्सों में पढ़ रहे दक्षिण पूर्व के छात्रा या कार्यरत लोग किस तरह ‘चीनी’ कहते हुए अपमानित किए जाते हैं, ‘मोमो’ कह कर अवमानना का शिकार बनाए जाते हैं कि अश्वेतों के खिलाफ जो नस्लीय हिंसा है-वह भले ही इतने भोंडे रूप में प्रगट हो-मगर ‘दिखती’ नहीं है.

अपनी चर्चित रचना ‘‘अछूत कौन और कैसे ?’’ जिसमें वह अस्प्रश्यता के जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, डा अम्बेडकर ने इसी मानसिकता की पड़ताल की थी.

सनातन धर्मान्ध हिंदू के लिए यह बुद्धि से बाहर की बात है कि छुआछूत में कोई दोष है. उसके लिए यह सामान्य स्वाभाविक बात है. वह इसके लिए किसी प्रकार के पश्चाताप और स्पष्टीकरण की मांग नहीं करता. आधुनिक हिंदू छुआछूत को कलंक तो समझता है लेकिन सबके सामने चर्चा करने से उसे लज्जा आती है. शायद इससे कि हिंदू सभ्यता विदेशियों के सामने बदनाम हो जाएगी कि इसमें दोषपूर्ण एवं कलंकित प्रणाली या संहिता है जिसकी साक्षी छूआछूत है.

– डॉक्टर अम्बेडकर, अछूत कौन और कैसे?

अन्त में हम झुंड द्वारा हिंसा की बढ़ती परिघटना में भी ऐसे हमलों के बीज ढूंढ सकते हैं, जिसने विगत चार सालों में जबरदस्त तेजी आयी है. अफ्रीकी छात्रों पर हुए हमले के अगले ही दिन द्वारका के पास उत्तमनगर नामक इलाके में एक ऑटो चालक की चार लोगों ने पीट कर हत्या कर दी, जिन्हें यह शक था कि उसने चोरी की है.